यौगिक आहार और आपका स्वास्थ्य

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यौगिक आहार का उदेश्य मनुष्य को स्वस्थ रखना हैं । एक स्वस्थ शरीर ही योग की क्रियाओं को अच्छे ढंग से सम्पादित करने में सहायक हो सकता है। जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन , इस तथ्य से हमारा समाज परिचित है। हम जो भी आहार लेते हैं उसके सूक्ष्म भाग से मन का निर्माण होता है।

भाव शुद्धि है आवश्यक

यह केवल इस बात पर निर्भर नही करता कि हम क्या खा रहे है, अपितु हमे इसका भी ध्यान रखना होता है कि हमारा भोजन किस प्रकार की कमायी से बना है, ईमानदारी की अथवा अनूचित साधनों का प्रयोग करके उस अन्न को खरीदा गया है। क्या भोजन का निर्माण पवित्र व स्वच्छ स्थान पर हुआ है या किसी अन्य स्थल पर। भाव शुद्धि के साथ साथ क्षेत्र शुद्धि का भी महत्व है। भोजन पकाते समय भोजन बनाने वाले का चिंतन कैसा था । क्रोध से युक्त व्यक्ति जब किसी भोजन को बनाएगा तो उसका उचित लाभ नही मिल पाता।
भोजन की पसंद बताती है सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक दृष्टि कोण

कोई व्यक्ति सात्विक है या राजसिक अथवा तामसिक इस आधार पर उसकी भोजन के स्वरूप की आवश्यकता निधारित होती है। स्वस्थ रहता है। जो व्यक्ति शुद्ध भाव से भोजन नही करता वह नीरोग नही रह सकता। क्रोध , ईष्या , उत्तेजना ,चिंता , मानसिक तनाव , भय आदि की अवस्था में किया गया भोजन स्वास्थ्य को नुकसान करता है। शुद्ध चित्त से प्रसन्नतापूर्वक किया गया आहार शरीर को पुष्ट करता है , कुत्सित विचार एवं भावों से किये गये भोजन से व्यक्ति कभी स्वस्थ नही रह सकता। इसके साथ भोजन बनाने वाले के भाव भी शुद्ध होने चाहिए। उसें भी ईष्या ,द्वेष क्रोध आदि से ग्रस्त नही होना चाहिए। भोजन किस भावना के साथ बनाया गयाए किस भाव और दुलार के साथ खिलाया गयाए किस वातावरण और मनोभाव से भोजन ग्रहण किया गयाए आदि बातों का सीधा प्रभाव मन पर पड़ता है।

सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक आहार
गीता अनुसार आयु बुद्धि बल आरोग्य सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले रसयुक्त चिकने और स्थिर रहने वाले तथा जो स्वभाव से ही मन को प्रिय हो ऐसा भोजन सात्विक को प्रिय होते हैं। जबकि कड़वे खट्टे लवण युक्त बहुत गरम तीखे रूखे दाहकारक दुःख चिंता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार राजस पुरुष को प्रिय होते हैं। अधपका रसरहित दुर्गंधयुक्त बासी और उच्छिष्ट तथा अपवित्र है वह भोजन तामस को प्रिय होता है। यह आहार स्वादिष्ट संपूर्ण पुष्टिवर्द्धक जीवंतता ऊर्जा स्वास्थ्य व प्रसन्नता में वृद्धि करता है। जो व्यक्ति दुर्गंध युक्त व अपवित्र भोजन करता है उसमें तामसिक गुणों की वृद्धि होती है। तामसी भोजन करने वाला निश्चित रूप से आलसी प्रमादी और अकर्मण्य होगा। राजसी भोजन करने वाले व्यक्ति में विलासी क्रोधी झगडालू प्रवृत्ति वाला होने स्वादिष्ट होने की वजह से अधिक भोजन खाने की आदत वाला होने के कारण बार.बार बीमार होने की संभावना होती है। सात्विक भोजन के प्रभाव से मनुष्य श्रेष्ठ विचारों सद्ग्रंथोंऔर सत्पुरुषों के प्रति रुचि पैदा करता है। होता है। कोई व्यक्ति लगातार उक्त वर्ग में से किसी प्रकार का भोजन करता रहे तो उसमें उस से सम्बधित गुण विकसित होने शुरु हो जाते है। नमकीन व खट्टे और तीखे पदार्थों का सेवन करने वालों में राजसिक गुणों की वृद्धि होती है। रसयुक्त चिकने पदार्थों का सेवन करने वालों में सात्विक गुणों की वृद्धि होती है। सात्विक आहार व्यक्ति को संतुलिक स्वस्थ शरीरए शांति सामंजस्यपूर्ण तालमेल की कुशलता और बौद्धिक व्यक्तित्व प्रदान करता है। सात्विक आहार यौगिक की श्रेणी में शामिल किया जाता है और यह आहार व्यक्ति के तन और मन को शुद्ध कर शक्तिव स्वस्थ और प्रसन्नता से भर देता है।सात्विक आहार शांत व स्पष्ट मस्तिष्क का प्रतिनिधित्व करता है। सात्विक भोजन आयुर्वेद के प्राचीन नियमों पर आधारित हैए जो सामान्य व पारंपरिक विधियों से तैयार किया जाता है।

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