स्वस्थ मन का आधार -हमारा आहार एवं आचरण

foodआहार मन का परस्पर सम्बन्ध
हमारा चिन्तन इस बात पर भी निर्भर करता है कि हम किस प्रकार का आहार लेते हैं। मन के भावों की शुद्धि के लिये आहार की शुद्धि के लिये आहार का पवित्र होना आवश्यक है। आहार का प्रभाव मनुष्य के मन पर पड़ने से मनुष्य का चिन्तन भी उस द्वारा लिये गये आहार पर निर्भर करता है। छान्दोग्य उपनिषद अनुसार गहण किया गया आहार के तीन भागों में विभाजित हो जाता है। स्थूूल भाग से पुरीष, सार भाग से धातुए व सूक्ष्म भाग से मन का निर्माण होता हैं। इसलिये कहा जाता है कि जैसा खाये अन्न वैसा होगा मन। द्रव्य शुद्धि, काल शुद्धि, क्षेत्र शुद्धि व भाव शुद्धि को ध्यान में रख कर किया गया भोजन शरीर और मन दोनो को स्वस्थ रखता है। सुश्रुत सहिता में लिखा है कि इष्र्या भय क्रोध से व्याप्त, लोभ, रोग तथा दीनता से युक्त पुरुष द्वारा सेवित अन्न ठीक से नही पचता । अतः भोजन के लिये उसके द्रव्यों को चयन करना, पाक करना व विधि पूर्वक बनाने का मानसिक स्वास्थ्य हेतु अपना अलग महत्व है।
हमारे आचरण पर भी निर्भर करता है- हमारा मानसिक स्वास्थ्य
हमारा मानसिक स्वास्थ्य हमारे आहार के साथ साथ हमारे आचरण पर भी निर्भर करता है। तन की स्वच्छता के साथ साथ अगर मन की निर्मलता भी बनी रहे तो न केवल मन अपितु शरीर भी स्वस्थ रहता है। मन के क्षीण होने पर शरीर इन्द्रियों का गुलाम हो जाता है जिसके फलस्वरूप मनुष्य अस्वस्थ हो जाता है। इन्द्रियों को जीतने के लिए व आरोग्य प्राप्ति के लिए विभिन्न उपायों को हमारे आचार्यों ने सदवृत्त विषय के अन्तर्गत वर्णित किया है। सदवृत्त का पालन न करने से धी, धृति व स्मृति का नाश होता है और इसे प्रज्ञापराध कहा जाता है। प्रज्ञापराध से तीनों दोषों का प्रकोप होता है। चरक संहिता अनुसार मलमूत्रादि के वेगों को रोकना, मलमूत्र की प्रवृत्ति न होने पर उसे जबरदस्ती बाहर निकालने का प्रयास करना, अपने सामथ्र्य से अधिक कार्य करना, चिकित्सा कार्य उचित समय पर न करना, पंचकर्म का ठीक ढंग से प्रयोग न करना, आचरण में शिष्टाचार का लोप हो जाना, पूज्यों पुरुषों का अपमान करना, ज्ञान अहित विषयों का सेवन करना, जिन कारणों से पागलपन पैदा हो उन कारणों का प्रयोग बहुलता से करना, अनुचित समय घूमना, अनुचित स्थान पर घूमना, नीच कर्म करने वालों से मित्रता करना, ईष्र्या, अभिमान, भय, क्रोध,लोभ, मोह, तथा भ्रम आदि से युक्त होकर निन्दित कर्म करना व इस प्रकार के अन्य कर्म जो रज एवं मोह से युक्त होते है उन्हे प्रज्ञापराध कहतें है और ये रोगों के कारण होते हैं । अध्ययन ,विचार, मनन, विश्वास एवं आचरण द्वार जब एक मार्ग को मजबूती से पकड़ लिया जाता हैए तो अभीष्ट उद्देश्य को प्राप्त करना बहुत सरल हो जाता है । आदर्शों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य के प्रति लगन का जहाँ भी उदय हो रहा हैए समझना चाहिए कि वहाँ किसी देवमानव का आविर्भाव हो रहा है ।
पूर्ण शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए मनुष्य को इस सदवत का पूर्ण रूप से पालन करना चाहिए। जो पुरूष इस यथोक्त स्वस्थवृत्त का सम्यक प्रकार से अनुष्ठान करता है, वह सर्वदा नीरोग रहता हुआ पूरे सौ वर्ष तक जीवित रहता है। साधुजनो के मध्य प्रशंसित होता हुआ वह पुरूष सम्पूर्ण मनुष्य लोक को अपने निर्मल यश से आपूरित कर देता है, धर्म और अर्थ को प्राप्त करता है।

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