Lord Shiva

शिव भगवान भक्तों के लिये पूर्वकाल में सूर्य पर भी क्रोधित हो गये थे। उन्होने उस को त्रिशूल से जीत लिया । भक्तो के लिये शिवजी ने कुमति व्यास को नंदी से दण्डित करा कर उसे काशी से बाहर कर दिया। अपने भक्त के लिये सैन्य सहित रावण को त्याग दिया। भक्तों की श्रद्धा के कारण वह बिना किसी जाति का भेद कर किसी भी भक्त के पास पंहुच जाते है।
शिव की भक्ति -भोग एवं मोक्ष में कारण है
रजोगुण, तमोगुण एवं सत्त्व गुण से परे जो निर्गुण भी है और सगुण भी उस निर्विकार महाप्रभु शिव की भक्ति से ही भोग एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। भक्ति और ज्ञान में कोई अन्तर नही होता।
भक्ति के दो प्रकार
भक्ति दो प्रकार की होती है सगुण व निर्गुण। शास्त्र विधि अनुसार व स्वाभाविक  भक्ति को सगुण भक्ति कहा जाता है । किसी इच्छा विशेष के लिये की गयी भक्ति को निर्गुण कहा जाता है।   इसको निम्न कोटि की भक्ति कही जाता है।
श्रवण, कीर्तन व स्मरण
सगुण और निर्गुण दोनो भक्तियों के नौं अंग कहे गये हैं। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, सेवन, दास्य, अर्चन, वन्दना, सख्य व आत्मसर्मपण।
स्थिर आसन पर बैठ कर तन मन आदि से कीर्तन और कथा का सम्मान का प्रसन्नता पूर्वक उसका पान करना श्रवण कहलाता है। हृदय आकाश से शिव जन्म और कर्मों का चिन्तन करते हुये प्रेम वाणाी से उनका उच्चारण करना कीर्तन कहा जाता है। नित्य महेश्वर को सदा और सर्वत्र व्यापक जानकर, संसार में निर्भय रहने को स्मरण करना भी भक्ति का ही प्रकार है। सूर्य उदय काल से रात को सोने तक भगवद्विग्रह की सेवा करने को स्मरण कहा जाता है।

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सेवन, दास्य व अर्चन भक्ति
सतत रूप से हृदय और इन्द्रियो से शिव की सेवा करना वह सेवन भक्ति कहलाती है। अपने आप को किंकर समझ कर हृदय अमृत के भोग से सदा अपने स्वामी का प्रिय सम्पादन करना दास्य कहलाता है।
सदैव को सदा सेवक समझकर शास्त्रीय विधि से परमात्मा को पाद्य आदि सोलह उपचारों का समर्पण करना अर्चन कहलाता है। https://www.youtube.com/watch?v=CH4LDUc_-dM&list=PLAi4F6MiksSGY2BMrR9wzv6K2Ioisqhb3
वन्दना, सख्य व आत्मसर्मपण भक्ति
वाणी से मन्त्रो का उच्चारण करते हुये आठो अंगों से भूमि का स्पर्श करते हुये इष्टदेव को प्रणाम करने के वन्दन कहा जाता है। दोनो चरण, दोनो हाथ, दोनो जानु, व वक्ष स्थल और सिर – इन आठ अंगों को भूमि पर दण्ड की भान्ति लेट कर मन , वाण तथा भक्ति भाव से जो प्रणाम करता है उसे अष्टांग प्रणाम कहा जाता है।
सख्य व आत्मसर्मपण भक्ति
ईश्वर मंगल करे या अमंगल, वह भक्त के लिये मंगलकारी होता है इस प्रकार का दृढ़ विश्वास रखना सख्य भक्ति का लक्षण है। देह आदि को जिसे हम अपना मानते है उन सब को शिव को समर्पण कर देना आत्मसमर्पण कहलाता है। इसमें भक्त अपने निर्वाह की चिन्ता भी ईश्वर पर ही छोड़ देता है।
शिव भक्तों को कभी कष्ट नही होता
यदि कोई व्यक्ति शिव की भक्ति नही करता तो यह उसका दोष है। यह उसकी अज्ञानता और उसकी मूकता है। शिवभक्ति में संलग्न अन्तकरण से शिव को प्रणाम करने वाले , शिव के स्मरण में लगे रहने वाले दुःख के पात्र नही होते। इसके अतिरिक्त सभी प्रााणियों का उपकार करना तथा सबको अभय प्रदान करना अष्टमूर्ति शिव की अराधना है। लोक में किसी को क्लेश देने के अर्थ है कि वह क्लेश अष्ट मूर्ति महेश्चर को दिया गया है। जिस किसी भी उपाय से शिव में मन को लगाना चाहिये। शिव में आसक्त मन वाले तथा प्रतिष्ठित बुद्धि वाले सज्जनों को इस लोक में तथा पर लोक में सर्वत्र परम शान्ति प्राप्त होती है।
अनूप कुमार गक्खड़

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