आयुर्वेद में तंत्र गुण

तंत्र गुण का उल्लेख आयुर्वेद में चरक संहिता में मिलता है। तन्त्र को शासन व शंसन अर्थात प्रतिपादन करने के कारण शास्त्र भी कहा जाता है। किसी तन्त्र के द्वारा हित, नित्य, धर्म व शुभ कार्यों में प्रवृित व अशुभ कार्यों से निवृत्ति तभी होती है जब वह शास्त्र गुणों से युक्त हो व दोषों से दूर हो। लोक में प्रचलित सभी शास्त्र समान रूप से अभीष्ट सिद्धि के साधक नही होते।
“शास्त्रमेवादितः परीक्षेत“ चरक अनुसार शास्त्र अध्ययन से पूर्व उसके गुण दोषों का विवेचन करने के उपरान्त ही उसमें पात्रता होने पर ही प्रवृत्त होना चाहिये। उभयलोक हितकारक शास्त्र ही श्रेष्ठ कहा जाता है। आयुर्वेद शास्त्र में यह गुण है कि यह शास्त्र धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की विवेचना करके इह लौकिक एवं पारलौकिक हित को सिद्ध करता है।
आचार्य चरक अनुसार निम्नलिखित गुणों से युक्त तन्त्र अन्धकार दूर कारज्ञान आलोकित करने मे समर्थ होते है।

1 सुमहशस्विधीरपुरुषसेवित तंत्र गुण


आयुर्वेद का अध्ययन, अध्यापन व तद् अनुकूल आचरण प्राचीन काले से ही ऋषि मुनियों द्वारा किया जा रहा है। पंचम वेद के रूप में प्रतिष्ठित आयुर्वेद का प्रयोग पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि के लिये किया जाता है। रसायन, वाजीकरण के प्रयोग से व्यक्ति को प्रीति, यश, सुख व धर्म एवं अर्थ को प्राप्ति होती है। अग्निवेश तन्त्र में निर्दिष्ट च्यवन ऋषि द्वारा च्यवनप्राश का सेवन व वैखानस ऋषि द्वारा ब्राह्मरसायन का सेवन आयुंर्वेद का ऋषिमुनियों के द्वारा प्रयोग को दर्शाता है। तन्त्र का यशस्वी पुरुषों द्वारा तन्त्र का प्रयोग सुमहशस्विधीरपुरुषसेवित तन्त्रगुण कहलाता है।

2 अर्थबहुल तंत्र गुण


जो शास्त्र अपेक्षित ज्ञान के साथ साथ सामयिक सम्बन्धित विषयों का भी ज्ञान करवाये, उसका यह गुण अर्थबहुल तन्त्रगुण कहलाता है। यथा आयुर्वेद शास्त्र में व्याकरण,ज्योतिष, वेदांग, नीतिशास्त्र, वैशेषिक दर्शन आदि विषयों से सम्बन्धित वर्णन मिलता है। वमन करवाते समय रोगी का मुख पूर्व की ओर व सोते समय सिर दक्षिण दिशा की ओर रखने का निर्देश ज्योतिष सम्बन्धी ज्ञान का प्रतीक है। ज्वर की चिकित्सा में भगवान शंकर की पूजा, राजयक्ष्मा की चिकित्सा में देव, गो आदि की पूजा धर्मग्रन्थ के विषय है । स्त्रियों से किस प्रकार का व्यवहार होना चाहिये , यह नीतिशास्त्र का विषय है।

3 आप्तजनपूजित तन्त्रगुण


जे शास्त्र यथार्थद्रष्टा व्यक्तियों ़द्वारा प्रशंसित हो। न्यायदर्शन में कहा है कि आयुर्वेद शास्त्र परम प्रामाणिक है। जब अग्निवेश आदि ऋषियों ने अपने अपने ग्रन्थ रचे तो उन्होने परस्पर तन्त्रों को पूजित कहा व परमऋषियों द्वारा अनुमत होने के कारण ही संहिताओं के रूप में प्रतिष्ठित हुये।

4त्रिविधशिष्यबुद्धिहित तंत्र गुण



जे शास्त्र तीनो प्रकार के शिष्यों के लिये समान रूप से हितकारी हो। आयुर्वेद शास्त्र को सभी प्रकार के शिष्यों के लिये ग्राह्य बनाने का प्रयास किया गया है। अल्पबुद्धि शिष्यों के लिये संकेत मात्र के लिये पचास महाकषायों का उल्लेख शास्त्र की गुणवत्ता का प्रतीक है। सभी प्रकार के शिष्यों की बुद्धि को ध्यान में रखते ही विषयों का प्रस्तुतिकरण किया गया है।

5 पुनरुक्तिदोषवर्जित तंत्र गुण


अधिकरण के कारण, विषय के अतिदीर्घ होने के स्थिति में , गुण एवं दोष एकत्र प्राप्ति के कारण, अर्थ का सम्बन्ध जोड़ने के कारण, स्तुतिपरक विवेचन में, संभव की स्थिति में, शिष्य बुद्धि की अभिवृद्धि के लिये, विषय का व्यवधान होने पर व विशेषण के रूप में वर्णन होने से – इनके अतिरिक्त जब एक ही बात को दो बार कहा जाए तो पुनरुक्ति दोष कहलाता है। तन्त्र को इस दोष से मुक्त होना चाहिये।

6 आर्ष तंत्र गुण

जब कोई ग्रन्थ किसी ऋषि के द्वारा प्रणीत होता है तो उसे सर्वातिशय सद्शास्त्र कहा जाता है। ऋषियों में रज और तम का अभाव होने के कारण और सत्वगुणकी बहुलता के कारण उनके द्वारा रचित ग्रन्थ सर्वदोष विमुक्त होने के साथ साथ गूढ़ तत्त्वों के प्रकाशक होते है।

7 सुप्रणीतसूत्रभाष्यसंग्रहक्र्रम तंत्र गुण


तन्त्र में सूत्रभाष्य एवं संग्रहक्रम उचित हो तो उसे उत्तम तन्त्र कहा जाता है। अल्पाक्षरों का समुदाय होता हुया भी जो बहुत अर्थो को बताने वाला होता है उसे सूत्र कहा जाता है। सूत्रों के अनुसार पदों द्वारा सूत्रों के भाष्य जहां वर्णित हो और रचयिता ने अपने विचारों को भी पदों द्वारा जहां स्पष्ट किया हो, उसे भाष्य कहते हैं। चरक सुश्रुत आदि सभी संहिताए सभी सूत्र सुप्रणीतसूत्रभाष्यसंग्रहकम तन्त्रगुण के उदाहरण है।

8 शोभनाभिधेय

जिस तन्त्र का अभिधेय श्रेष्ठ हो वह शोभनाभिधेय तन्त्रगुण कहलाता है। आयुर्वेद का अभिधेय विषय आयु है। हितायु, अहितायु, सुखायु व दुखायु का वर्णन इसमें मिलता है। आयुर्वेद के ग्रन्थों में आयु सम्बन्धित विषयों का उल्लेख विस्तार से प्राप्त होता है। अन्य विषय भी आयु को अभिधेयय करके लिखे गये है।

9 अनवपतितशब्द


जिस शास्त्र में ग्राम्य अर्थात अशुद्ध शब्दों का प्रयोग नही हुया हो। ग्राम्य शब्दों के प्रयोग से संशय बना रहता है। तन्त्रकर्ता का तत्कालीन देश, कालादि से प्रभावित होना स्वाभाविक होता है। शास्त्र के मौलिक स्वरूप के प्रदर्शन में अभद्र तथा एकदैशेक शब्दों का प्रयोग सर्वदा अवांछनीय होता है। होलाक, जेन्ताक खुड्डिका आदि शब्दों का प्रयोग ग्राम्य नही है अपितु सार्थक एवं तन्त्र अनुमादित है।

10 अकष्टशब्द तंत्र गुण

तन्त्रागत शब्दों के उच्चारण में कठिनाई नही होना। वस्तुतः किसी भी ग्रन्थ में यह गुण होना आवश्यक है कि उसमें वर्णित विषय का अध्ययन सुगमता से हो सके। आयुर्वेद के ग्रन्थों की यह विशेषता है। वर्तमान में अगर आयुर्वेद के ग्रन्थ को पढ़ने में व उसका उच्चारण करने में कठिनाई होती है तो उसमें दोष ग्रन्थ का नही अपितु पढ़ने वाले विद्यार्थियों के संस्कृत के अभ्यास में कमी होने के कारण होता है।

11 पुष्कलाभिधान तंत्र गुण

– विषय का स्पष्ट ज्ञान कराने वाला वाक्य। जब ग्रन्थ में इस प्रकार के वाक्यों का प्रयोग होता हो जिससे सुस्पष्ट व युक्तियुक्त अर्थ की प्राप्ति होती है।हेतु, लिंग व औषध त्रिसूत्र रूपी आयुर्वेद स्वस्थ व आतुर दोनो प्रकार के पुरुषों के लिये हितकर, शाश्वत ण्वं पुण्य को देने वाला है। इस प्रकार के स्पष्ट अर्थ बताने वाले वाक्य आयुर्वेद के ग्रन्थों में मिलते है।

tantra guna

12 क्रमागतार्थ

http://healthyminute.in/ayurveda-treatment-precautions-care-to-be-taken-in/क्रमभंग दोषरहित होना क्रमागतार्थ तन्त्रगुण कहलाता है। विषय का वर्णन क्रमशः होना क्रमागतार्थ कहलाता है। जैसे तेरह प्रकार के अधारणीय वेगों का उल्लेख करके उसी क्रम में उनका वर्णन करना। पचास प्रकार के महाकषाय का नाम उल्लेख करके उसी क्रम में उनका वर्णन करना।

13 अर्थतत्त्वविनिश्चय



जो शास्त्र अपने मूल तत्त्व का सर्वत्र विनिश्चायक हो अर्थात् जिसमें प्रधान विषय का आद्यान्त समान रूप से प्रसार दिखायी दे। यथा चरक संहिता में काय चिकित्सा, सुश्रुत संहिता में शल्यतन्त्र व काश्यप संहिता में बाल रोगों से सम्बन्धित विषय सामाग्री मिलती है। इसमें प्रधान तत्त्व को छेड़े बिना सहायक अर्थों का वर्णन भी मुख्य विषय की पुष्टि के लिये किया गया है।

14 संगर्ताथ तंत्र गुण


जो शास्त्र अपने प्रयोजन का सफलतापूर्वक प्रतिपादन करे, उसे संगर्ताथ कहा जाता है। स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्ष करना व आतुर के विकार का प्रशमन करना – यह आयुर्वेद का प्रयोजन है। आयुर्वेद के ग्रन्थों में इसी को केन्द्रित करके विषयों का वर्णन किया गया है। चरक, सुश्रुत आदि संहिताओं में प्रस्तुत इसी प्रयोजन की सिद्धि के लिये है।

15 असंकुलप्रकरण तंत्र गुण



विषय के प्रकरण आपस में मिले हुये न हो। जिस शास्त्र में विषय अंसकुलित अर्थात अमिश्रीभूत प्राप्त होते हैं। जैसे प्रमेह चिकित्सा अध्याय में प्रमेह रोग का वर्णन, कुष्ठ चिकित्सा अध्याय में कुष्ठ चिकित्सा का ही वर्णन। कुछ स्थलों पर ऐसे प्रकरण प्राप्त होते हैं जहां अध्याय के नाम के अनुरूप विषय का उल्लेख उस अध्याय में प्राप्त नही होता। यथा अर्थेदशमहामूलीय अध्याय में हृदय के वर्णन के साथ साथ आयुर्वेद के अन्य विषयों का वर्णन प्राप्त होता है।

16 आशुप्रबोधक

तन्त्र में विषय को स्पष्ट करने का सामथ्र्य होना। यथा आयुर्वेद वांगमय । उसमें चिकित्सा शास्त्र का सही अर्थ अभिप्रेत है। इसमें विषय को वर्णन स्पष्ट रूप से किया गया है।

17लक्षणवत्



जिस शास्त्र का अपना लक्षण हो। यथा आयुर्वेद का अपना लक्षण है कि
श्हिताहितं सुखं दुखमायुस्तस्य हिताहितम्।
मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यतेश्
इसी तरह ज्वर, मन, आत्मा, इन्द्रिय आदि के अपने लक्षण है।https://www.youtube.com/watch?v=R9DAnjqU6hc&list=PLAi4F6MiksSHvazrp9NllksiwPFveY8uj

18 उदाहरणवत् तंत्र गुण


“मूर्खविदुषां बुद्धिसाम्यविषयो दृष्टान्तः“
मूर्ख और विद्वान एक मति हो जायें वह उदाहरण कहलाता है।

जैसे चरक संहिता में लिखा है कि गर्भवती स्त्री की रक्षा उस तरह करनी चाहिये जिस तरह तैल से भरे हुये घड़े को बिना हिलाये एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है। इस उदाहरण से प्रत्येक व्यक्ति समझ सकता है कि गर्भवती स्त्री की देखभाल में किस प्रकार की सुरक्षा करनी चाहिये।

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