गंगा स्नान के लाभ
                                    

अनूप कुमार गक्खड़

गंगा स्नान के बारे में महाभारत वनपर्व में लिखा है कि गंगा जी में कहीं पर भी स्नान कर लिया जाए तो वह कुरुक्षेत्र के बराबर होता है लेकिन कनखल का महत्व ही अलग है। मनुष्य के शरीर में नौ छिद्र होते हैं। वे रात में सोने से अपवित्र हो जाते हैं। अतः उसके लिये स्नान आवश्यक है। स्नान करते समय शौच वाला वस्त्र नही पहनाना चाहिए। यूं तो स्नान के लाभ अनेक होते हुये भी कहीं पर भी स्नान किया जा सकता है लेकिन गंगाजी में नहाने का अलग ही महत्व है।

गंगा स्नान से लाभ

गंगाजी की अनुपम प्रतिभा व शक्ति से मोह और मल का नाश होता है और बुद्धि व जठराग्नि की वृद्धि होती है। हिमालय की धातुओं, मणियों व दिव्य औषधियों के सम्पर्क में लम्बी धारा के प्रवाह के रूप से बहता हुया जल और गुणकारी हो जाता है । ऐसे में गंगाजी में नहाने से लाभ होना स्वाभाविक ही है। गंगाजी में तर्पण व गंगा जल के पान से व स्नान से पातको का समूह नष्ट हो जाता है। गंगा में स्नान मात्र से सात पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है।

गंगा स्नान से पितर प्रसन्न होते हैं

वहां स्नान के लिये प्रवृत होने पर उस व्यक्ति के पितर स्वर्ग में प्रसन्न हो जाते हैं । वे निश्चित रूप से इस बात की प्रशंसा करते हैं कि उनके किन्ही सद्कर्मों का ही फल है कि उनके वंश में ऐसा पुत्र उत्पन्न हुया है जो उनको गंगा जल से तृप्त करेगा। नरक में रहने वाले पितरों को भी आशा जाग जाती है कि उनकी संतान द्वारा किया गया गंगा स्नान उन्हे नरक से मुक्ति दिला देगा। स्नान के बाद पितरों को तृप्त करना आवश्यक है। स्नान के बाद दान अवश्य देना चाहिए।

कब और कैसे करे स्नान

धर्मसिन्धु में कहा गया है कि आकाश में तारों के रहते किया गया स्नान उत्तम होता है । तारों के लुप्त होने पर किया गया स्नान मध्यम होता है व सूर्योदय के बाद नहाना अधम स्नान कहलाता है।
गंगा में स्नान करने के लिये सर्वप्रथम सिर में जल डालने का निर्देश है। इससे वरुण देवता तथा मां गंगा का आदर होता है। नदियों में जिस ओर से प्रवाह आ रहा हो उधर ही मुख करके स्नान करना चाहिए। ब्रह्मपुराण में लिखा है कि नदियों के आस पास चार हाथ का क्षेत्र नारायण का होता है अत वहां किसी प्रकार का दान नही लेना चाहिये।
स्नान करते समय निम्नलिखित मंत्र पढ़े।
विष्णुपादार्घसम्पूते गंगे त्रिपथगामिनि।
धर्मद्रवीती विख्याते पापं में हर जाहनवि।।
गंगा गंगेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोंकं स गच्छति।।
अस्थि प्रवाह के बाद गंगाजी में नहाना करना चाहिए और उसके बाद बाहर निकल कर सूर्य की ओर देखना चाहिए।

स्नान करते समय में यह न करें

बहुत कपड़े पहन कर स्नान नही करें। आभूषण पहन कर स्नान न करें। रात में स्नान न करें, नग्न होकर स्नान न करे। बदन पर तैल लगा कर गंगा जी में प्रवेश नही करना चाहिए। स्नान करते समय मिथ्या भाषण अथवा किसी प्रकार की हंसी व दिल्लगी नही करनी चाहिए। गंगा जी में मल मूत्र का त्याग, थूकना, कुल्ला करना जैसे कर्म नही करने चाहिए। विलासपूर्वक क्रीड़ा नही करनी चाहिए। कोई भी ऐसा कार्य नही करना चाहिए जिससे गंगा जी के प्रति अनास्था प्रकट हो। इन दिनों में स्नान का महत्व बढ़ जाता है
साधारण दिनों की अपेक्षा अमावस्या में स्नान करने का सौ गुणा लाभ होता होता है। सक्रान्ति में स्नान से एक हजार गुणा व ग्रहण में लाख गुणा लाभ प्राप्त होता है। सूर्य में मकर रााशि में स्थित होने पर एक बार स्नान करने पर छः वर्ष स्नान का लाभ मिलता है। प्रयाग में माघ मास स्नान का महत्व है।

इन्हे भी मिला था स्नान का लाभ

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एक बार इन्द्र को वृत्रासुर का वध करने से ब्रह्महत्या का पाप लग गयी। तब हाटकेशवर क्षेत्र के मार्ग में पाताल गंगा में स्नान करके व महादेव की पूजा करके वो इस पाप से मुक्त हुये। इससे पुनः उन्हे देवताओं का राज्य प्राप्त हुया। इसी तरह का एक वर्णन स्कन्द पुराण में मिलता है। महाराजा अम्बरीष के वृद्धावस्था में एक पुत्र प्राप्त हुया। राजकुमार सुवर्चा कुष्ठ रोग से ग्रसित हो गये। उन्हे पाताल गंगा जल में स्नान करने से लाभ हुया । उनके रोग की मुक्ति हो गयी।
इसमें कोई सन्देह नही है कि गंगाजी में स्नान करने से अध्यात्मिक लाभों की प्राप्ति होती है। याद रखें आवश्यक है कि गंगा जी एक तीर्थ है कोई पिकनिक स्पाट नही। तीर्थ, मंत्र, गुरु और औषध में जिसकी जितनी श्रद्धा होती है उसको उतना ही फल मिलता है।https://www.youtube.com/watch?v=Z3JXyGuVSE8&list=PLAi4F6MiksSGY2BMrR9wzv6K2Ioisqhb3&index=3&t=0s
अनूप कुमार गक्खड़, हरिद्वार

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