बुद्धिवर्धक(मेध्य) द्रव्यों की कार्मुकता-एक विवेचन

‘‘मेधाये हितम् मेध्यम्’’अर्थात जो द्रव्य बुद्धि(मेधा)के लिए हितकारी होते उन द्रव्यों को मेध्य द्रव्य कहते हैं।एक स्वस्थ मनुष्य को शरीर की स्वस्थता के साथ-साथ मन की स्वस्थता की भी आवश्यकता बताई गई है। ‘‘प्रसन्नात्मेन्द्रिय मनः स्वस्थमितिधीयते’’ अर्थात आत्मा, मन एवं इन्द्रिय(शरीर)के प्रसन्न या स्वस्थ रहने पर ही मनुष्य पूर्ण रूपेण स्वस्थ कहलाता है। कहावत भी है कि एक स्वस्थ ़मनुष्य के शरीर में ही एक स्वस्थ मन का वास करता है। तात्पर्य है कि यदि मनुष्य शरीर से स्वस्थ रहेगा तो प्राकृतिक तौर पर उसके मन में किसी प्रकार की विद्वेष भावनाएं एवं चिन्ताएं उपजेंगीं तथा वह शरीर व मन दोनों से स्वस्थ रहेगें।  शरीर की स्वस्थता के लिए तो मनुष्य अच्छे आहार विहार के द्वारा शरीर का पोषण करता है, जिससे शरीर स्वस्थ एवं सुदृढ़ बना रहता है, किन्तु प्रश्न उठता है कि मन को स्वस्थ रखने हेतु मनुष्य क्या करे? ये सर्वमान्य है कि मनुष्य अच्छे विचार रखने हेतु सद्पुरुषों का सानिध्य एवं उनके सद्विचारों का अनुकरण करे एवं जीवन में उन्हें व्यहृत करे, किन्तु यदि बुद्धि विषय को भली प्रकार समझ ही न पा रही हो अथवा विषय समझने के उपरान्त उसे अधिक समय तक याद न रख पा रही हो या विषय को समझने एवं याद रखने के पश्चात, तुरन्त आवश्यकता होने पर विषय याद न आ रहा हो तो इसे दूर करने के लिए क्या उपाय हो सकते हैं, ये विचारणीय है। आयुर्वेद में मन की एकाग्रता योग के अन्तर्गत बहुत ही योग्य एवं उत्तम उपाय -ध्यान,धारणा एवं समाधि आदि विधियों का उल्लेख आया है। इन उपायों के साथ-साथ यदि हम कुछ बानस्पतिक औषध द्रव्यों का भी उपयोग में लाएं तो निश्चित ही मानव मानष की विषय ग्रहण-शक्ति  ,धारणा-शक्ति (च्वूमत व ितमजमदजपवद) ,एवं स्मरण-शक्ति को बेहतर कर सकते हैं।इन तीनों शक्तियों के समावेश के परिणाम को ही बुद्धिमान अथवा बुद्धिहीन की संज्ञा दी जा सकती है।

अब विचारणीय है कि बुद्धिवर्धक (मेधावर्धक) गुणों को कैसे बढ़ाया जाए? इस हेतु बानस्पतिक औषध द्रव्यों के अन्तर्गत मेघ्य द्रव्यों को लेकर उनके गुणों के अनुसार उपयोग करके ग्रहण-शक्ति,धारणा-शक्ति एवं स्मरण-शक्ति जो भी आवश्यक हो, उसे बढ़ाने का प्रयास कर सकते हैं। मेध्य द्रव्य शीत व उष्ण वीर्य,तिक्त-कटु-मधुर रस वाले एवं मधुर-कटु विपाकी दोनो प्रकार के होते हैं। गुणों की इतनी विविधता के कारण ही ये निर्धारण करना कि ये द्रव्य अपने किन विशिष्ट गुणों के कारण मेध्य कर्म करते हैं, निर्धारण करना दुष्कर प्रतीत होता है, संभवतः इसी कारण मेध्य द्रव्यों को प्रभाव द्वारा कार्यकारी बताया गया है। फिर भी अपने कुछ विशिष्ट गुणों के द्वारा ये निर्धारित किया जा सकता है कि ग्रहण-शक्ति एवं स्मरण-शक्ति बढ़ाने के लिए ऐसे द्रव्यों की आवश्यकता होती है जो कि बुद्धि को उद्बुद्ध करके मन के रज और तम दोष के आवरण को हटाते हुए अपना कार्य सम्पादित करें। उक्त दोनों कार्य हेतु उष्ण वीर्य एवं कटु-तिक्त रस वाले द्रव्य ही अधिक कारगर होते हैं, ऐसा मेरा अपना मानना है, वचा एवं ज्योतिष्मती इसके सबसे श्रेष्ठ एवं उपयुक्त उदाहरण माने जा सकते हैं। ऐसे द्रव्य बुद्धि की धारणा-शक्ति को बढ़ाएं प्रमुख एवं कार्यकारी उदाहरण हैं, ये द्रव्य अपने स्थिर गुण के कारण विषय को लम्बे समय तक मन में रखते हैं। चरक संहिता में रसायन प्रकरण में चार द्रव्य बतलाए हैं। यथा गिलोय स्वरस, मुलेठी चूर्ण शंख पुष्पी कल्क व मण्डूकपर्ण स्वरस ।
अतः इन मेध्य द्रव्यों का व्यक्ति विशेष की मानसिक अवस्था के अनुसार बुद्धिवर्धक(ठतंपद ज्वदपब) द्रव्य के रूप में प्रयोग करना चाहिए। मानसिक व्याधियों में भी उपरोक्त मेध्य द्रव्य उपयोगी सिद्ध होते हैं। किन मेध्य द्रव्यों का किस मानसिक अवस्था में प्रयोग करना है, इसका निर्धारण विेषय द्वारा ही व्यक्ति की मानसिक अवस्था के अनुसार करना चाहिए।

डा0 डी0सी0सिहं,प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष
द्रव्यगुण विभाग, ऋषिकुल आयुर्वेदिक कालेज, हरिद्वार

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