कैसे करें उत्तम संतांन की प्राप्ति

baby_B_12-9-2012जो माता-पिता देवता, ब्राह्मणों की सेवा एवं अनुसरण करने वाले, शुद्ध तथा हितकर आचरण करने में तत्पर रहते हैं उनकी सन्तान उत्तम गुणों से युक्त होती हैं। इससे विपरीत आचरण वालो की स्ंातान गुण रहित संतान को जन्म देते है। आचार्य सुश्रुत अनुसार शरीर में अंग प्रत्यगों की उत्पत्ति स्वाभाविक रूप से ही होती है किन्तु उसमें जो उत्कृष्टता और निकृष्टता जो आती है उसमें धर्म और अधर्म ही कारण होता है।
अच्छा आचरण ही उत्तम संतान प्राप्ति का आधार
अतः भावी माता पिता को शारीरिक, वाचिक, मानसिक अच्छे कर्म और शुद्ध आचरण युक्त होकर सन्तानोत्पत्ति का प्रयास करना चाहिए। उत्तम गुणों, उत्तम स्वास्थ्य से युक्त संतान की प्राप्ति के लिए गर्भाधान से पूर्व ही स्त्री व पुरूष दोनों को उत्तम आचरण के युक्त होकर, उत्तम गुणों से युक्त आहार लेकर, उत्तम संकल्प के साथ समागम करने पर ही अभीष्ट फल की प्राप्ति संतान के रूप में प्राप्त हो सकती है। अगर हम संतान के उत्पन्न होने के पश्चात् ही प्रयास करे वे केवल केवल लालन-पालन में ही सहायक होते है। मूलरूप से अधिक परिवर्तन की सम्भावनाएं कहुत क्षीण होती हैं।

ऐसा रखे अपना आचरण
गर्भिणी पहले दिन से सदा प्रसन्न रहना चाहिए व पवित्र, अलं्कारयुक्त श्वेत कपड़े धारण करने चाहिए। गर्भिणी शान्ति रखने वाली मंगलकार्यरत, देवता की पूजा करने वाली, ब्राह्यण तथा गुरू लोगों की सेवा में तत्पर रहने वाली होनी चाहिए। शयन और आसन पर नरम बिछौना बिछाना चाहिए। हृदय को अच्छी लगने वाले द्रव मधुर, स्निग्ध, दीपनीय वस्तुओं से युक्त भोजन करना चाहिए।
गर्भावस्था में इनसे बचे

अति गुरू, अति उष्ण, अति तीक्ष्ण आहार का सेवन व कठिन चेष्टायें, गर्भ को नष्ट कर देती है । इसक साथ साथ जैसे देवता और राक्षसों के अनुचरों से रक्षा करने के लिए लाल वस्त्र को धारण नही करना चाहिए। मदकारक अन्नपान का सेवन न करे, सवारी पर न चढे, मांस का सेवन न करे। सभी-इन्द्रियों के लिए जो वस्तु इन्द्रियों के लिये हानिकारक हों उन का त्याग कर देना चाहिए। गर्भधारण होने के बाद मैथुन, व्यायाम, अपतर्पण, अतिकर्शन (अधिक कृश करने वाले), दिवास्वप्न (दिन में सोना), रात को जागना, सवारी करना, (घोड़ा, गाड़ी आदि तेज सवारियां), भय, उत्कटुकासन (कठिन आसन), स्नेहन, स्वेदन आदि क्रिया, रक्तमोक्षण और मल, मूत्र, वायुके वेग को नही रोकना चाहिए।
सूखा, बासी कुथित (सड़ा हुआ) तथा क्लिन्न अन्न को नही खाना चाहिए। बाहर निकला, शून्यगृह चैत्य देवताओं से आश्रित वृक्ष अथवा बौद्धालय, शमशान वृक्षों का आश्रय, क्रोध तथा भय युक्त पदार्थ, उसी प्रकार जोर से बोलना, हंसना आदि गर्भ में बाधक बातों से बचना चाहिए। बार-बार तैलाभ्यंग एवं उबटन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। शरीर को कष्ट नहीं देना चाहिए। शयन आसन बहुत ऊँचे न हो, निराधार न हों, पीड़ा रहित हों, मैले विकृत, हीन (न्यून) अवयवों को स्पर्श न करे, दुर्गन्ध युक्त (सड़े हुए), दुर्दर्शन (बुरे दृश्य) और उद्वेग करने वाली कथाओं को छोड़ दे।

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