पापकर्म
          Anup kumar Gakkhar

पुराणों का सार कहा गया है कि परोपकार करना पुण्य है और दूसरो का अपकार करना, अकल्याण करना पाप है, यही धर्म है। पापकर्मों से लिप्त व्यक्ति अनेक रोगों का आश्रयस्थली होता है। वाग्भट्ट ने अष्टांगहृदय में दस प्रकार के पापकर्म बताएँ हैं। चरक संहिता में कुष्ठ रोग, श्वित्र, उदर रोग व क्रिमिज शिरोरोग की उत्पत्ति में पापकर्म भी एक कारण बताया हैं।

गर्भपात का पाप ब्रह्महत्या के पाप से दुगना होता है

महर्षि पराशर के अनुसार जो पाप ब्रह्महत्या से लगता है उससे दुगना पाप गर्भपात करने से लगता है। जो मनुष्य गोवध करके उसे छिपाना चाहता है वह निश्चय ही कालसूत्र नामक नरक में जाता है। गौ को मारने व उसको किसी भी प्रकार की पीड़ा पहुंचाना पााप है। देवल स्मृति में लिखा है कि किसी पापी का पाप दूसरे मनुष्य पर भी संक्रमण कर लेता है। उसमें अनेक हेतु है। पापी के साथ बातचीत करने से, उसके स्पर्श से, उसकी संासे लगने से, उसके साथ चलने से बठने से खान से, एवं उसके लिये यज्ञ करने, उसे पढ़ाने से तथा उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करने से पापी का पाप मनुष्य पर सक्रान्त हो जाता है।

इस जन्म के पापकर्म अगले जन्म में भी देते हैं रोग

पापकर्म सम्बन्धी दोष केवल इस जन्म में नहीं अपितु अगले जन्म भी रोगों के कारण बनते हैं। गौतम स्मृति के अनुसार तेल, घी व चिकनी वस्तुओं को चुराने से क्षय रोग उत्पन्न होता है। त्वचा पर चकते भी इसी कारण पड़ते हैं। पतित योनियों का भोग भी इसी कारण भोगना पड़ता हैं। गुरु की ताड़ना करने पर उस को मारने वाले अपस्मार का रोगी होता है। दुराचार करने वाला अगले जन्म में खल्वाट, अर्थात सिर पर बाल न होना का रोगी बनता है। अनियमित व स्वच्छन्द यौनाचार अगले जन्म में मधुमेह का रोगी बनाता है। अपने ही गोत्र की स्त्री से गमन करने पर श्लीपद रोग होता है। रजस्वला की दृष्टिदोष से दूषित भोजन का सेवन करने से कृमि रोग होता है।

देवमन्दिर में या पुण्य जल में मूत्र विष्ठा त्यागने पर भगन्दर रोगी होता है।

पीठ पीछे निन्दा करने वाला अगले जन्म में श्वास का रोगी होता है। शातातप स्मृति के अनुसार दूसरों को दुःख देने वाला अगले जन्म में शूल का रोगी होता है। वन में आग लगाने वाला रक्तातिसार का रोगी होता है। देवमन्दिर में या पुण्य जल में मूत्र विष्ठा त्यागने पर भगन्दर रोगी होता है। स्त्री के गर्भ को गिराने वाले को यृकत रोग की शिकायत होती है। रांगा चुराने वाले को नेत्र रोग, नाना प्रकार के द्रव्य चुराने वाले को संग्रहणी, तेल चुराने वाले को खुजली, फल चुराने वाले को अंगुली में घाव और औषध चुराने वाले को आधा सीसी रोग होता है। देव द्रव्य चुराने वाला ज्वर का व पका अन्न चुराने वाला जिह्वा का रोगी होता है।https://www.youtube.com/watch?v=78vQX8nxsW0&list=PLAi4F6MiksSEFE1eD7OEV2rweVV-Jk4qO

किसी के प्रति अकारण पापकर्म स्वयं को ही नष्ट करता है।

पाप करने वाले के प्रति कहा गया है कि बदले में स्वयं पाप न करे। अपराधी से न बदला ले। सदा साधु स्वभाव से ही रहे। जो पापी किसी के प्रति अकारण पाप करना चाहता है, वह स्वयं ही नष्ट हो जाता है। सुश्रुत संहिता में कहा गया है कि पापियों की चिकित्सा न करे। पाप कर्म में लिप्त व्यक्तियों की छाया को नहीं लांघना चाहिए. पाप कर्म में लिप्त व्यक्ति को रसायन का लाभ प्राप्त नहीं होता। पापकर्म में लिप्त व्यक्ति चन्द्रमा के तुल्य सोम को प्राप्त नहीं कर सकता।

इनसे होती है पापकर्म से मुक्ति

शतपाक बलातैल के सेवन से व्यक्ति सभी पापों से मुक्त होकर सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है। कल्याणक घृत के सेवन से शरीर की शोभा और पाप नष्ट होते है। यम स्मृति में लिखा है कि अगर पांच वर्ष से कम आयु वाला बालक कोई पापकर्म करे तो उसे कोई पाप नहीं लगता। धर्म के आचरण से पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं। महर्षि वसिष्ठ अनुसार आग लगाने वाला, विष देने वाला, हाथ में शस्त्र लेकर मारनेवाला, धन का आपहरण करने वाला, क्षेत्र भूमिका अपहरण करने वाला व स्त्री का अपहरण करने वाले का वध करने वाले का पाप नहीं लगता।http://healthyminute.in/%e0%a4%86%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b0/
प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़

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