गर्भाधान संस्कार
                                        

गर्भाधान संस्कार का प्रयोग चाहे बहुत से लोग न करते हो पर उसका महत्व आज भी है। आज जहां प्रत्येक रोग विशेष के प्रतिकार के लिये अलग अलग वैक्सीनेशन की खोज कर ली गयी है फिर भी इसमें सन्देह बना रहता है कि बालक भविष्य में उस रोग से बचा रहेगा या नही। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि बालक जब उत्पन्न हो तो वह सशक्त और व्याधि क्षमता से युक्त होना चाहिए। जिस तरह अच्छी फसल को उगने के लिये भूमि और बीज का उत्कृष्ट होना आवश्यक होता है उसी तरह एक उत्तम स्तर के शिशु की उत्पत्ति के लिये माता पिता के शरीर व मन का उत्कृष्ट होना आवश्यक है। शारीरिक व मानसिक रूप में सक्षम होने पर ही सन्तान उत्पादन की ओर अग्रसर होना चाहिए।

षोडश संस्कारों में सर्वप्रथम गर्भाधान संस्कार

षोडश संस्कारों में सर्वप्रथम वर्णित गर्भाधान संस्कार का एक प्रयोजन प्रजनन हेतु सामाजिक स्वीकृति भी है। विचारशील लोगों के संज्ञान में आने से उनका समर्थन इस प्रयोजन की सार्थकता को सिद्ध करता है। प्रजनन का प्रयोजन केवल व्यैक्तिक आनंद और उपभोग का विषय नही है अपितु एक सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। परिवार में नयी आत्मा के आगमन के स्वागत के लिये एक उपयुक्त वातावरण बनाने का कार्य इसी के द्वारा सम्पन्न होता है। संख्या की दृष्टि से बहुत विस्तार करना ठीक नही लेकिन व्यवस्था की दृष्टि से उसे अधूरा रखना भी ठीक नही। वस्तुतः संस्कार व्यक्ति को शारीरिक, सामाजिक, बौद्धिक व धार्मिक रूप से परिष्कृत करने की विधि है। व्यक्ति का आध्यात्मिक विशवास दृढ़ होता है।

गर्भाधान संस्कार से बीज तथा गर्भ के दोष दूर होते हैं।

जिस तरह अग्नि में तपा कर सोने को पवित्र और चमकदार बनाया जाता है उसी प्रकार संस्कारों के माध्यम से जातक के पूर्व जन्म से लेकर इस जन्म तक के विकार दूर कर उसका शुद्धिकरण किया जाता है। स्त्री व पुरुष का जैसा आहार और व्यवहार होता है जैसी कामना रखते हुए वे समागम करते हैं वैसे गुण संतान के स्वभाव में भी शामिल होते हैं। प्रथम संस्कार गर्भधान संस्कार ही होता है। पितृ-ऋण उऋण होने के लिए ही संतान-उत्पादनार्थ यह संस्कार किया जाता है। गर्भाधान संस्कार से बीज तथा गर्भ से सम्बन्धित मलिनता आदि दोष दूर हो जाते हैं।

मन की वृत्तियों को सकारात्मक करता है यह संस्कार

मातापिता के शरीर व मन और आत्मा के संयोग से शिशु का निर्माण होता है। मन की चंचलता व्यक्ति को कुछ न कुछ करने को प्रेरित करती रहती है। जब हमारे वंश, जाति व परम्परा का निर्माण हो रहा होता है तो उस समय मन की वृत्तियों को सदैव सकारात्मक रखना ही श्रेष्ठ होता है। सभी संस्कारों का प्रभाव उत्तरगामी होता है। जिस प्रकार सूर्य की किरणों के तेज से स्फटिक मणि में से अथवा कांच में से होकर ईंधन में प्रविष्ट होता हुआ दिखाई नही देता है केवल लकड़ी का जलता हुया दिखायी देता है उसी तरह जीव गर्भाशय स्थिति गर्भ में गया हुया दिखायी देता है, जाता हुया नही। गर्भाधान संस्कार उक्त प्रयोजनों की सि़द्धि करता है।https://www.youtube.com/watch?v=HgPof8Joc1k

गर्भाधान संस्कार व्यक्तित्व निर्माण में सहायक


संतान व्यक्तित्व निर्माण का कार्य गर्भावस्था में ही पूरा होता है इस के लिये समाज में अनेक उदाहरण मिल जाते हैैं। अभिमन्यु द्वारा चक्रव्यूह भेदन विद्या की प्रक्रिया का सीखना इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है। महर्षि विश्रवा के ज्ञानी होने के बावजूद रावण संसार में बुराई का प्रतीक माता कैकसी के कारण बना। आश्रम के प्रभाव से वह विद्वान तो हुया लेकिन माता की कुटिलता के कारण वह इस रूप में प्रसिद्ध हुया। पिता हिरण्यकशिपु द्वारा बालक प्रहलाद को राक्षसी कृत्य सिखाने के उपरान्त भी उसका प्रशिक्षण इसलिये सफल नही हुया क्योंकि प्रहलाद गर्भावस्था में ही भक्ति रसरूपी अमृत का पान कर चुका था। गर्भाधान संस्कार के माध्यम से दम्पति न केवल समाज को अपनी प्रजनन प्रवृति की सूचना जग को देती है अपितु बालक विद्यााए सामर्थ्य शक्ति, बल, वैभव, शौर्य, पराक्रम आदि से युक्त करने की प्रकिया को सुनिशिचत करता है। Click to read

माता पिता के अनुरूप ही संतान का मन

चरक संहिता में कहा गया है कि माता पिता के अनुरूप ही संतान का मन होता है अर्थात जैसा मन माता पिता का होता है उसी के अनुरूप पुत्र का मन होता है। गर्भिणी जिस कथा को बार बार श्रवण करती है उसी के अनुसार बालक का मन होता है। कथा वार्ता अनुश्रवण का प्रभाव मन पर भी पड़ता है। गर्भिणी जिस प्रकार के सत्व वाले आहार विहारों का सेवन करती है गर्भस्थ शिशु में उसी तरह के सत्व का निर्माण शुद्ध आहार, जो कि मद्य मांसादिरहित घृत, दुग्धादि, चावल, गेहूं आदि का सेवन करने से अन्तःकरण की शुद्धि, बल, पुरुषार्थ, आरोग्य और बुद्धि की प्राप्ति होती है।

मनोवाछिंत गुणो वाली संतान

विशााल व पुष्ट शरीर वाली गौर वर्ण वाली, सिंह जैसा पराक्रमी, ओजस्वी तथा पवित्र मन वाली संतान की प्राप्ति गर्भिणी के द्वारा विशिष्ट चर्या के पालन से होती है। श्याम वर्ण वाले, रक्त वर्ण के नेत्र वाले व चैड़ी और ऊंची छाती वाले तथा लम्बी बाहू वाले पुत्र की प्राप्ति भी इसी संस्कार से प्राप्त होती है। जो स्त्री किसी देश विशेष अनुसार संतान की प्राप्ति की इच्छा रखती है उस का चिंतन करने से व उसके अनुरूप आचरण करने से उस तरह की संतान की प्राप्ति होती है।
सुश्रुत सहिंता में लिखा है कि देवताओं की पूजा करने वाले, ब्राह्मणों की सेवा करने वाले तथा हितकर आचरण करने में तत्पर ऐसे माता पिता सदगुण बालकों को उत्पन्न करते हैं। अर्थात कायिक, वाचिक और मानसिक अच्छे कर्म करने वालों को अच्छे ही लाभ प्राप्त होते हैं।
प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़
हरिद्वार

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