न्याय दर्शन

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मानव जीवन का लक्ष्य एवं सांसारिक स्थिति की विवेचना अनुभवों के आधार पर करने वाला न्याय दर्शन वस्तुवाद का पोषक है। इसके अनुसार जीवन का लक्ष्य मोक्ष है, जिसके , जिसके द्वारा दुःखों की पूर्णतः निवृत्ति हो जाती है। न्याय के मतानुसार जीवात्मा कर्त्ता एवं भोक्ता हाने से के साथ साथ ज्ञानादि से सम्पन्न नित्य तत्व है। यह जहां वस्तुवाद को मान्यता देता है, वहीं यथार्थवाद का भी पूरी तरह अनुगमन करता है।मानवजीवन में सुखों की प्राप्ति का उतना अधिक महत्व नही है जितना कि दुःखों की निवृत्ति का । ज्ञानवान हो या अज्ञानी , हर छोटा बड़ा व्यक्ति सदैव सुख की प्राप्ति का प्रयत्न करता ही रहता है। सभी चाहते है कि उन्हे सदा सुख ही मिले। कभी दुखों का सामना न करना पड़े, उनकी समस्त अभिलाषाये पूर्ण होती रहे, पर ऐसा होता नही है। अपने आप को पूर्णतः सुखी कदाचित् ही कोई अनुभव करता हो। जिनको भरपेट भोजन , तन ढकने के लिये पर्याप्त वस्त्र तथा रहने के लिये आवास भी ठीक से उपलब्ध नही है तथा जो रोटी रोजी के लिये मारे मारे फिरते हैं उनको तो कष्ट होता ही है अपितु जिन के पास सब कुछ है वह भी दुखी रहते हुए देखे जाते है।
मनुष्य सुख की चाह में दुःख को पाता है
मनुष्य चाहता तो सुख ही है अपितु मिलता उसे दुख है। सुख संतोष के लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहते हुये भी वह अनेक दुखों एवं अभावों से प्राप्त होेता रहता है। आज के वैज्ञानिक युग में पहले की अपेक्षा भौतिक सुख के अनेक साधन विकसित हुये हैं। पर इससे भी कोई स्थायी सुख उपलब्ध नही हो सके। नये नये साधनों ने नये नये दुखों को जन्म दिया। मनुष्य शान्ति की खोज में चिन्ता्रस्त व दुखी ही बना रहा। यही कारण है कि मनुष्य जीवन में प्रसन्न्ता का सतत अभाव होता जा रहा है।े इन समस्त दुखों एवं अभावों से मनुष्य किस प्रकार मुक्ति पा सकता है, प्राचीन महर्षियों , मनीषियों एवं भारतीय तत्वदर्शी महापुरुषों ने इसके लिएये अनेक प्रकार के मार्गो का कथन किया है जो प्रत्यक्ष रूप् से भले ही प्रतिकूल व पृथक प्रतीत होते हो परन्तु पा़त्र व रुचि के आधार पर सबका अपना अपना अपना सच्चा दृष्टिकोण है।। एक मार्ग वह है जो जो आत्मसवरूप के ज्ञान के साथ साथ भैतिक जगत के सभी पदार्थो प्रति अपत्मबुद्धि का भाव रखते हुये पालौकिक साधनों का पउदेश देता है दूसरा मार्ग वह है जो जीवमात्र को ठ्रश्वर का अंश बता कर जीवन में सेवा व भक्तिभाव के समावेश से लाभान्वित होकर आम्तलाभ की बपात बतााता है। इसी तीसरे मार्ग का अवलम्बन न्याय दर्शन करता है जबकि वह ईश्वर उपासना पुनर्जन्म , लोक परलोक, आत्मा आदि से भी भरपूर आस्था रखने वाला है, फिर भी इन सब की सम्यक उपलब्धि तथा इहलौकिक एवं पारलौकिक जीवन की सफलता हेतु भौतिक जगत के पदार्थो एवं उससे समबन्धित घटनाओं का कथन करता है।
पदार्थ का सही स्वरूप
न्याय का मानना है कि जो ज्ञान मनुष्य को उपलब्ध है, वह इन्द्रियों के मन बुद्धि के माघ्यम से ही प्राप्त हुबा करता है। इन सब में विकृति उत्पन्न होने की स्थिति में उपलब्ध ज्ञान भी उसी अनुपात में विकारयुक्त हो जाने के कारण उस विकृत ज्ञान को का आधार लेकर जो भी निर्णय लिया जाएगा पह भी विकार युक्त होता चला जाएगा तथा उससे किसी उदेश्य की पूर्ति नही हो पाएगी। इन्ही सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए न्याय शास्त्र ने यह सैद्धान्तिक अभिव्यक्ति की है कि संसार में आने के के प्श्चात यदि मनुष्य सत्कर्म के माध्यम व सदा व्यवहार के माध्यम से अपने दुखों को दूर करना चाहे तो संसारिक रचना में प्रयुक्त होने वाले चेतन सभी पदार्थो का वास्तिवक स्वरूप भी जाने समझे। अनेक तरह के मतानुयायिों ने अपने अपने विचार से पदार्थो का स्वरूप भिन्न भिन्न प्रकार का बतलसया है जिसके कारण मनुष्य भ्रम में पड़ जाता है । इस भ्रमात्मकतापूर्ण स्थिति से छुटकारा दिलाने के लिये तर्क व साक्ष्यों की ऐसी सुन्दर विचार धारा प्रस्तुत की है जिससे पदार्थो का सही स्वरूप् का निर्णय किया जा सके । जिन साधनो से हमे ज्ञेया तत्वों का ज्ञान प्राप्त हो जाता है , उन्ही साघनों को न्याय की संज्ञा दी गयी है। कहा भी गया है कि
नीयते विविक्षितार्थः अनेन इति न्यायः

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