प्रमेह रोग में उपयोगी कुछ निर्देश

1607118_392294740915406_1473378093_nआयुर्वेद के ग्रन्थों में प्रमेह की चिकित्सा हेतु महत्वपूर्ण निर्देश दिये गये है। जो व्यक्ति स्नान एवं चंक्रमण से परहेज करता है व अधिक भोजन करता है उसका शरीर प्रमेह के लिये सर्वश्रेष्ठ नीड़ का काम करता है। प्रमेह के रोगियों कोे चलने की जगह खड़े होना,,खड़े होने के स्थान पर बैठना, बैठने के जगह लेटना पसन्द होता है। प्रमेह केे रोगी को जहां मधुर वस्तुओ का निषेध है वहीें चरक ने अम्ल और लवण रस के अति सेवन को मधुमेह का कारण बताया है। प्रमेह के रोगी को अधिक जलपान का निषेध है। अधिक भोेजन करने का निषेध है। यव का सेवन प्रमेह के रोगी के लिये एक श्रेष्ठ आहार है। मधुमेह के रोगी को स्वेदन का निषेध है और साथ में इस बात का भी निर्देश है कि मधुमेह के रागी को रक्तस्राव होने पर तुरन्त उसके रक्तस्राव को बन्द करना चाहिए।
आयुर्वेद के ग्रन्थों में प्रमेह की चिकित्सा में अनेक योगों का उल्लेख किया है। सुश्रुत ने मधुमेह के लिये तुवरक तेल व शिलाजीत का प्रयोग करने को कहा है। कुएं खोदने व गाय पालने की दिनचर्या को अपनाने का निर्देश सुश्रुत ने मधुमेह के रोगियों के लिये दिया है। जहां जक कि मधुमेह के रोगियों के लिये भिक्षुओं की तरह रूखा सूखा भोजन करने की प्रवुति को अपनाने का निर्देश है। मुनि के समान इन्द्रियों को वश में कर सौ योजन या उससे अधिक चलना चाहिए। सुश्रुत ने लोहारिष्ट को प्रमेह रोग के लिये महागुण शाली औषध बताया है। कृश रोगी का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। रोगी को हींग व सैन्धव लवण युक्त यूष का प्रयोग करना चाहिए। सरसों युक्त राग के साथ भोजन करना चाहिए।
जो नित्य आमला व मूंग की दाल का प्रयोग करता है उसको प्रमेह नही होता। चक्रदत में आमलास्वरस का मधु एवं हरिद्रा चूर्ण के प्रयोग से सभी प्रकार के प्रमेह का नाश बताया है। आमला, हरीतकी , बहेड़ा, देवदारु व नागरमोथा के क्वाथ में मधु मिलाकर पीने से भी सभी प्रकार के प्रमह का नाश होता है। गुड़ूची स्वरस का मधु के साथ के प्रयोग भी प्रमेह में लाभ पहुचाता है। त्रिफला चूर्ण का मधु के साथ प्रयोग सभी प्रकार के प्रमेह को नष्ट करता है। गुड़ूची सत्व का मधु के साथ प्रयोग प्रमेह के लियो निर्दिष्ट है। शतावरी रस का अच्छी तरह उबले हुये दूध के साथ प्रयोग सभी 20 प्रकार के प्रमेह नष्ट करता है। गाय का तुरन्त दुहा हुया दूध समभाग जल के साथ लेने से प्रमेह रोग में लाभ मिलता है। अग्निमन्थ का क्वाथ मधु के साथ लेने से वसामेह का नाश हो जाता है।
एक पानी वाले नारियल में शुद्ध स्फटिका चूर्ण डाल का रात भर रखें तदोपरान्त अगले दिन उसकेो साफ कर उसका जल प्रमेह के रोगी को नियमित रूप से पिलाने से चिरकालीन मेह नष्ट हो जाता है। फलत्रिकाकद क्वाथ को मधु के साथ पिलाने से सभी तरह के प्रमेह नष्ट हो जाते है। नागर मोथा, आमला , हरड़, बहेड़ा, हल्दी, मूर्वामूल, इन्द्रायण मूल और लोध्र त्वक – इन सबका क्वाथ बनाकर प्रयोग करने प्रमेह रोग और मूत्रकृच्छ में लाभ मिलता है। इसी तरह विजयसार, वायविडंग, सर्ज, अर्जुन, कटफल, कदम्ब, लोध्र, के क्वाथ के सेवन से कफज प्रमेह में लाभ होता है। नागर मोथा,, हरड़, कटफल और लोध्र त्वक के क्वाथ के सेवन से उदक में का नाश होता है। पाठा, विडंग, अर्जुन और धन्वन का क्वाथ इक्षुमेह में विशेष रूप से लाभकर है। हल्दी, दारुहल्दी, तगरमूल और मधु मिला कर लेने से सान्द्रमेह नष्ट हो जाता है। सुश्रुत अनुसार उदकमेह के रोगी को पारिजात का क्वाथ, इक्षुमेह के रोगी को वैजयन्ती का क्वाथ, सुरामेह में निम्ब का क्वाथ, सिकतामेह के रोगी को चित्रक का क्वाथ, शनैमेह के रोगी को खदिर का क्वाथ, लवणमेह के रोगी को पाठा, अगर व हरिदा्र का क्वाथ, पिष्टमेह के रोगी को हरिद्रा व दारुहरिद्रा का क्वाथ, सान्द्रमेह के रोगी को सप्तपर्णी का क्वाथ,शुक्रमेही के रोगी को दूर्वा, हठ,करंज व कसेरुक का कषाय, फेनमेही को त्रिफला, आरग्वध,का क्वाथ,देना चाहिए। मंजिष्ठामेही को मजीठ और चंदन का क्वाथ देना चाहिए।

पुराना शालि चावल, साठी चावल, जौ,चना, अरहर, कुलथ,मूुग, सरसों का तेल, कषाय गण के शाक का सेवन पथ्य होता है। दही, पिसा हुया अन्न, सुरा, आसच, जल, दूध, घी, औदक जीवों क मांस का सेवन नही करना चाहिए।
प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़
हरिद्वार 249401

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