मंत्र चिकित्सा आयुर्वेद
    Anup Kumar Gakkhar

मंत्र वह शब्द या वाक्य है जिनके जप से देवताओं को प्रसन्न किया जाता है अथवा किसी सिद्धि की प्राप्ति की जाती है। मन्त्रो द्वारा यज्ञ का विधान है। उनका उच्चारण देवताओं को प्रसन्न करने के साथ-साथ कामना कर सिद्धि करता है। चिकित्सा के क्षेत्र में भी मन्त्रों का प्रयोग निर्दिष्ट हैं।
आयुर्वेद में मन्त्रों द्वारा चिकित्सा दैवव्यापाश्रय चिकित्सा के अन्तर्गत आती है। आयुर्वेद में चिकित्सा के तीन प्रकार कहें हैं-दैवव्यापाश्रय, युक्तिव्यापाश्रय, सत्त्वावजय। मंत्र, औषध, मणि, मंगल, बलि, उपहार, होम, नियम, प्रायश्चित, स्वत्ययन प्रणिपात तथा गमन आदि द्वारा होने वाली चिकित्सा को दैवव्यापाश्रय कहा जाता है।
त्रिविधमौषधमिति-दैवव्यापाश्रयं, युक्तिव्यापाश्रयं, सत्वावजयश्च। तत्र दैवव्यापाश्रयंमन्त्रौषधिमणिमंगलबल्युपहारहोमनियमप्रयाश्चित्तोपवासस्वत्ययनप्रणिपातगमनादि—-चरक सूत्र 11/54
चरक विमान स्थान में भी कहा गया है कि मंत्र, औषध, मणि, मंगल, बलि, उपहार, होम, नियम, प्रायश्चित, स्वत्ययन प्रणिपात तथा गमन आदि द्वारा होने वाली चिकित्सा को दैवव्यापाश्रय कहा है।
तत्र दैवव्यपाश्रयं। मन्त्रौषधिमणिमङ्गलबल्युपहारहोमनियमप्रायश्चित्तोपवासस्वस्त्ययनप्रणिपातगमनादि—- चरक विमान 8/87
अथर्ववेद में दान, स्वस्त्ययन, बलि, मंगल, होम, नियम, प्रायश्चित, उपवास एवं मंत्र आदि के परिग्रह द्वारा चिकित्सा बतायी है और चिकित्सा का प्रयोग आयु के हितार्थ करने के कारण आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद भी कहा है।
तत्र भिषजा पृष्टेनैवं चतुर्णामृक्सामयजुरथर्ववेदानामात्मनोऽथर्ववेदे भक्तिरादेश्या वेदो ह्याथर्वणो दानस्वस्त्ययनबलिमङ्गलहोमनियमप्रायश्चित्तोपवासमन्त्रादिपरिग्रहाच्चिकित्सां प्राहः चिकित्सा चायुषो हितायोपदिश्यते ।।
चरक सूत्र 30/ 21
मन्त्रों का प्रयोग विभिन्न प्रयोजनों के लिये किया गया है। स्वयं के कल्याण की कामना से अधोलिखित मन्त्र के प्रयोग का निर्देश है।
अग्नि देवता मेरे शरीर से बाहर न निकले, वायु देवता मेरे प्राणों को धारण करे, विष्णु मुझे बल प्रदान करें, इन्द्र मुझे पराक्रमी बनाये तथ वरुण देवता मेरे शरीर में प्रवेश करे।
अग्निर्मे नापगच्छेच्छरीराद्वायुमें प्राणानादधातु विष्णुर्मे बलमादधातु इन्द्रो में वीर्यं शिवा माँ प्रविशन्त्वाप आपोंहिष्ठेत्यपः स्पृशेत्, द्वि परिमृज्यौष्ठौ पादौ चाभ्युक्ष्य मूर्धनि खानि चोपस्पृशेदचोपस्पृशेदद्भिरात्मानं हृदयं शिरश्च।। चरक सूत्र 8 / 28

वमन कराते समय


वमन कराते समय देवता, अग्नि, द्विज, गुरु, वृद्ध एवं चिकित्सक की पूजा करते हुये शुभ नक्षत्र, तिथि, करण, मुहूर्त व ब्राह्मणों द्वारा स्वस्तिवाचन, कराकर उनके आशीर्वचनों से अभिमन्त्रित मधुयष्टी मधु, सैन्धव नमक, एवं फाणित से युक्तमदनफल कषाय का पान करवाने का कहा है।
ततस्तं पुरुषं स्नेहस्वेदोपपन्नमनुपहतमनसमभिसमीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं शिरःस्नातमनुलिप्तगात्रं स्रग्विणमनुपहतवस्त्रसंवीतं देवताग्निद्विजगुरुवृद्धवैद्यानर्चितवन्तमिष्टे नक्षत्रतिथिकरणमुहूर्ते कारयित्वा ब्राह्मणान् स्वस्तिवाचनं प्रयुक्ताभिराशीर्भिरभिमन्त्रितां मधुमधुकसैन्धवफाणितोपहितां मदनफलकषायमात्रां पाययेत्।।
चरक सूत्र .15 / 9
आगन्तुज शोथ की चिकित्सा मंत्र के द्वारा होती है।
ते पुनर्यथास्वं हेतुव्यञ्जनैरादावुपलभ्यन्ते निजव्यञ्जनैकदेशविपरीतैःय बन्धमन्त्रागदप्रलेपप्रतापनिर्वापणादिभिश्चोपक्रमैरुपक्रम्यमाणाः प्रशान्तिमापद्यन्ते।। चरक सूत्र 18/5
उन्माद की चिकित्सा में कहा गया है कि रति एवं अभ्यर्चना की इच्छा सेआविष्ट ग्रहों की चिकित्सा मंत्र, औषधि, मणिधारण, मंगलकार्य, बलि, उपहार, होम, व्रत, प्रायश्चित, उपवास, स्वस्त्ययन, प्रणिपात आदि उपायों से करनी चाहिए।
तयोः साधनानि। मन्त्रौषधिमणिमङ्गलबल्युपहारहोमनियमव्रतप्रायश्चित्तोपवास स्वस्त्ययनप्रणिपातगमनादीनि।
एवमेते पञ्चोन्मादा व्याख्याता भवन्ति।। चरक निदान 7/17
दोषज अपस्मार के लिये तीक्ष्ण संशोधन और उपशमन चिकित्सा का तथा आगंतुज के संयोग में मन्त्रादि का प्रयोग निर्दिष्ट है।
हितान्यपस्मारिभ्यस्तीक्ष्णानि संशोधनान्युपशमनानि च यथास्वं, मन्त्रादीनि चागन्तुसंयोगे।। चरक निदान 8/10
आयुर्वेद का अध्ययन प्रारम्भ करते समय विधानानुुसार ब्रह्मा, अग्नि, धन्वन्तरि, प्रजापति, अश्विनिकुमारों, इन्द्र, ऋषि तथा अन्य सूत्रकारों को अभिमंत्रित कर आशीर्वाद युक्त मन्त्रों द्वारा स्वाहा कहते हुये घृत तथा मधु द्वारा अग्नि में होम करने के लिये कहा है।
त्रिस्त्रिर्जुहुयादग्निमाशीःसम्प्रयुक्तैर्मन्त्रैर्ब्रह्माणमग्निं धन्वन्तरिं प्रजापतिमश्विनाविन्द्रमृषींश्च सूत्रकारानभिमन्त्रयमाणः पूर्वं स्वाहेति।।
चरक विमान 8/11

उत्तम संतान प्राप्ति में मंत्र


उत्तम संतान प्राप्ति के लिये उत्पत्ति की प्रक्रिया प्रारम्भ करते समय इस मंत्र का प्रयोग करने का निर्देश है।
हे गर्भ तुम सूर्य के समान हो, तुम मेरी आयु हो तुम सब प्रकार से मेरी प्रतिज्ञा हो, धाता तुम्हारी रक्षा करे, विधाता तुम्हारी रक्षा करे, तुम ब्रह्म के समान होवो। ब्रह्मा, बृहस्पति, विष्णु, सोम, सूर्य, अश्विनि कुमार, भग एवं मित्र, वरुण, मुझे पुत्र प्रदान करें।
तत्र मन्त्रं प्रयुञ्जीत। अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठाऽसि धाता त्वा ददतु विधाता त्वा दधातु ब्रह्मवर्चसा भव इति।
ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुःसोमःसूर्यस्तथाऽश्विनौ।
भगोऽथ मित्रावरुणौ वीरं , ददतु में सुतम्
इत्युक्त्वा संवसेयाताम्।। चरक शारीर 8 / 8
गर्भ शल्य निकालने के लिये भी चरक ने अथर्ववेद के मन्त्रों का प्रयोग करने को कहा गया है।
तस्य गर्भशल्यस्य जरायुप्रपातनं कर्म संशमनमित्याहुरेक, मन्त्रादिकमथर्ववेदविहितमित्येके,— चरक शारीर 8/31

प्रसव वेदना में मंत्र


प्रसव वेदना प्रारम्भ होने पर गर्भिणी को चारपायी पर लिटाकर उसके कान में निम्नलिखित मन्त्र पढ़ने का निर्देश है।
पृथ्वी, जल, आकाश, तेज, वायु, विष्णु, प्रजापति गर्भ के साथ तुम्हारी रक्षा करे और तुम्हे गर्भ भार से रहित करे। सुन्दर मुख वाली तुम क्लेश रहित होकर कार्तिकेय के समान कान्ति वाले उन्ही से रक्षित पुत्र का सुखपूर्वक प्रसव करो।
कर्णे चास्या मन्त्रमिममनुकूला स्त्री जपेत्।
क्षितिर्जलं वियत्तेेजो वायुर्विष्णुः प्रजापतिः।
सगर्भां त्वां सदा पान्तु वैशल्यं च दिशन्तु ते।।
प्रसूष्व त्वमविक्लिष्टमविक्लिष्टा शुभानने! ।
कार्तिकेयद्युुतिं पुत्रं कार्तिकेयाभिरक्षितम् इति ।। चरक शारीर 8/39
बालक के जातकर्म का निर्देश देते हुये कहा है कि जिस वर्ण का जो वेद है उन मन्त्रों से मधु व घृत को अभिमन्त्रित कर सर्वप्रथम शिशु को चाटने के लिये देना चाहिए. उसके उपरान्त दक्षिण स्तन को सर्वप्रथम शिशु को पीने के लिये दे। इसके बाद मंत्रो से अभिमन्त्रित उदक कुम्भ की स्थापना सिर के पास करें।
अतोऽनन्तरं जातकर्म कुमारस्य कार्यम्।
तद्यथा- मधुसर्पिषी मन्त्रोपमन्त्रिते यथाम्नायं प्रथमं प्राशितुं दद्यात्।
स्तनमत ऊर्ध्वमेतेनैव विधिना दक्षिणं पातुं पुरस्तात् प्रयच्छेत्।
अथातः शीर्षतः स्थापयेदुदकुम्भं मन्त्रोपमन्त्रितम् ।। चरक शारीर 8 /46
द्विजाति लोग यज्ञ में अश्विनी कुमार के लिये ग्रह, स्तोत्र, पाठ, मंत्र अनेक प्रकार के हविष और धूम्र वर्ण के पशुओं का संकल्प किया करते है।
ग्रहाः स्तोत्राणि मन्त्राणि तथा , नानाहवींषि च।
धूम्राश्च , पशवस्ताभ्याँ प्रकल्प्यन्ते द्विजातिभिः।। चरक चिकित्सा 1 /4 / 46

आगन्तुक उन्माद की चिकित्सा में मंत्र


देवादि ग्रह रति और अर्चना की कामना से व्यक्तियों में आविष्ट होते हैं उनकी चिकित्सा के लिये उनके अनुरुप उपहार, बलि मंत्र के साथ औषध प्रयोग करना चाहिए.
रत्यर्चनाकामोन्मादिनौ तु भिषगभिप्रायाचाराभ्याँ , बुद्ध्वा तदङ्गोपहारबलिमिश्रेणद्य
मन्त्रभैषज्यविधिनोपक्रमेत्।। चरक चिकित्सा 9 /23
आगन्तुक उन्माद की चिकित्सा हेतु घृतपान, मन्त्र, मणि, बलि, पूजा पाठ आदि विषयों का पालन करना श्रेष्ठ कहा गया है।
सर्पिःपानादिरागन्तोर्मन्त्रादिश्चेष्यते विधिः। चरक चिकित्सा 9/ 33
ग्रहावेेशित उन्माद में पुराने घृत का पान और सभी औषधियाँ मृदुवीर्य होनी चाहिए. वेदों में बतायी पूजा बलि, उपहार, मंत्र आदि का प्रयोग करना चाहिए.
सर्पिष्पानादि तस्येह मृदु भैषज्यमाचरेत्।
पूजां बल्युपहारांश्च मन्त्राञ्जनविधींस्तथा चरक चिकित्सा 9/ 89
आगन्तुज उन्माद देवता, गौ, ब्राह्मण, गुरुओं का पूजा सत्कार, सिद्ध मन्त्र और औषधों के प्रयोग से शान्त होता है।
देवगोब्रह्मणानां च गुरूणां पूजनेन च।
आगन्तुः प्रशमं याति सिद्धैर्मन्त्रौषधैस्तथा।। च चि। 9 / 94
आगन्तुज उन्माद के लक्षण बताते हुये कहा है कि ब्रह्मराक्षसोन्मत पुरुषदेवताओं की स्तुति, वेदमन्त्र और शास्त्रों के अनेक उदाहरणों को बार-बार पढ़ता है।
प्रहासनृत्यप्रधानं देवविप्रवैद्यद्वेषावज्ञाभिः स्तुतिवेदमन्त्रशास्त्रोदाहरणैः।।
चरक चिकित्सा 9 / 20

विष चिकित्सा में मंत्र


विष से आक्रान्त होने पर उसकी चिकित्सा हेतु निर्दिष्ट चौबीस उपक्रमों के अन्तर्गत मंत्र का उल्लेख सर्वप्रथम किया गया है।
मन्त्रारिष्टोत्कर्तननिष्पीडनचूषणाग्निपरिषेकाः।
अवगाहरक्तमोक्षणवमनविरेकोपधानानि।। चरक चिकित्सा 23 / 35
मृतसंजीवनी अगद के प्रयोग से भूत प्रेत, विषैले सर्प आदि जन्तु का विष, अलक्ष्मी को देने वाले मंत्रो का प्रयोग अग्नि का प्रयोग, वज्र का प्रयोग और शत्रु का भय नष्ट हो जाता है।
भूतविषजन्त्वलक्ष्मीकार्मणमन्त्राग्न्यशन्यरीन् हन्यात्।
दुःस्वप्नस्त्रीदोषानकालमरणाम्बुचैरभयम्।। चरक चिकित्सा 23 / 59
जांगल विष से आक्रान्त होने पर रक्तवहिनी धमनी का बन्धन मंत्रो द्वारा करना चहिए और मन्त्रों द्वारा अवमार्जन और मन्त्रों द्वारा आत्म रक्षा करनी चाहिए.
मन्त्रैर्धमनीबन्धोऽवमार्जनं कार्यमात्मरक्षा च।
दोषस्य विषं यस्य स्थाने स्यात्तं जयेत्पूर्वम्ं।। चरक चिकित्सा 23/61
महागन्धहस्ती नामक अगद जिस घर में रहता है उस स्थान पर बालकों के ग्रह और राक्षस नहीं आ पाते। मारण, मोहन आदि मन्त्रों का प्रभाव उस घर पर नहीं हो पाता। बेताल, भूत, प्रेत और अथर्ववेद में बताये गये अशुभ मन्त्रों का प्रभाव उस घर पर नहीं हो पाता।
यत्र च सन्निहितोऽयं न तत्र बालग्रहा न रक्षांसि।
न च कार्मणवेताला वहन्ति, नाथर्वणा मन्त्राः ।। चरक चिकित्सा 23/88
महागन्धहस्ती नामक अगद को पुष्य नक्षत्र में गौ पित्त के साथ पीसते हुये मम माता जया नाम मंत्र बोलते रहने का विधान कहा है।
पिष्यमाण इमं चात्र सिद्धं मंत्रमुदीरयेत्।
मम माता जया नाम जयो नामेति में पिता। चरक चिकित्सा 23/90
शंका विष में अथर्ववेद में निर्दिष्ट मांगलिक मन्त्रों के साथ अभिमन्त्रित किये गये जल से प्रोक्षण और सान्तावना देने का विधान है।
सिता वैगन्धिको द्राक्षा पयस्या मधुकं मधुद्य
पानं समन्त्रपूताम्बु प्रोक्षणं सान्त्वहर्षणम् ।। चरक चिकित्सा 23 /223
मंत्र आगन्तुज व्रण का कारण भी कहा गया है।
मन्त्रागदप्रलेपाद्यैर्भेषजैर्हेतुभिश्च ते।
कदेशैर्निर्दिष्टा विपरीता निजैर्व्रणैः ।। चरक चिकित्सा http://healthyminute.in/%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c/
चिकित्सा के उपक्रम वमन करवाते समय भी मंत्रो का प्रयोग बतलाया है।
सुखोष्णं कृत्वा पूर्णं शरावं मन्त्रेणानेनाभिमन्त्रयेत्।
ष्ॐ ब्रह्मदक्षाश्विरुद्रेन्द्रभूचन्द्रार्कानिलानलाः।
ऋषयः सौषधिग्रामा भूतसङ्घाश्च पान्तु ते।
रसायनमिवर्षीणां देवानाममृतं यथा

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सुधेवोत्तमनागानां भैषज्यमिदमस्तु ते।। चरक कल्प 1/14

प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़ हरिद्वार 249401

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