आयुर्वेद में चिकित्सा
ANUP KUMAR GAKKHAR

आयुर्वेद में चिकित्सा करते समय कुछ ऐसे निर्देशों का वर्णन है जिनका अगर ध्यान न रखा जाए तो चिकित्सा से पूरा लाभ नहीं होता। उदाहरण के लिये रसायन सेवन का लाभ तभी मिलता है जब उसका प्रयोग करते समय व्यक्ति पूर्ण रूप से जितेन्द्रिय हो कर रहे और भोग विलास जैसे विषयों में लिप्त न हो। रसायन प्रभाव के लिये कहा गया है कि जिस देश में जो व्यक्ति उत्पन्न होता है उसी देश में उत्पन्न दिव्य औषधियों का सेवन करने से लाभ होता हैं। आमलक अवलेह से पूर्ण लाभ लेने के लिये उसका प्रयोग पूर्वान्ह करना चाहिए न कि अपरान्ह। शिलाजीत का सेवन करते समय विदाही और गुरु अन्न का प्रयोग करने पर उसके लाभ प्राप्त नहीं होते और उसके सेवन काल में कुलत्थ सेवन का भी निषेध है।

रसायन व वाजीकरण में संशोधन है आवश्यक

रसायन व वाजीकरण औषधियों का प्रयोग करने के लिये व्यक्ति के शरीर का संशोधन अवश्य करना चाहिए। शुद्ध शरीर में ही रसायन व वाजीकर औषधियाँ कारगर सिद्ध होती हैं। वाजीकरण के लिये औषधियों का सेवन करते समय लवण और क्षारीय द्रव्यों के सेवन से परहेज करना चाहिए। इसके साथ-साथ पिप्पली, रसोन, शुंठी जैसे द्रव्यों को छोड़कर कटु रस प्रधान द्रव्यों के सेवन से बचना चाहिए।

ज्वर में दोषपाक होने पर ही मुक्त होता है

नव ज्वर में दूध व घी का प्रयोग और जीर्णज्वर में लंघन नहीं करना चाहिए। तरुण ज्वर में कषाय प्रयोग से दोष स्तम्भित हो जाते हैं। ज्वर में मधुर रस का सेवन नहीं करना चाहिए। काल बीत जाने पर भी ज्वर में लंघन के लक्षण उपलब्ध न होने पर और कफ की प्रधानता होने पर घी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ज्वर की चिकित्सा में यह याद रखना चाहिए कि दोषों का पाक होने से ही व्यक्ति ज्वर से मुक्त होता है।

मधुमेह में अम्ल और लवण रस का प्रयोग कम करना चाहिये।


रक्तपित्त रोग में जिस रोगी का बल और मांस क्षीण नहीं है उसमें रक्त को प्रारम्भ में रोकना नहीं चाहिए। रोग के प्रारम्भ में दूषित रक्त को निकाल देना चाहिए। गुल्म रोग में किसी भी दोष की प्रधानता हो तो वात को ही सर्वप्रथम जीतने का प्रयास करना चाहिए। रक्तज गुल्म की चिकित्सा गुल्म के पक्व होने पर दसवें मास ही करनी चाहिए इससे पहले नही। प्रमेह रोग में स्थूल व बलवान रोगी का संशोधन करवाने के उपरान्त उसके अग्निबल के अनुसार संतर्पण अवश्य कराना चाहिए। मधुमेह की चिकित्सा करते समय अम्ल और लवण रस के सेवन का वर्जन कर देना चाहिए।

कुष्ठ की चिकित्सा में विरुद्ध आहार सेवन निषिध

आयुर्वेद अनुसार कुष्ठ रोगी की चिकित्सा करते समय लवण व अम्ल रस का प्रयोग अल्पमात्रा में कर देना चाहिए वरना चिकित्सा में वांछित लाभ नहीं होता। कुष्ठ की चिकित्सा करते समय विरुद्ध आहार का सेवन बंद होना चाहिए नहीं तो चिकित्सा सफल नहीं हो पाती। राजयक्ष्मा की चिकित्सा में रोगी को कामवासना पूर्ति से बचना चाहिए और मांस रस व बकरी के दूध का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

निज उन्माद में ताड़न व आगन्तुज में पूजन

निज उन्माद की चिकित्सा में व्यक्ति का ताड़न व भय का प्रयोग निर्दिष्ट है लेकिन देव, ऋषि, पितर, गन्धर्व ग्रह के प्रवेश होने पर जो व्यक्ति उन्माद से ग्रसित हो गये हो उनके लिये तीक्ष्ण अंजन, धूप, भय, भय प्रदर्शन, मारना जैसे क्रूर कर्म नहीं करवाने चाहिए। आयुर्वेद अनुसार अपस्मार की चिकित्सा में औषध प्रयोग के साथ-साथ रसायन औष्धियों का प्रयोग निश्चित रूप से करवाना चाहिए। शोथ की चिकित्सा में सर्वप्रथम कफ दोष को जीतना चाहिए। जलोदर रोग की चिकित्सा में नित्य विरेचन ही लाभदायक होता है।

पाण्डु व ग्रहणी दोष में अधारणीय वेगों को न रोके

कुष्ठ, श्वित्र, उदर रोग व पैत्तिक शिरोरोग के रागियों को पाप कर्म करने से परहेज करना चाहिए क्योंकि पाप कर्म इन रोगों की उत्पत्ति का कारण भी है। रक्तज अर्श में रोग के प्रारम्भ में निकलने वाले रक्त, दोष व वायु को रोकना नहीं चाहिए। अगर इन को रोका जाता है तो इनसे विभिन्न रोगों की उत्पत्ति होती है। ग्रहणी दोष की चिकित्सा करते समय रोगी को असात्म्य भोजन, विषमाशन व वेगों को धारण न करने का निर्देश अवश्य देना चाहिए। पाण्डु रोग की चिकित्सा करते समय रोगी को लवण, क्षार, व अम्लीय भोजन से परहेज व अधारणीय वेगों को न रोकने का निर्देश व काम, चिन्ता, भय, शोक, क्रोध आदि से दूर रहने के लिये कहना चाहिए।

शीत स्थान और शीत जल से दूर रहना श्वास रोग की चिकित्सा है।

हिक्का और श्वास में रोगी को धूल व धुंअंाॅ से दूर रहने का निर्देश व शीत स्थान और शीत जल से दूर-दूर रहने का निर्देश अवश्य देना चाहिए। रूक्ष, शीत, कषाय द्रव्यों से बचना कास रोग की चिकित्सा में सहायक होता है। हिक्का और श्वास में यद्यपि स्वेदन कर्म का निर्देश है किन्तु पित्त की प्रबलता होने पर, रोगी के दाह से पीड़ित होने पर, रक्तस्राव अधिक होने पर और स्वेद की अधिकता वाले रोगी को स्वेदन कर्म नहीं कराना चाहिए। इसके अतिरिक्त जिसके धातु एवं बल क्षीण हो गये हो व रूक्षता हो गयी हो व गर्भिणी और पित्त प्रकति वाले को स्वेदन नहीं कराना चाहिए।


आम अतिसार में सर्वप्रथम संग्राही औषधियों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

आम अतिसार में सर्वप्रथम संग्राही औषधियों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
भय और शोक से उत्पन, अतिसार में वायु शीघ्र कुपित हो जाती है अतः इस प्रार के अतिसार में वातनाशक एवं मन में हर्ष उत्पन्न करने वाली और आश्वासन क्रिया करनी चाहिए। आयुर्वेद अनुसार आम अतिसार में सर्वप्रथम संग्राही औषधियों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से दण्डालसक, ग्रहणी, अर्श, शोथ, पाण्डु, आदि रोग उत्पन्न होते है। ऐसे में अगर दोष स्वयं निकल रहे हो तो उनकी उपेक्षा कर देनी चाहिए व अगर कठिनायी से निकल रहे हो तो उन दोषों को बाहर निकालने के लिये हरड़ का प्रयोग करना चाहिए।

अल्प मात्रा मेंजल सेवन भी चिकित्सा का अंग

आयुर्वेद में चिकित्सा करते समय पाण्डु, उदर, पीनस, प्रमेह, गुल्म मन्दाग्नि, अतिसार व प्लीहा आदि रोगों में जल का प्रयोग अल्प मात्रा में करना चाहिए। यद्यपि सर्वस्थान गत विष में शीतल क्रिया करनी चाहिए लेकिन वृश्चिक और झींगुर कीटों के द्वारा काटे जाने पर उष्ण चिकित्सा करने कर निर्देश है। सभी प्रकार के मदात्यय त्रिदोषज होते हैं लेकिन चिकित्सा करते समय मदात्यय रोग में जिस दोष की बहुलता हो उस दोष की चिकित्सा सबसे पहले करनी चाहिए। मिथ्या, अति व हीन मात्रा में मद्यपान करने से विकार उत्पन्न होते है वे मद्य की उचित मात्रा में पीने से शान्त होते है।
वातरक्त में रक्तमोक्षण श्रेष्ठ फलदायी है लेकिन अंगों में ग्लानि होने पर, रूक्षता होने पर, तथा वात की प्रधानता होने पर रक्तमोक्षण नहीं कराना चाहिए।http://healthyminute.in/%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%af-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%82%e0%a4%aa-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a4%95%e0%a5%8d/


औषध काल का है अपना महत्व


औषध देते समय काल का भी महत्त्व है। एक ही औषधि का प्रभाव उसके देने के काल के अलग-अलग होता है।आयुर्वेद अनुसार अगर अपान वायु विकृति में औषधि को भोजन से पूर्व देने से, समान वायु विकार में भोजन के मध्य, व्यान वायु विकार में प्रातःकाल भोजन ग्रहण करने के बाद, उदान वायु के रोगों में संाय काल भोजन के बाद लेने से लाभ मिलता है। प्राण वायु विकृति में ग्रास के साथ व अरुचि में स्वादिष्ट भोजन के साथ औषधि लेने से लाभ होता है। कास श्वास पिपासा में बार-बार औषधि लेने पर ही लाभ होता है। हिक्का के रोगियों को दो आहार काल में के बीच में औषधि लेने से लाभ होता है।

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प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़
हरिद्वार 249401

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