अनूप कुमार गक्खड़, हरिद्वार

गंगा जी मात्र एक बहते हुये जलप्रवाह का स्वरूप नहीं है अपितु, ऋग्वेद, महाभारत, रामायण, पुराणों में वर्णित व राष्ट्रीय नदी के रूप में प्रतिष्ठित आध्यात्मिक, आदिदैविक व आधिभौतिक तापों से संतप्त सांसारिक प्राणियों के लिये साक्षात भेषजमूर्ति है। भारतीय संस्कृति में वर्णित गंगा, गीता, गणेश, गायत्री एवं गौ इन पांच गकारों के अन्तर्गत प्रथम स्थान पर उल्लिखित गंगा नदी अपनी लगभग पच्चीस सौ किलोमीटर की यात्रा काल में अपनी दिव्य शक्तियों से लोगों को लाभान्वित करती है। महाभारत में एक सौ आठ व स्कन्दपुराण में एक हजार नामों से वर्णित देवी गंगाजी का नाम और कीर्तन न केवल मुक्तिदायी है अपितु उसका जल परम पद को प्रदान करने में सक्षम है।

गंगा जी है हमारी संस्कृति की आत्मा


हमारी संस्कृति की आत्मा गंगाजी के बारे में वनपर्व में कहा है कि गंगाजी में किसी भी स्थल पर स्नान किया जाए उसका महत्त्व कुरुक्षेत्र के बराबर है लेकिन कनखल में उसका विशेष महत्त्व है। कनखल में गंगाजी का महत्त्व आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ काश्यप संहिता के संहिताकल्प अध्याय में वर्णित एक प्रकरण से और सुदृढ़ हो जाता है। प्रजापति दक्ष के यज्ञ में मृत्यु के डर से पलायन करते हुये देवता और ऋषियों के देह और मन में संताप से सम्पूर्ण रोग उत्पन्न हुये।

तब लोक कल्याण के लिये महर्षि कश्यप ने पितामह ब्रह्मा के नियोग एवं अपने ज्ञान चक्षुओं से देखकर अपनी तपस्या के प्रभाव से तन्त्र का निर्माण किया तथा ऋषियों ने प्रतिपादन किया। उसके बाद सर्वप्रथम तम से शून्य, पवित्र एवं ऋचीक ऋषि के पुत्र जीवक ने इस महान तन्त्र को ग्रहण करके संक्षिप्त किया। परन्तु ऋषियों नें इसे बालभाषित कहकर उसकी प्रंशसा नहीं की। तब उस पांच वर्षीय बालक जीवक ने सब ऋषियों के समक्ष कनखल में स्थित गंगा कुण्ड में डुबकी लगायी और क्षणभर में वह झुर्रियों एवं सफेद बालों से युक्त होकर बाहर निकल आया। इस वृद्ध जीवक के अवतरण के उपरान्त वह तन्त्र स्वीकार्य हो गया। वर्तमान में आयुर्वेद में काश्यप संहिता बालरोगों के प्रामाणिक ग्रन्थ के रूप में प्रतिष्ठित है।

गंगाजल और आयुर्वेद


गीताशास्त्र में औषधं जाह्नवीतोयम् के विशेषण से प्रसिद्ध गंगा जल समस्त मानसिक और शारीरिक रोगों को दूर करने की अचूक महा औषधि है। आयुर्वेद के ग्रन्थ अष्टांग हृदय के रचयिता वाग्भट ने कहा है कि गंगाजल जीवन, तर्पण, हृदय के लिये हितकर होने के साथ-साथ बुद्धि का प्रबोधन भी करता है। इसमें किसी विशेष रस की अभिव्यक्ति नहीं होती। गंगाजल शीतल और लघु होने के साथ-साथ अमृत के समान हितकर होता है। गंगाजल से निर्मित शालि चावल का भात निर्मल बना रहता है और उसमें क्लेदता नहीं आती। इसके विपरीत समुद्र जल पीने के भी योग्य नहीं होता।

गंगाजल और हिमालय


हिमालय, जिसके साथ भगवान शंकर, माता पार्वती, विध्नहर्ता गणेश जी, माता दुर्गा सहित अनेक देवी देवताओं का सम्बन्ध रहा है, का पावन क्षेत्र गंगाजी का भी उदगम् स्थल है और चरक संहिता में लिखा है कि हिमालय से उत्पन्न व देव एवं ऋषियों द्वारा सेवित, पत्थर खण्डो से टकराकर निकलने वाली, विक्षुब्ध एवं अभिहत होकर बहने वाली नदियों का जल पथ्य एवं पुण्यदायक होता है। चरक संहिता के टीकाकार चक्रपाणि ने कहा है कि आधार विशिष्ट होने से नदियों के जल के गुणों में भी विशिष्टता आ जाती है। नदियाँ जिस स्थान से निकलती है उसका प्रभाव उनके जल पर भी पड़ता है।

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गंगाजी का उद्भव हिमालय की ऊंची चोटियों से होता है और उसका जल नीचे पाषाण खण्डों पर गिरता है जिससे वह जल विक्षोभ को प्राप्त होकर चंचल व अभिहत हो जाता है। इससे जल के दोष दूर हो जाते हैं। पर्वतों की तलहटी से निकलने वाली नदियों में यह गुण नहीं पाया जाता। चक्रपाणि टीका में यह स्पष्ट किया गया है कि जो नदिया पूर्वी समुद्र में गिरती हैं उनका जल भारी होता है लेकिन हिमालय से निकलने वाला गंगा नदी का जल पथ्य अर्थात हितकर होता है। अथर्ववेद में भी कहा गया है कि हिमाच्छादित पर्वतों की जो जल धाराएँ समुद्र की ओर प्रवाह करती हैं वे रोगनाशक, अमृतमय होती हैं। ये औषधीय जल धाराएँ हृदय को शान्ति प्रदान करने वाली होती है। वैदिक ऋषियों के द्वारा इसी पवित्र जल का आहवान करने के सन्दर्भ मिलते है।

गगांजी में है औषधियों का प्रभाव


जिस गंगाजी की स्तुति में हजारों वर्षों से स्तोत्र लिखे जाते रहे हों उसके औषधीय गुणों के अतुलनीय होने में कारणता यह है कि हिमालय क्षेत्र उत्कृष्ट औषधियों का उद्भव स्थल है। हिमालय से उतरते हुये गंगाजी औषध प्रभाव वाली बहुत-सी वनस्पतियों के संपर्क में आती है जिससे गंगाजल की दिव्यात्मकता व औषध गुणों में संवर्धन होता है।

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भारत की एकात्मता की प्रतीक गंगाजी की शक्ति उसकी अबाध अविरलता में वास करती है। सुश्रुत संहिता में लिखा है कि तेज बहने वाली और निर्मल जल वाली नदियों का जल लघु होता है। इसके विपरीत मंद गति वाली नदियों का जल गुरु होता है। जो जल दिन में सूर्य की किरणों से तथा रात्रि में चन्द्रमां की किरणों से सपृष्ट होता हो व रूक्षता और क्लेदता से रहित हो वह जल त्रिदोष नाशक, रसायन, बलवर्धक और मेधावर्धक होता है। गंगाजी को बांधों में बांध देने से उसकी अवरिलता में बाधा आती है जिससे उसकी शक्तियों में कमी होती है। इस प्रक्रिया में कुछ स्थलों पर गंगा जी को सुरंगों से गुजरना पड़ता है जिसके कारण इस पावन नदी का भूमि और आकाश से सम्बन्ध टूट जाता है और उससे गंगाजी की आधिदैविक, आधिभैतिक और आध्यात्मिक शक्तियाँ प्रभावित होती है।

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गंगा जी स्वर्ग के लिये सीढ़ी


गंगाजी से व्यक्ति कोे न केवल अपने जीवनकाल में उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति तो होती ही है अपितु वह इससे मरणोपरान्त भी लाभान्वित होता है। मृत व्यक्ति का कल्याण तभी होता है जब उसकी अस्थियांे को गंगाजी में प्रवाहित किया जाता है। जब तक गंगाजी में अस्थि का एक भी कण रहता है तब तक वह स्वर्ग में वास करता है। गंगाजी जिसमें अमावस्या पर स्नान करने से साधारण दिनों की अपेक्षा से सौ गुना, सक्रान्ति पर स्नान करने से हजार गुना, सूर्य या चन्द्र ग्रहण पर स्नान करने से लाख गुना लाभ प्राप्त होता है कि रज अर्थात धूलि भी सभी प्रकार के चर्मरोगों और रक्त विकारों को दूर करने वाला माना है।
गंगाजल नही होता कभी बासी
भगवान को बासी पुष्प और बासी जल न चढ़ानें का निर्देश है लेकिन तुलसी दल और गंगाजल को बासी चढ़ाने पर कोई दोष नहीं होता। गंगा जल की दिव्यता और औषधीय गुणों का यह एक श्रेष्ठ मानक है।
अनूप कुमार गक्खड़, हरिद्वार

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