मानसिक विकारों में आहार एवं औषध द्रव्य

दूध के गुणों का वर्णन करते हुये चरक ने इसके लिए मनस्करम् शब्द का प्रयोग किया है। चक्रपाणि अनुसार दूध स्वभाव से ओज की वृद्धि करता है और ओज की वृ़िद्ध से मन के अपने कर्म सामथ्र्य की वृद्धि होती है। गदहे का मूत्र व उंट का दूध उन्माद का नाश करता है। क्षीर पलाण्डु का प्रयोग मेधा की वृद्धि करता है। गोघृत के गुणों में उन्माद को हरने का गुण बताया है। पिण्याक शाक के प्रयोग से ग्लपन अर्थात थकावट होना, मुर्झाना या फिर उत्साह हीनता उत्पन्न होता है। विरुद्ध आहार से उत्पन्न होने वाले रोगों का उल्लेख करते हुये उन्माद और मद का उल्लेख किया गया है। अम्ल रस के कर्मो का वर्णन करते हुये मनो बोधयति कर्म कहा गया है। अन्तरिक्ष जल मद, मूच्र्छा आदि को शान्त करता है। सुश्रुत संहिता में लिखा है कि शिलाजीत के सेवन से अल्पकाल में ही उन्माद रोग शान्त हो जाता है। दूषी विष के सेवन से उन्माद की उत्पत्ति बतायी है। चरक संहिता अनुसार विपरीत काल में स्नेहन का प्रयोग करने पर होने वाले रोगों में से उन्माद की भी उत्पत्ति होती है। अपतर्पण जन्य रोगों के अन्तर्गत उन्माद रोग की गणना की गयी है। गुल्म रोग की चिकित्सा में वर्णित नीलन्यादि घृत भी उन्माद की चिकित्सा में कारागर है। इसी तरह वातरक्त रोग की चिकित्सा में वर्णित अमृतादय तेल भी उन्माद रोग में हितकर है।
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इसकी चिकित्सा का उल्लेख करते हुये स्पष्ट किया है कि मानस व्याधि के रहते हुये भी लोभ, काम, क्रोध व मोह के विपरीत एवं उत्तम बुद्धि से हित और अहित का विचार करते हुयेए धर्म अर्थ और काम के अहितकारक कार्याें में छोड़ने के तत्पर एवं धर्म , अर्थ और काम के लिये हितकारी कार्यों का सेवन करने से प्रयत्नवान रहना चाहिए। संसार में कोई भी मनोजन्य सुख बिना धर्म अर्थ और काम के नही होता। विद्यावृद्धपुरुष की सेवा करना, आत्मज्ञान, देश ज्ञान व बल ज्ञान व शक्ति ज्ञान के लिये उचित राती से ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। मन्त्र, औषघि , मणि, मंगल, शुभ कर्म, नियम, प्रयाश्चित, उपवास, स्वस्तिपाठ, नमस्कार, तीर्थटन के साथ साथ, औषध आहार व औषध द्रव्यो ंके दोषनाशक पदार्थों की योजना व मन को अहितकारक विषयों से रोकना -यह सब मानसिक रोगों की चिकित्सा के उपक्रम चरक ने दैव व्यापाश्रय, युक्ति व्यापाश्रय व सत्ववाजय के रूप में बताये हैं। सभी प्रकार के प्राणियों का कल्याण करना, दूसरों के धन की इच्छा न रखना, सत्यवादी शान्त रहने वाला, विचार कर कार्य करने वाला, दूसरों को कष्ट न देने वाना, धर्म अर्थ काम का सेवन करने वाला, पूजा के योग्य पुरुषों की सेवा करने वाला, ज्ञपन, विज्ञान, उपशम, स्वभाव का शील होना, वृद्ध पुरुषों का संग सत्संग करना, राग, क्रोध, ईष्या, मद, मान के वेगों का दमन करने वाला व नाना प्रकार के दान करने वाला व तप ,ज्ञान में रत एवं सदा शान्त रहने वाला आत्मा के चिन्तन में दत्त रतण् इहलोक एवं परलाक का घ्यान रख कार्य करने वाला वउत्तम स्मरण शक्ति वाले व्यक्ति की आयु को हित आयु कहा जाता है। शरीर और मन को उपचित करने वाले भावों में विद्या को सर्वश्रेष्टठ भाव कहा है। श्रेयसकर वस्तुओं में इन्द्रियो का संयम, हर्ष उत्पादक वस्तुओं म तत्वज्ञान व मोक्ष दायक वस्तुओ ंमें ब्रह्मचर्या ही सर्वश्रेष्ठ है।

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