मन के विकार से उत्पन्न होते है शारीरिक रोग

मन के विकार से उत्पन्न होते है शारीरिक रोग

मानसिक विकारों ने जब ऋषि मुनियों को अपना आश्रय बनाया तो नये नये विकार उत्पन्न हुये। दुर्वासा ऋषि के क्रोध की गाथा जग जाहिर ही है। चन्द्रमा ने अपने मन पर संयम रख कर अगर ब्रह्मचर्य का पालन किया होता तो राजयक्ष्मा रोग की उत्पत्ति ही न होती। पार्वती जी ने जब अपने मायके में अपने पति भगवान शिव जी के हो रहे अपमान को दंेखा तो वह क्रोध के आग में कूद पड़ी जिससे शिव जी को क्रोध आया और इस कारएा निदान स्थान में वर्णित आठ रोगों में से राजयक्ष्मा को छोड़ कर शेष सात रोग यथा ज्वर, रक्तपित्त, गुल्म, प्रमेह, कुष्ठ, उन्माद व अपस्मार की उत्पत्ति इसी कारण हुयी। सुश्रुत संहिता में स्पष्ट किया गया है कि विद्यार्थी को अघ्ययन में प्रवृत होने से पूर्व काम, क्रोध लोभ, मोह, मान, अंहकार, ईष्र्या,पशुनता, असत्य, आलस्य, जैसे विकारों से रहित हो जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में इन विकारों के रहते हुये व्यक्ति विद्या ग्रहण के योग्य नही बन सकता ।
जैसे शरीर में उत्पन्न व्याधि मन को प्रभावित करती है और मन में उत्पन्न रोग शरीर को प्रभावित करता है उसी तरह शारीरिक रोग की मुक्ति के लिए मन को निर्मल व विशुद्ध रखना आवश्यक है। आयुर्वेद में शारीरिक रोगों का भी मूल कारण प्रज्ञापराध कहा है। जिस व्यक्ति की बुद्धि निर्मल होती है वह सद्वृत्त और स्वस्थवृत्त के नियमों का पालन करता है और उसको शारीरिक रोग होने की सम्भावना क्षीण हो जाती है। मन की विकृति से विभिन्न रोगों की उत्पत्ति बतायी है। वातज ज्वर, पित्तज ज्वर ,कफज ज्वर, पित्तज प्रमेह, वातज प्रमेह, कुष्ठ, छर्दि ,पाण्डु , तृष्णा ,वात व्याधि, अरोचक, प्रतिश्याय, अतिसार आदि रोगों में मन की विकृति भी एक कारण माना है। चरक संंिहता में दोषज ज्वर के अतिरिक्त काम ज्वर, भय जन्य ज्वर, शोक जन्य ज्वर व क्रोध जन्य ज्वर का भी उल्लेख किया है। त्रिदोषज गुल्म मन, शरीर और अग्नि के बल को नष्ट करता है। यक्ष्मा रोग की आदि उत्पत्ति भी भी काम आसक्ति के कारण हुयी। यक्ष्मा के पूर्वरूपों के images (4)

अन्र्तगत, शरीर के स्वच्छ रहने पर भी गन्दा दिखायी देना, भक्ष्य पदार्थों में मक्षिका, तृण, केश आदि का गिरना प्रतीत होना मानसिक विकार का ही लक्षण है। शोक, लोभ, भय, क्रोध आादि कारणों से अरुचि रोग उत्पन्न होता है। चरक के अनुसार अपस्मार, वातिक व्याधियां, अजीर्ण, अरोचक, तृष्णा व मूढ़गर्भ जैसे रोगों की उत्पŸिा में भय भी एक कारण है। चिन्ता से अजीर्ण, वातिक उन्माद व अपस्मार जैसे रोग उत्पन्न होते हंै। शोक से अपस्मार, अरोचक ,अजीर्ण, वातिक व्याधियां व अतिकृशता उत्पन्न होते हंै। चिन्ता से मुक्ति पाने के लिए वह विभिन्न प्रकार के नशों का सहारा लेता है। शराब का प्रयोग लज्जा अथवा संकोच की नहीं अपितु आधुनिक सभ्यता का प्रतीक बन गयी है।

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