विषयः अष्टांगहृदय एवं मौलिक सिद्धान्त
                           ताच्छील्य - अनूप कुमार गक्खड़

ताच्छील्य स्वभाव साम्य बताने वाला भाव है। शीलस्य भावः शील्यम्, तस्य शील्यं ताच्छील्यम् अनुसार ताच्छील्य स्वभाव-साम्य को बताने वाला एक भाव है। दो पदार्थों की स्वाभाविक समता को आधार बनाकर वर्णन करने की शैली सर्वदा रही है। आचार्यों का सर्वदा यह प्रयास रहा है कि गूढ़ विषयों का प्रस्तुतीकरण भी सरल ढंग से करें। आचार्यों का सहज स्वभाव ही ताच्छील्य के रूप में व्यक्त होता है। ताच्छील्य के सत्रह प्रकार के है। ताच्छील्य, अवयव, विकार, सामीप्य, भूयस्तव, प्रकार, गुणगुणीविभव, संसक्तता, तद्धर्मता, स्थान, तादथ्र्य, साहचर्य, कर्म, गुणनिमित्त, चेष्टानिमित्त, मूलसंज्ञा एवं तात्स्थ्य।

1ताच्छील्य

ताच्छील्य वर्णन के अन्तर्गत वत ताच्छील्यों के स़त्रह भेदों में से प्रथम भेद ताच्छील्य ही है। विद्यार्थियों का सुगमता से इस विषय में प्रवेश हो सके इसलिये इसके भेदों को ताच्छील्य के नाम से ही प्रारम्भ किया गया है। कहा गया है कि “यत्केनचिदेव धर्मसादृश्येन युक्तो भावस्ताच्छील्यमुच्यते“। अर्थात किसी धर्म विशेष के सादृश्य से युक्त भाव को ताच्छील्य कहते हैं। सर्वांगाश्रित वायु के कारण अंगों में सुप्ति लक्षण मिलता है। यहां वास्तव में अंगों में सुप्ति नही होती । जिस प्रकार सोये हुये व्यक्ति में किसी प्रकार की वेदना नही होती उसी तरह अंगों में चेतनता नही महसूस होती। धनुष से सदृश होने के कारण धनुःस्तम्भ रोग, उड़द के स्वरूप होने के कारण मषक, तिल के स्वरूप के होने के कारण तिलकालक आदि नामकरण इसी ताच्छील्य के उदाहरण है।

2अवयव

जहां एक देशीय उदाहरण के कथन से उसी धर्म वाले अन्य देशीय अर्थ की सिद्धि हो जावे, वहां अवयव नामक ताच्छील्य होता है। “यत्रैकदेशोदाहरणे क्रियामाणेऽनुक्तोऽन्योऽपि तज्जातीयोऽर्थो लभ्यते“।
दोष, धातु एवं मलों में से किसी भी वातादि के अंश के वर्णन से समस्त शरीर के वातादि का वर्णन हो जाता है। यथा लंघन के द्वारा दोष क्षपित होने पर एवं शरीर में लघुता उत्पन्न होने से स्वास्थ्य, क्षुधा, प्यास, अग्नि ,बल तथा ओज की उत्पत्ति होती है। इसके विपरीत अलंघन करने से अर्थात लंघन न करने से दोषों का क्षपण भी न हो तो विपरीत अस्वास्थ्य तत्त्वों की प्राप्ति निश्चित है। चावल के ढेर और चावल के दाने में संख्या को छोड़ कर गुणवत्ता में कोई अंतर नही होता। अवयव व अवयवी के गुणों मे समानता होती है।

3 विकार

जहां प्रकृति अथवा विकृति में से एक के अभिधान से तद्विपरीत द्वितीय की प्राप्ति हो जावे वहां विकार नाम का ताच्छील्य होता है। किसी पदार्थ की अवस्था में परिवर्तन होना विकार कहलाता है। व्यवहार में गुड़ चीनी आदि इक्षु विकार, दधि, घृत आदि क्षीर विकार कहलाते है। पत्रादि शाक बनाने पर उसके गुणों में परिवर्तन हो जाते हैं लेकिन उसको फिर भी शाक ही कहा जाता है।
4 सामीप्य

4 सामीप्य


इस ताच्छील्य का उल्लेख आचार्य अरुणदत्त द्वारा नही किया गया। महाकषाय के प्रकरण में वर्णित प्रत्येक गण के दस द्रव्यों में कर्म सामीप्य होता है। घृत, तैल, वसा व मज्जा में गुणों की दृष्टि से सामीप्य है इन सबको स्नेह के नाम से जाना जाता है। चरक संहिता पर भट्टार हरिचन्द्र द्वारा लिखी गयी टीका चरकन्यास टीका में सामीप्य को संश्लेष के नाम से कहा है।
5 भूयस्त्व

5 भूयस्त्व


भूयस्त्वका शाब्दिक अर्थ होता है अधिक्य। द्रव्यों में प्राप्त होने वाला कोई धर्म जब किसी द्रव्य में बहुलता से मिले तो उसे भूयस्त्व ताच्छील्य कहा जाता है। यथा जब कहा जाये कि जामुन वात का प्रकोप करता है इसका अर्थ यह नही कि केवल जामुन ही वात का प्रकोप करता है अपितु उपलब्ध द्रव्यों में से इसमें वातप्रकोपक शक्ति अधिक है। इसी तरह खदिर कुष्ठघ्न है,शेष द्रव्यों की तुलना में इसमें कुष्ठनाशक शक्ति अधिक है। अम्ल रस भोजन में रुचि पैदा करता है अर्थात मधुरादि द्रव्यों की तुलना में इसकी भेजन में रुचि पैदा करने की क्षमता अधिक है। हरीतकी में पथ्यत्व धर्म अधिक होने के कारण उसे पथ्यतम कहा है। आमलें में पांच रस होते हुये भी अम्ल रस की प्रधानता के कारण उसे अम्लरस वाला कहा जाता है।
6 प्रकार

6 प्रकार


जो जिसके समान धर्मवाला होता है वह उसका प्रकार कहलाता है। यथा एरण्डनाल का स्पर्श करके वमन करवाना चाहिये। इससे एरण्डनाल के समान धर्मवाले यथा शतपुष्पा व हुलहुल की नाल का भी ग्रहण हो जाता है। यह प्रकार भेद का ताच्छील्य है।
विषय का प्रकार भेद से वर्गीकरण विषय को और स्पष्ट करता है। आठ प्रकार के उदर रोग, सात प्रकार के कुष्ठ रोग, बीस प्रकार के प्रमेह, छः प्रकार के अतिसार, पांच प्रकार के पाण्डु रोग, चार प्रकार के अपस्मार प्रकार ताच्छील्य के उदाहरण है। रोग प्रभाव भेद से साध्य असाध्य दो प्रकार के , अधिष्ठान भेद से षरीर व मन दो प्रकार के, वेग काल अनुसार संततादि ज्वर के पांच प्रकार इसी के उदाहरण है।
7 गुणिगुणविभव

7 गुणिगुणविभव


गुण शब्द से गुणि का व गुणि शब्द से गुण का का कथन गुणिगुणविभव कहलाता है।
सामान्य वृद्धिकारणंम् स्पष्ट संकेत देता है कि किसी भी पक्ष की वृद्धि तभी सम्भव है जबकि दोनो में द्रव्यतः गुणतः अथवा कर्मतः एकरूपता हो। यह ताच्छील्य इसी भाव को इगित करता है। पार्थिवादि गुणों से पार्थिवदि गुणों की वृद्धि कही गयी है। वस्तुतः पार्थिव गुणो ंसे पार्थिव गुणों की वृद्धि नही होती अपितु पार्थिव गुण युक्त द्रव्यों से उक्त गुणों की वृद्धि होती है। रसायन सेवन से ऋषियों ने मेधा,स्मृति बल आदि की प्राप्ति की वस्तुतः रसायन के गुणों को इंगित करती है।
8 संसक्तता

8 संसक्तता


“यदेकस्य बहुभिः सम्बन्धः“ जहां एक का अनेक के साथ सम्बन्ध हो। वहां ससंक्तता होती है। काले हरिण के मांस में षडरस की संसक्तता होती है। हरीतकी में लवण रस को छोड़कर पंचरस की ससंक्तता होती है। रसोन में अम्ल रस को छोड़कर पंचरस की संसक्तता होती है।
9 तद्धर्मता

9 तद्धर्मता


“येन तथाभूतं सत्तद्धर्मतामासाद्य दर्शनात्तमेवाख्यां लभते“।
जहां एक वस्तु अन्य वस्तु के तुल्य होकर उसी के धर्म को प्राप्त करने के कारण उसी नाम से प्रसिद्ध हो जाए वहां तद्धर्मता ताच्छील्य होता है। जिस चिकित्सक को शास्त्र का अर्थ नही आता, ऐसे वैद्य को यमराज के समान कहा गया है। यथा यमराज भी मृत्यु देता है और ऐसा अज्ञानी वैद्य भी मृत्य देता है । दोनो के धर्म में समानता होने के कारण यहा्र तद्धर्मता ताच्छील्य परिलक्षित होता है। भल्लातक को अग्नि ,आयुर्वेद को अमृत व चित्रक को दहन कहना इसी ताच्छील्य के उदाहरण है।
10 स्थान

10 स्थान


स्थान से स्थानी का ज्ञान और स्थानी से स्थान का ज्ञान स्थान ताच्छील्य कहलाता है। यथा त्वचा से स्पर्श का ज्ञान प्राप्त किया जाता है वास्तव में स्पर्श का ज्ञान स्पर्शनेन्द्रिय से किया जाता है । त्वचा स्पर्शनेन्द्रिय का अधिष्ठान है। यहां स्थान से स्थानी का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। इसी तरह जब कहा जाता है कि किसी वस्तु का रस जिव्हा से प्राप्त किया जाता है जबकि रस ज्ञान रसनेन्द्रिय से होता है । सामान्य दृष्टि से स्थान व स्थानी के इस प्रकार उल्लेख से विषय समझ में तो आ जाता है लेकिन सूक्ष्म विश्लेषण हेतु इनका अलग से ज्ञान अपेक्षित है।
11 तादथ्र्य

11 तादथ्र्य


“यत्प्रयोजनार्थं प्रवर्तते यो भावस्तेनैव व्यपदिश्यते“ । जो पदार्थ जिस प्रयोजन के लिये निमित्त हो उसी नाम से उपदेश करना तादथ्र्य कहलाता है। इस शब्द का समान्य अर्थ है कि उसके लिये अथवा उसके निमित्त। यथा मदनफल द्रव्य छर्दनार्थ प्रयोज्य है। मदनफल का प्रयोजन छर्दन कर्म है। छर्दनीय द्रव्य छर्दन के लिये ही हो सकता है अन्य के लिये नही।
12साहचर्य

12साहचर्य


“यो येन नित्यं सम्बन्ध उपलभ्यते, स तस्मात् सम्बन्धात्तमेव सम्बन्घिशब्दं लभते“। जो पदार्थ जिस वस्तु से नित्य सम्बन्ध ही उपलब्ध होता है, जब वह उस सम्बन्ध के द्वारा सम्बन्घि शब्द को प्राप्त करता है, उसे साहचर्य कहते हैं। विकार में धातुविषमता अवश्य होती है। दोष साम्य का आरोग्य के साथ साहचर्य सम्बन्ध है।
13 कर्म

13 कर्म


“यत्राकर्म कर्मेति चोपचर्यते“ अर्थात जो कर्म नही होते हुए भी कर्म के समान व्यवहृत होता हो उसे कर्म ताच्छील्य कहते हैं। उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुंचन, प्रसारण एवं गमन के अतिरिक्त जिसको कर्म के रूप प्रदर्शित किया जाये उसे कर्म ताच्छील्य कहा जाता है। अगर यह कहा जाए कि ऋषिगण प्रशम को गये । वस्तुतः प्रशम किसी भी स्थान का नाम नही है जहों किसी प्रकार का गमन सम्भव नही है। प्रशम का अर्थ है इन्द्रियो का अपने विषयों पर नियमन। दर्शन स्पर्शन आदि कर्मो से क्रिया निवृत्ति के लिये गति से अर्थ को लिया गया है। विषयों की क्रिया निवृत्ति को यहां कर्म लिया गया है। शास्त्रों में अतिश्योक्तिपूर्ण रूप से वर्णन करते समय भी अकर्म को कर्म के रूप मे ंप्रतिपादित किया है।
14 गुणानिमित्त

14 गुणानिमित्त


“यत् कस्य विभूतिः प्रशंसादिका ख्याप्यते“ किसी का महत्व प्रशंसा के रूप में व्यक्त करना गुणनिमित्त ताच्छील्य कहलाता है। यथा रसायन के योगों के सेवन से हजार वर्षो की आयु प्राप्त होती है। वाजीकरण योगों के सवेन से सत्तर वर्ष का व्यक्ति भी उत्तम शक्ति के साथ संतान उत्पन्न करने के योग्य हो जाता है।
15 चेष्टानिमित्त

15चेष्टा निमित्त

https://www.youtube.com/watch?v=rN3tMfTmIhw&t=15s
जिस वाक्य में किसी भाव की क्रिया का केवल नाम लेकर उल्लेख किया हो अर्थात जहां किसी पदार्थ विशेष की क्रिया से साम्य प्रकट करते हुए साक्षात क्रिया रूप नही होते हुए भी क्रिया का नाम संकीर्तन कर वर्णन किया गया हो, चेष्टा निमित्त ताच्छील्य कहलाता है।
व्यवहार में कहा जाता है कि “दीपवदनस्य ज्ञानं ज्वलति“ इसका ज्ञान दीपक के समान प्रज्वलित हो रहा है। स्पष्ट है कि ज्ञान और दीपक का परस्पर साम्य नही है । साक्षात कर्म नही होते हुए भी तत्समान कार्य का आरोप किया गया है। यही चेष्टा साम्य ताच्छील्य का आधार है।

16 मूलसंज्ञा


जो संज्ञा लोक में जिस अर्थ के लिये प्रयुक्त हो , तन्त्र में किसी अन्य अर्थ में ग्रहण किया गया हो तो उसे मूलसंज्ञा नामक ताच्छील्य के नाम से जाना जाता है। यथा रूप शब्द से लोक में विभिन्न नील, पीत आदि वर्णो को ग्रहण किया जाता है जबकि आयुर्वेद में यह रोग के लक्षणों के लिये प्रयुक्त हुया है। त्रिफल से तीन फल ग्रहण किये जाते हैं जबकि आयुर्वेद में त्रिफला से तीन फल , हरड़, बहेड़ा व आमला ही ग्रहण किये जाते हैं। धातु शब्द लोक में लोह, ताम्र आदि को जबकि आयुर्वेद में रस, रक्त आदि को ग्रहण किया जाता है।
17 तात्स्थ्य

17 तात्स्थ्य

जहां अन्य के अर्थ को स्थान विशेष में स्थित होने के कारण ही अन्य अर्थ का कल्पित किया जाता है, वहां तात्स्थ्य ताच्छील्य होता है। किसी भी प्रकार की वेदना का अर्थ यह भी होता है वह शरीर चेतन शील है। चैतन्य स्वरूप आत्मा में ही वेदना सम्भव है। स्थान अनुसार भी अक्षिशूल, अस्थिशूल आदि का भी व्यवहार में नाम लिया जाता है।

 

 

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