मंगलकारी होती है स्त्री, जानिये इसका आयुर्वेदीय परिवेश
              Anup Kumar Gakkhar

सृजन शक्ति के रूप में स्त्री की सशक्तता, सम्पन्नता व श्रेष्ठता के रूप में उसका जो महत्व है वह अतुलनीय है। उत्कृष्टता की दृष्टि से विद्या, वैभव व पराक्रम की पराकाष्ठा सरस्वती, लक्ष्मी व दुर्गा में ही निहित होना इस बात को सुनिश्चित करता है कि हमारी संस्कृति में नारी के महत्व को दर्शाने के लिए किसी स्त्री दिवस जैसे उपलक्ष्य की आवश्यकता नही थी। नारी देश की पावन परम्पराओं से प्रतिबद्ध श्रेष्ठतम संस्कारों से परिष्कृत, अपने कत्र्तव्यों के प्रति संवेदनशील, सतत और सहज समर्पित है। नयी पीढ़ी को संस्कारित व सभ्य बनाने का कार्य एक मां, एक अध्यापक से भी श्रेष्ठ ढंग से कर सकती है।

मंगलकारी होती है स्त्रियां

चरक संहिता अनुसार घर से बाहर निकलते समय अगर कोई कन्या दिखायी दे तो यह एक शुभ लक्षण होता है। बच्चे के साथ किसी स्त्री का दिखायी देना भी एक शुभ सूचक होता है। अगर कोई दुश्चरित्र वाली स्त्री अथवा गंदे कपड़ों को धारण करने वाली स्त्री किसी रोगी की चिकित्सा के लिये चिकित्सक को बुलाने के लिये जाती है तो उस रोगी के बचने की सम्भावना नही होती।
प्राचीन काल की अपेक्षा वर्तमान की नारी के स्वरूप में पिछले दो दशकों से एक क्रान्तिकारी परिवर्तन हुया है। द्रुतगति से बढती नारी नौकरी की संस्कृति ने स्त्रियों के स्वरूप का काया कल्प ही कर दिया है।

स्त्री केवल घर की साज सज्जा व रसोयी घर तक ही सीमित नही है अपितु परिवार को अर्थिक रूप से सहायता करने व स्वयं आत्मनिर्भर होने के प्रयास में व नौकरी के कारण कई कई घण्टे बैठने से ,खानपान व रहन सहन में व्यापक परिवर्तन होने से स्त्री स्वास्थ्य भी प्रभावित हुया है।

ऋग्वेद एवं स्त्री रोग


ऋग्वेद के दसवे मण्डल के सूक्तों में गर्भणान, प्रसव, योनि और गर्भ के विषयों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। गर्भाशय व योनि रोगों के निवारण के लिये अग्नि आदि के उपयोग की आवश्यकता बतायी है। ऋचाओं के विधिवत् उच्चारण से वैदिक भिषक का योनिगत एवं गर्भाशय गत रोगों की चिकित्सा का निर्देश मिलता है। दशम मास में जन्म के वर्णन के साथ जरायु आदि के साथ ही अनेक प्रसव सम्बन्धित कृत्यों का उल्लेख मिलता है।

गर्भाशय रोग, योनि रोग, कृमि आदि की चर्चा बहुत स्थलो पर उपलब्ध है। पति पत्नी के परस्पर सम्पर्क में आने पर उत्पन्न रोग तथा उनका निवारण, पत्नी के दोष, लैंगिक व्यवहार, दस पुत्रों को उत्पन्न करना, प्रेम भाव से दाम्पत्य जीवन के दायित्वों का निर्वहन आदि विस्तार पूर्वक उल्लिखित है। अश्विनी कुमारों द्वारा बधिमती नामक स्त्री का सुख पूर्वक प्रसव का उल्लेख मिलता है।

स्त्रियों के लिये विशेष निर्देश


प्रकृति ने स्त्रियों की को कुछ विशिष्टताएं प्रदान की हैं। यथा रचना की दृष्टि से देखा जाए तो आर्तववह स्रोतस की उपस्थिति केवल स्त्रियों में ही मिलती है। स्त्रियों में पुरुषों की तुलना में मांसपेशिया अधिक होती है। सुश्रुत संहिता अनुसार पुरुष पच्चीस वर्ष की आयु में व स्त्री सोलह वर्ष की आयु में परिपूर्ण हो जाते है।

रक्तज गुल्म की उत्पत्ति स्त्रियों में ही बतायी है। स्त्री को अगर मुख में शोथ उत्पन्न वहां से वह अगर नीचे की ओर फैल जाए ते वह असाघ्य होती है। जबकि पुरुषों में अधों भाग से शुरु शोथ जब वह उपरी भाग में पंहुचे तो वह असाध्य होता है। वाजीकरण आहार विहार की योजना यद्यपि स्त्रियों को ही केन्द्रित करके की गयी है लेकिन स्त्रियों के लिये स्वयं वाजीकरण का प्रयोग निषिद्ध है। राजा, बालक, वृद्ध के साथ साथ स्त्रियों में रक्त मोक्षण करने के लिये जलौका का प्रयोग श्रेष्ठ बताया है। गर्भवती स्त्रियों को ग्रह आदि से रक्षा के लिये लाल कपड़े न पहनने का निर्देश है।

स्त्रियों में होने वाले रोग

स्तन्यरोग, सूतिका रोग स्तन कीलक, किक्किस ,योषापस्मार, सोम रोग, प्रदर, योनिरोग, योनिकन्द, गर्भरोग, स्तन रोग, रक्तज गुल्म जैसे रोग स्त्रियों को ही होते हैं। कुक्षि का शिथिल होना, हृदय बंधन का ढीला पड़ना, जघन प्रदेश में पीड़ा होना प्रसूता होने वाली स्त्री के लक्षण सुश्रुत ने बताये है। सुश्रुत संहिता में कहा है कि जो रोग औरों को साध्य होते है वही रोग जब वेदपाठी, बालक, वृद्ध, राजा व स्त्रियों को होते है तो वे कष्टसाध्य हो जाते है।

उत्सादन अर्थात स्नेह युक्त कल्क के उद्घर्षण से स्त्रियों का शरीर विशेष रूप से कान्तिमय होता है। गर्भस्राव और गर्भपात होने पर और योग्य समय पर प्रसव होने पर जो स्त्रियां अहितकर आहार विहार करती हैं उनको ज्वर व दाह के साथ रक्त विद्रधि की उत्पत्ति होती है। सुश्रुत ने आठ प्रकार के मूढ़ गर्भो का वर्णन किया हैं।

औषधियां

अशोकारिष्ट, पुष्यनुग चूर्ण, सुपारी पाक, पत्रांग आसव, आदि औषधियां स्त्रियों द्वारा प्रयोग के लिये प्रतिष्ठित हो चुकी है। आयुर्वेद के ग्रन्थों में स्त्री रोग प्रकरण के अतिरिक्त अन्य स्थलों पर वर्णित योग यथा, महाकषाय प्रकाण में स्तन्य जनन व स्तन्य शोधन महाकषाय का प्रयोग स्त्रियों के लिये ही निर्दिष्ट है। गुल्म रोग की चिकित्सा में निर्दिष्ट मिश्रक स्नेह भी योनिशूल में हितकर है। वातव्याधि की चिकित्सा में जिन का उल्लेख किया है उनमें से किसी एक तैल को ऋतुस्नाता को नियमित रूप से पिलाने से बन्ध्या स्त्री भी पुत्र पैदा करने में सक्षम हो जाती है। वातरक्त रोग की चिकित्सा हेतु वर्णित अमृताद्य तैल योनिदोष में हितकर है। उन्माद रोग की चिकित्सा में वर्णित कल्याणक घृत बन्ध्य स्त्री में प्रशस्त होता है।

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स्त्रियों के दुखदायक प्रसव में पाण्डु रोग में वर्णित दाड़िमाद्य घृत लाभ पंहुचाता है । इस योग के प्रयोग से ही बन्ध्य स्त्री गर्भधारण करने में समर्थ हो जाती है। ऋतुस्नान के उपरान्त अगर स्त्री त्रिमर्मीय चिकित्सा अध्याय में वर्णित महामायूर घृत का पान करती है तो निश्चित रूप से पुत्र की प्राप्ति होती है। इसी घृत का प्रयोग बन्ध्य स्त्री व योनि रोग के लिये श्रेष्ठ फलदायी है। वृन्द माधव ग्रन्थ में वर्णित फलघृत के प्रयोग से उस स्त्री को भी शतायु पुत्र प्राप्त होते हैं जिसके बच्चे पैदा होते ही मर जाते हैं।


बंगसेन ग्रन्थ में वर्णित फलघृत के सेवन से योनिशूल, योनिपीड़ा, योनिचलिता, योनिनिसृतः, योनिविकृता, पित्तज योनिविकार, योनि विभ्रान्ता,योनिषण्डत्व आदि रोगों को नष्ट कर योनि का विशोधन करता है। शांर्गधर संहिता में वर्णित लाक्षादि तैल की मालिश से गर्भ की पुष्टि होती है। गर्भधारण की इच्छा रखने वाली स्त्री के लिये शांर्गधर संहिता में ही बलादि तैल का प्रयोग श्रेष्ठ बताया है। दशमूलारिष्ट का प्रयोग भी बन्ध्या के लिए गर्भ स्थापक का काम करता है। प्रसूता के योनि संतर्पण, अभ्यंग, पान, बस्ति तथा भोजन में सुश्रुतोक्त बला तैल का प्रयोग करने का निर्देश है। इसी तैल का प्रयोग गर्भधारण में भी लाभ करता है।

मंगलकारी होती है स्त्री, जानिये इसका आयुर्वेदीय परिवेश


योगरत्नाकर ग्रन्थ में त्रिफला घृत के पान से योनिरोगों का नष्ट होना बताया है। हरड, बहेड़ा व आमला से बने क्वाथ में मधु का प्रक्षेप कर योनि पूरण करने से योननकन्द रोग नष्ट होता है। प्रसारिणी तैल के प्रयोग से बन्ध्या स्त्री संतान पैदा करने में समर्थ हो जाती है। नारायण तैल के प्रयोग से स्त्रियों की मन्द प्रज्ञा ठीक हो जाती है। शांर्गधरोक्त रास्नादि क्वाथ के सेवन से बन्ध्य रोग, योनि रोग ठीक हो जाते है। अश्मरी रोग की शल्य चिकित्सा बताते हुये स्पष्ट किया है कि स्त्रियों में गर्भाशय की स्थिति पार्श्व में निकट होने से शस्त्र प्रयोग उतान रूप से करना चाहिए।

पंचकर्म चिकित्सा

स्त्रियों में उत्तर बस्ति का प्रयोग ऋतु काल में करने का निर्देश है। गर्भस्राव होने पर स्त्री को स्नेहन का प्रयोग नही कराना चाहिए। गर्भवास्था में वमन करवाने का निषेध है। जिस गर्भिणी ने सप्तम मास प्राप्त कर लिया हो उसे निरूह अथवा आस्थापन बस्ति नही करवानी चाहिए। सिद्धि स्थान में लिखा है कि अनुवासन बस्ति का सेवन करने से स्त्री संतान की प्राप्ति हो जाती है। स्त्रियों मे बस्ति का प्रयोग करते समय अपत्यय मार्ग में बस्तिनेत्र को चार अंगुल प्रमाण अंदर प्रविष्ट करवाना चाहिए। यापन बस्तियों का प्रयोग करने से स्त्रियों को संतान की प्राप्ति होती है। राजा, बालक, वृद्ध, व स्त्रियों के दोषों को हरणे के लिये व उन के बल वर्ण की वृद्धि के लिये सुश्रुत संहिता में माधुतैलिक बस्तियों की कल्पना की है।

अकाल प्रसव में स्त्रियों में रक्त, क्लेद व मल का अवशेष रहने से उनमें स्नेहपान नही करवाना चाहिए अपितु पाचन और रूक्षण अैाषधियों का प्रयोग करना चाहिए। अनुवासन व निरूह बस्ति का निर्देश देते समय सुश्रुत ने कहा है कि उनमें स्नेह व क्वाथ की मात्रा पुरूषों को दी जाने वाली बस्ति की मात्रा से दो गुणा होनी चाहिए। उतान लेटी हुयी स्त्री के जानु को ऊंचा करके उत्तर बस्ति देनी चाहिए। इन्द्राणी को जब गर्भ की उत्पत्ति नही हुयी तो इन्द्र ने उसे अमृतपान करवाया।https://www.youtube.com/watch?v=SSAvg_2xhlk&t=49s

शास्त्र कहते है

स्त्रियों को गर्भावास्था में शीतल जल का निषेध है।
गर्भवती स्त्री की रक्षा के लिये चरक ने कहा है कि गर्भवती की उपचर्या तैल से पूर्ण उस पात्र की तरह होती है जिसे बिना छलके एक स्थान से दूसरे स्थान तक लेकर जाना होता है।
कटहल व गूलर की तरह स्त्री भी 12 वर्ष के बाद अन्तःपुष्पा हो जाती है।
रजस्वला स्त्री के रजोदर्शन के प्रथम दिन गर्भ की स्थापना होने से फल शून्य हो जाता है।
रजस्वला स्त्री के रजोदर्शन के तीसरे दिन गर्भ की स्थापना होने या तो सूतिका गृह में बालक की मृत्यु हो जाती है या फिर बालक दीर्घायु नही रहता ।
प्रसूता स्त्री को पुत्र उत्पन्न होने पर तैल व पुत्री उत्पन्न होने पर घी का सेवन करवाना चाहिए।
जिस स्त्री को दूध न आता हो , अथवा कम आता हो या फिर दूषित हो उसे स्नेहन करवाना चाहिए।http://healthyminute.in/%e0%a4%b2%e0%a4%b9%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%a8-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%87%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%8d/
अनूप कुमार गक्खड़, हरिद्वार

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