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   ANUP KUMAR GAKKHAR  

चरक संहिता में लगभग दो हजार योगों का उल्लेख मिलता है। उन सबकी गुणवत्ता असंदिग्ध होते हुये भी कुछ योगोे के स्वाद के कारण कुछ लोग परहेज करते हैं। रोगियों के द्वारा आयुर्वेदिक औषधियों के सेवन में रुचि न होने में एक कारण उनमे स्वाद की कमी का होना भी है। बहुत से लोग चूर्ण, क्वाथ व चटनी का नाम सुन कर ही उनके प्रयोग से दूर भागना शुरु कर देते है। कुछ औषधि निर्माताओं ने त्रिफला, हरड़, बहेड़ा, अश्वगन्धा, शतावरी जैसी औषधियों को वटी व कैपसूल के रूप में निर्माण करके बाजार में प्रस्तुत किया है लेकिन उनसे वांछित लाभ प्राप्त नहीं होते।

इसके विपरीत धातु, उपधातु, पारद, गन्धक, रत्न, उपरत्न, विष उपविष आदि से निर्मित औषधियों की मात्रा कम होने के कारण लोगों में स्वीकार्य होती है। लेकिन ऐसी औषधियों का एकल रूप में कम प्रयोग होता है और योग निर्माण हेतु काष्ठ औषधियां मिलाकर ही उनका निर्माण होता है।

चरक में भी उल्लेख है रसौषधियों का

संहिता आदि ग्रन्थों में अधिकतर काष्ठ औषधियों का प्रयोग बताया गया है। रस औषधियों का प्रयोग तुलनात्मक दृष्टि से बहुत ही अल्प है। नवायस चूर्ण, पुननर्वाद्य मंडूर जैसे योगों में प्रत्यक्ष रूप से योगों के निर्माण में धातुओं का प्रयोग दर्शाया गया हैं। स्वर्ण के प्रयोग का उल्लेख भी मिलता है। हरताल, मैनशिल जैसे द्रव्यों का उल्लेख भी बाह्य प्रयेाग के लिये बताया है। सूत्र स्थान के तीसरे अध्याय में लोमश, गैरिक, अंजन, मैनशिल, कासीस, अमृतासंग, सौगन्धिक, हरताल, आदि द्रव्यों का उल्लेख बाह्य प्रयोग के लिये निर्दिष्ट है। स्थूलता की चिकित्सा में काललोह रज और शिलाजीत का प्रयोग निर्दिष्ट है। चरक में कहा है कि अयोग्य वैद्य से चिकित्सा कराने से ताम्र विष का सेवन अच्छा है।

चरक संहिता व रस शास्त्र एक दूसरे के पूरक या प्रतिद्वन्दी

औषध प्रयोग से पहले इनका परीक्षण आवश्यक

चिकित्सा की सफलता का सबसे महत्त्वपूर्ण मापदण्ड यह होता है कि रोगी के रोग का निवारण हो और वह स्वस्थ हो जाए। चरक संहिता में कहा गया है कि औषधि वही श्रेष्ठ है जिससे आरोग्य की प्राप्ति हो तथा वैद्य वही श्रेष्ठ है जो आतुर को व्याधि से मुक्ति दिला सके। अग्निवेश तन्त्र का प्रयोजन भी चरक संहिता में धातुसाम्य ही कहा है अर्थात स्वास्थ्य प्राप्ति पर ही केन्द्रित है। चरक ने चिकित्सा में सफलता के लिये दोष, भेषज, देश, काल, बल, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्व, प्रकृति तथा वय की अवस्थाओं पर सूक्ष्म रूप से विचार करने को कहा है। जबकि रसशास्त्र के आचार्यों की सोच इनसे हटकर है। रसशास्त्र की प्रशंसा करते समय इसके विपरीत कहा है कि
न दोषाणां न रोगाणां सम्यगेव परीक्षणम। न देशस्य न कालस्य कार्य रस चिकित्सते॥

अर्थात रस चिकित्सा में दोषों की अथवा रोगों की, देश की एवं काल की उतनी परीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। उसके बिना भी चिकित्सा सफल हो जाती है।

रसौषधियां

रसशास्त्र में वर्णित औषधियां, एकांगवीर रस, रसराज रस, बृहतवात चिन्तामणि रस, श्वासकुठार रस, योगराज गुग्गुल, कैशोर गुग्गुल आदि असंख्य उदाहरण है जिसमें रसशास्त्र में वर्णित द्रव्यों को काष्ठ औषिधयों के साथ मिलाकर ही उनका निर्माण किया जाता है। जड़ी बूटियों की भावना से ही विष तुल्य औषधियां ही अमृत के स्वरूप को प्राप्त करती हैं।https://www.youtube.com/watch?v=HJsf7qTuiC8&t=60s

रसशास्त्र का प्रयोजन द्रव्योपार्जन

बहुत से लोग प्रायः चिकित्सा व्यवसाय में अपने के लिये इसलिये आतुर रहते हैं कि इस में अर्थ और यश की प्राप्ति सुगमता से हो जाती है। जबकि चरक संहिता में चिकित्सा को आजीविका लेने को धनोपार्जन के साथ नहीं जोड़ा है। चरक में लिखा है कि जो वैद्य चिकित्सा को बेचता है वह स्वर्ण राशि को छोड़ कर पांशु अर्थात रेत का संग्रह करता है। लेकिन रसशास्त्र के प्रयोग से इस उदेश्य की प्राप्ति में सहायक है। रसशास्त्र की प्रशंसा में जो गाथा गायी गयी है उसके लिये लिखा है कि एक मात्र रसवैद्य को छोड़कर द्रव्योपार्जन, प्रतिष्ठा एवं कीर्ति लाभ कर सकता है। तृण, काष्ठ आदि से निर्मित औषधियों से तो कौड़ी भी नहीं मिलती। इसमें अपने अनुसार नये चिकित्सकीय प्रयोजन विकसित किये है।

मुत्त्कवैकं रसवैद्यं तु लाभपूजर च कीर्तनम। तृणकाष्ठौषधे वैधः को लभेत्वराटिकाम्

रसौषधियों की मात्रा अल्प होती है

http://healthyminute.in/ayurveda-treatment-precautions-care-to-be-taken-in/

रसकल्पों के प्रति जनता को आकृष्ट करने के निमित्त विधार्थियों को कालेज में पढ़ाया जाता है कि अल्पमात्रोपयोगित्वाद अरुचेरप्रंसगातः क्षिप्रमारोग्य दायित्वादौषद्यैभ्योंधिको।
अल्पमात्रा में गुणकारी होने से, अरुचि का कोई प्रश्न ही न होने से व अन्य वनौषधि के योगों से शीघ्र स्वास्थ्यदायक होने से रस औषधियाँ अधिक गुणकारी है।

रसौषधियों के अनुचित सेवन से उत्पन्न विकारों में जड़ीबूटियां ही कारगर

अगर किडनी के रोग की चिकित्सा हेतु कोई रोगी विशेषज्ञ के पास जाता है तो उससे यह अवश्य पूछा जाता है कि कहीं उसने कोई आयुर्वेद की दवायी तो नहीं खायी। उस आयुर्वेद औषधि से अभिप्रायः ठीक न बनी हुयी भस्मों से अर्थात रसशास्त्र में वर्णित औषधियाँ ही है। इस प्रकार की औषधियों के सेवन से उत्पन्न विकारों को तृणपंचमूलादि क्वाथ, पुनर्नवा जैसी काष्ठ औषधियों के प्रयोग से ही शान्त किया जाता है। काष्ठ औषधियां स्वयं प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होती हैं इसलिये उनका निर्माण में कोई व्यतिक्रम नहीं होता अतः यथाविधि लेने पर किसी प्रकार के दुष्प्रभाव की सम्भावना नहीं रहती। चरक संहिता में जहां उपयुक्त लगा वहां धातुओं का प्रयोग निर्दिष्ट किया गया लेकिन उसके समुचित लाभ लेने के लिये जड़ी बूटियों का प्रयोग साथ में निर्दिष्ट है।

चरक का ज्ञान सर्वश्रेष्ठ

चरक संहिता के अन्त में कहा गया है कि जो ज्ञान चरक संहिता में है वही ज्ञान अन्य ग्रन्थों में वर्णित है। जो ज्ञान चरक संहिता में नहीं है वह ज्ञान अन्य ग्रन्थों में भी नहीं है। पूरे आयुर्वेद का मूलाधार चरक संहिता ही है। धातुओं के चिकित्सकीय प्रयोग का ज्ञान उस समय भी था और उससे लाभान्वित हो इसके लिये उनका यथासम्भव प्रयोग भी निर्दिष्ट है।

प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़

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