जानिये कौन है स्वस्थ

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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1948 में स्वस्थ व्यक्ति की परिभाषा स्पष्ट करते हुये कहा स्वास्थ्य सिर्फ रोग या दुर्बलता की अनुपस्थिति ही नहीं बल्कि एक पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक खुशहाली की स्थिति है।
जानिये आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ के मापदण्ड
हजारों वर्ष पूर्व आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ सुश्रुत संहिता में लिखा है कि आत्मा, मन व इन्द्रियों की प्रसन्नता के साथ साथ शरीर में स्थित वात, पित, कफ दोष, अग्नि रस, रक्त, मांस ,मेदा, अस्थि, मज्जा व शुक्र आादि सात धातुए ,मल क्रिया का साम्यवस्था में रहना ही

स्वास्थ्य की निशानी है। दूसरे शब्दों में शरीर में उत्साह का बना रहना, गतिशीलता बने रहना, शरीर की सभी चेष्टाएं सम्यक रूप से सम्पन्न होना, मल मूत्र की प्रवृति का यथा समय होना, शरीर के घटको का यथा समय निर्माण होते रहना, आंख, कान, नाक, घा्रण व त्वचा ़द्वारा अपने अपने विषयों का सम्यक रूप से ग्रहण करना, अन्न का ठीक प्रकार से पचना, शरीर के ताप का नियन्त्रित रहना व आंखों की ज्योति बने रहना, भूख ,प्यास का उचित काल में लगना, भोजन में रुचि बने रहना, शरीर की कान्ति , मेधा, बुद्धि की प्रखरता बने रहना, साहस एवं शरीर की सौकुमार्यता बनी रहना, शरीर की स्थिरता, सन्धि बन्धन की स्थिरता, सहन शीलता बने रहना, दोषों की प्राकृत अवस्था को दर्शाता है। शरीर का बल, वर्ण आयु, कान्ति, ओज, ठीक बने रहे। इसी तरह शरीर का पुष्ट होना, रस रक्त आदि धातुओ कासम्यक रूप से निर्माण होना, शरीर में मांस चर्बी आदि का बनना , देह का स्वरूप ठीक प्रकार से बने रहना, शुक्र की स्थिति ठीक प्रकार से बने रहना, सन्तान उत्पति का सामर्थ्य बना रहना,आदि कार्य धातुओ की साम्यावस्था को दर्शता है। शरीर में जलीयांश की स्थिरता बनाए रखना व शरीर का स्वरूप ठीक रखना यह सब उत्तम स्वास्थ्य के लक्षण है। नींद का आना भी उत्तम स्वास्थ्य का प्रतीक है।
कैसे रहा जा सकता है स्वस्थ
प्रतिदिन हितकारी आहार का सेवन करना नितान्त आवाश्यक है। साथ ही दिनचर्या भी नियमित होनी चाहिए जो व्यक्ति समस्त क्रियाओं को विचारपूर्वक करता है, इन्द्रियों के विषयों में लिप्त नहीं होता, हमेशा दूसरों को ही देने की भावना रखता है, दानशील होता है, सभी में समान भाव रखता है, सत्यवादी और क्षमावान तथा अपने पूज्य व्यक्तियों के वचनों का पालन करता है, वह प्रायः रोगों से दूर रह सकता है । स्ुाख दुख, ज्ञान अज्ञान नारीर की पुष्टता व पतलापन , बल व अबल,जीवन मरण सब निद्रा के अधीन है। अतः उचित निद्रा भी आवश्यक है। चरक संहिंता में लिखा है कि जो व्यक्ति अपनी इन्इ्रियो पर संयम रखता है व हितकर आहार करता है वह छतीस हजार रात्रि अर्थात सौ वर्ष तक स्वस्थ रह कर जीवित रहता है।

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