श्वास रोग और चरक संहिता

aचरक ने श्वास रोग को दुर्जय रोग कहा है। चरक अनुसार यह कोष्ठानुसारी रोग है। यह रोग स्वतन्त्र व्याधि के रूप में भी और अनेक व्याधियों के लक्षण के रूप में भी उत्पन्न होता है।
कैसे पैदा होता है श्वास रोग
चरक अनुसार धूल, धूम के श्वास मार्ग में प्रविष्ट होने पर , शीत स्थान पर अधिक रहने से, अधिक व्यायाम करने से अधिक रास्ता चलने से, अधिक रूक्ष भोजन करने से, सेम, तिल, माष आदि का अधिक सेवन करने से, विदाही अन्न, गुरु अन्न, जलज मांस, कच्चा दूध, कफ वर्धक आहार का अधिक सेवन करने से श्वास रोग की उत्पत्ति होती है।
इनसे भी पैदा होता है श्वास रोग
चरक अनुसार प्रमेह पिडिका के उपद्रव के रूप में भी श्वास रोग की उत्पत्ति होती है। वमन, विरेचन, शिरोविरेचन आदि का सम्यक रूप से प्रयोग न होने पर उत्पन्न विभिन्न रोगों में से श्वास भी एक रोग है। मधुर रस के अतिसेवन से श्वास रोग की उत्पत्ति होती है। भेड़ी के दूध से श्वास रोग में वृद्धि होती है। कफज ज्वर के एक लक्षण के रूप में भी श्वास की उत्पत्ति होती है। रक्तपित्त का एक उपद्रव श्वास भी है। कफज गुल्म होने पर श्वास के लक्षण बढ़ जाते हैं। शोष रोग की सम्प्राप्ति में बताया है कि जब प्रकुपित वायु प्राणवह स्रोतों में आश्रित होती है तो श्वास और प्रतिश्याय की उत्पत्ति होती है। अस्थिगत और मज्जागत ज्वर का एक लक्षण श्वास भी बताया है। राजयक्ष्मा के एकादश लक्षणों में से एक लक्षण श्वास भी है। जब गर्भिणी आवी उत्पन्न न होने पर भी प्रवाहण करे तो एक ओर जहां गर्भ की विकृति होती है वहीं गर्भिणी श्वास कास रोग से ग्रसित होती है। प्लीहा रोग के लक्षणों में भी श्वास का उल्लेख भी है। सहज अर्श ग्रसित व्यक्ति कास, श्वास अदि से पीड़ित होता है। पाण्डु रोग के लक्षणों में भी श्वास का उल्लेख है।
कब होता है श्वास रोग असाध्य
चरक अनुसार क्षतज कास से गसित व्यक्ति श्वास रोग से भी पीड़ित ज्वर का वेग तीव्र होने पर जब उसके साथ साथ तीव्र प्रलाप, भ्रम, श्वास हो तो वह रोग मारक होता है। सिराजाल से व्याप्त और अधिक स्थान घेरने वाले गुल्म में श्वास के साथ अन्य लक्षणों से युक्त होने पर वह रोग असाध्य हो जाता है।
श्वास रोग के पूर्वरूप
चरक अनुसार श्वास रोग पूरी तरह व्यक्त हो इससे पूर्व व्यक्ति को कण्ठ और वक्षप्रदेश में भारीपन महसूस होता है। उदर में गुड़गुडाहट, मुख में कसैलापन प्रतीत होता है। यह वह अवस्था है जब व्यक्ति को रोग के प्रति सजग हो जाना चाहिए और अपने खानपान में सावधानी बरतनी चाहिए।

इन से होती है श्वास रोग की चिकित्सा
ऊंट का मूत्र श्वास रोग में हितकर होता हैं। दूध के गुणों का उल्लेख करते हुये उसे श्वाास रोग के लिये उपयोगी बताया है। दशमूल से सिद्ध यवागू श्वास रोग में उपयोगी है। शटी, पुष्करमूल, अम्लवेतस, हिंगु, अगरु, सुरसा, आमलकी, जीवन्ती व चन्डा अर्थात चोरहुली का क्वाथ श्वास रोग को दूर करता है। पुष्करमूल को श्वास, कास व हिक्का रोग की चिकित्सा में चरक ने अग्रय द्रव्य कहा है। धूमपान का विधिवत सेवन श्वास रोग को दूर करता है। साही का मांस श्वास हर होता है। फलों में से मुनक्का श्वासहर होता है। कर्चूर के प्रयोग से श्वास रोग दूर होता है। तुलसी कर प्रयोग श्वास रोग में लाभदायक है। मदिरा का प्रयोग भी श्वास रोग में हितकर होता है। श्वास के रोगी को भोजन के बाद पानी नही पीना चाहिए। भोजन के बाद घृतपान करने से श्वास के रोगी को लाभ होता है। पंचमूल से सिद्ध घृत का प्रयोग श्वास के रोगी के लिये लाभकारी है। च्यवन प्राश से ठीक होने वाले विभिन्न रोगों में से श्वास रोग भी एक है। इसी तरह रसायन प्रकरण में निर्दिष्ट पिप्पली रसायन भी श्वास रोग की चिकित्सा हितकर होता है। रक्तपित्त की चिकित्सा में वर्णित अटरूषकादि क्वाथ के प्रयोग से श्वास रोग में लाभ होता है। इसी तरह गुल्म की चिकित्सा में वर्णित हपुषादि घृत, वासा घृत, भल्लातक घृत से भी श्वास रोग में में लाभ होता है। कुष्ठ की चिकित्सा में वणर््िात कनकबिन्दु अरिष्ट का प्रयोग भी श्वास रोग में हितकर है। राजयक्ष्मा की चिकित्सा में वर्णित खर्जूरादि घृत, क्षतक्षीण की चिकित्सा में वर्णित एलादि गुटिका, अमृतप्राश घृत भी श्वास रोग में लाभकारी है। पिप्पली का मधु के साथ प्रयोग करने से श्वास रोग दूर होता है। शोथ रोग की चिकित्सा में वर्णित पुनर्नवारिष्ट, क्षारगुड़िका, कंसहरीतकी, भी श्वास रोग में हितकर है। उदर रोग की चिकित्सा में वर्णित रोहितकारिष्ट श्वास रोग की चिकित्सा में लाभदायक है। अर्श रोग की चिकित्सा में वर्णित तृतीय पिप्पल्यादि घृत,, श्वास रोग में हितकर है। इसी तरह ग्रहणी दोष की चिकित्सा में उल्लिखित पंचमूलयादि घृत, पंचमक्षार के प्रयोग से श्वास रोग में लाभकारी है। पाण्डुरोग की चिकित्सा में प्रयुक्त होने वाला दाडिमादिघृत, विशालादिफाण्ट व योगराज श्वास में लाभकारी होते है। श्वास रोग की चिकित्सा में तर्पण, बृंहण, निदिग्धिकादियोग, रास्नादि यूष, मातुलुंग यूष, मुदग यूष, हिंगवदि यवागू, दशमूलादि यवागू, पाठाद्यासव, सौवर्चलादि चूर्ण, भार्गींनागरादि योगशटयादि चूर्ण, मुक्तादि चूण, शठयादि योग , दशूमूलादि घुत, तेजोवत्यादि घृत आदि योगो का निर्देश दिया है। कास रोग की चिकित्सा में वर्णित विडंगाादि चूणर््ा, चित्रकादि लेह, दशमूलादि घृत, हरीतकी लेह, श्वास रोग में भी हितकर होते है। श्वास रोग में उष्ण जल पाने का ही निर्देश है। वातव्याधि प्रकरण में वर्णित मूलक तैल का प्रयोग श्वास रोग में हितकर है। शतपाक मधुतैल के प्रयोग से भी श्वास रोग में लाभ होता है। योनिव्यापद् चिकित्सा में निर्दिष्ट बृहद् शतावरी घृत भी श्वास रोग में लाभदायक है। कल्प स्थान में जीमूतक, इक्ष्वाकु, श्यामा त्रिवृत की कल्पना को श्वास रोग में लाभकर बताया है। सिद्धि स्थान में श्वास रोग में वमन व विरेचन करवाने का निर्देश दिया है।
इन लक्षणो वाले श्वास रोगी ठीक नही हो सकते
चरक कि इन्द्रिय स्थान में लिखा है कि जिस पुरुष की श्वास ऊपर की ओर चल रही हो और शरीर शीतल हो गया हो और वंक्षण प्रदश में पीड़ा हो रही हो और रोगी आरामदायक न महसूस कर रहा हो तो उस रोगी का त्याग कर देना चाहिए। तृष्णा, श्वास, शिरो रोग, मोह, दौर्बल्य, अतिसार व कबूतर की तरह करहाने वाले रोगी का त्याग कर देना चाहिए।

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