चिकित्सा में मांस का प्रयोग एवं अहिंसा

   download

महर्षि चरक ने जहाँ एक ओर समस्त प्राणियों के प्रति मैत्री भाव और अहिंसा का उपदेश दिया है, तथा प्राणियों के प्राणों की वृद्धि करने वाले भावों में अहिंसा को उत्कृष्ट तक बताया है, वहाँ दूसरी ओर रोग निवृत्ति और स्वास्थ्य लाभ के लिए मांस भक्षण का उपदेश देते हुए हिंसा का समर्थन किया है। इसका उत्तर यह है चूंकि अहिंसा पूर्वक मांस भक्षण के प्रति मनुष्य का स्वाभाविक रोग है, इसलिये आयुर्वेद के आचायों ने किसी-किसी रोग में मांस के हतिकर होने के कारण केवल उसका निर्देश किया है, अहिंसात्मक मांसभक्षण का विधान नहीं किया है। इसी प्रकार उन्होंने स्वस्थवृत और रोगीचर्या में मदिरा की पथ्यता का निर्देशमात्र किया है, मदिरा पान का विधान नहीं किया है। मांस और मदिरा के  संयत सेवन का उपदेश रोग निवृति के उददेश्य से किया गया है, किन्तु हिंसाजन्य अधर्म का निषेध नहीं किया गया है। मांस और मद्य का सेवन करने से रोगी नीरोग भले ही हो जाय, किन्तु हिंसाजन्य अधर्म का भोगी उसे अवश्य ही होना पड़ेगा। जिस प्रकार ‘श्येनेनाभिचरन्यजेत’ इस श्रुतिवाक्य में, अभिचार की रागतः प्राप्ति होने के कारण, श्येनायाग को अभिचार का साधनमात्र बताया गया है, किन्तु श्येन के द्वारा अभिचार करने से जो अनिवार्य रूप से अधर्म होता है, उसका निषेध नही किया गया है। मनु ने भी प्रकारान्तर से इस तथ्य को स्वीकार किया है-‘‘प्राणियों की हिंसा के विना किसी भी प्रकार से मांस की प्राप्ति नहीं हो सकती है, और प्राणियों की हिंसा स्वर्ग प्रद नहीं है, इसलिए मांस भक्षण का परित्याग करना चाहिए। न तो मांस भक्षण में कोई दोष है, न मद्यपान में, और न मैथुन में, क्योंकि इनके प्रति प्राणियों की स्वाभाविक प्रवृति हैं, किन्तु इनसे निवृत होना महाफलदायक है। चक्रपाणि का कथन है कि यदि मनुष्य की जीवन रक्षा मांसोपयोग के बिना सम्भव न हो, तो ‘सर्वत्रात्मानं गोपायीत’ इस श्रुतिवचन के अनुसार हिंसोपाजित मांसभक्षण करने में अधर्म नहीं होता है। हाँ, यदि मांसभक्षण के अतिरिक्त दूसरे उपाय भी जीवन रक्षा के लिए सम्भव हों, तो केवल शरीर की पुष्टि के प्रयोजन की जाने वाली हिंसा अवश्य अधर्मजनक होती है। अथवा आयुर्वेद में हिंसा को यदि विहित भी माना जाय, तो भी उसे दोष मुक्ति नहीं मिल सकती है, क्योकि आयुर्वेद की विविधाँ मुख्यतया आरोग्यसाधन का उपदेश करती है, केवल धर्म साधन का ही उपदेश नहीं करती है। जैसा कि  चरक सूत्रस्थान में कहा गया है- इस आयुर्वेद तन्त्र प्रयोजन धातुओं में साम्य उत्पन्न करना है।

पूर्ण शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए मनुष्य को इस सद्वृत्त का पूर्ण रूप से पालन करना चाहिए। जो पुरूष इस यथोक्त स्वस्थवृत्त का सम्यक प्रकार से अनुष्ठान करता है, वह सर्वदा नीरोग रहता हुआ पूरे सौ वर्ष तक जीवित रहता है। साधुजनो  के  मध्य प्रशंसित होता हुआ वह पुरूष सम्पूर्ण मनुष्य लोक को अपने निर्मल यश से आपूरित कर देता है, धर्म और अर्थ को प्राप्त करता है।

 

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*