जानिये माईग्रेन की आयुर्वेदिक चिकित्सा

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आजकल हम लोगों की दिनचर्या इस तरह की हो गयी है कि भाग दौड़ के चलते समयाभाव ऐसा बना हुया है कि न तो हम खान पान के नियमों पालन सही प्रकार से कर रहे है और न ही हमारा रहन सहन हमारे स्वास्थ्य के नियमो के अनुकूल हो रहा है। वर्तमान में जहां घटिया व मिलावटी अन्न के सेवन का प्रयोग दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है वहीं जल्दी जल्दी के चक्कर में हम बहुत बार या तो समय पर खाना नही खा पाते या फिर बहुत देरी के साथ या समय से पहले ही भोजन कर लेते है। ऐसे में हम अनेक रोगों के शिकार हो रहे हैं और उनमें से पैदा होने वाले अनेक रोगों में से आधे सिरदर्द में होने वाला रोग जिसे माईग्रेन के नाम से जाना जाता है हमारी दिनचर्या को पूरी तरह अव्यवस्थित कर देता है । मााईग्रेन सिर में होने वाला ऐसा रोग है जिसमें रोगी के सिर के आधे भाग में दर्द रहता है। इस का वेग आने पर व्यक्ति की हालत ऐसी हो जाती है कि वह अपनी रुटीन का कोई भी काम करने में सक्षम नही होता । उसे ऐसा लगता है कि सिर पर कोई मुक्के मार रहा है उसका दिल घबराता है उलटी आने की इच्छा होती है। न तो उसे कोई शोर अच्छा लगता है, न ही कोई रोशनी और न ही कोई खुशबु अच्छी लगती है। यद्यपि चिकित्स शास्त्रों के ग्रन्थों में ऐसे रोग में सिरदर्द की उत्पत्ति आधे भाग में बतायी है पर व्यवहार में सिरदर्द प्रायः पूरे भाग में देखने को मिलता है।
क्यों होता है माईग्रेन
नींद पूरी न होना, थकावट होना, चमचमाती रोशनी, नशीली दवाईयों का सेवन, काफी का सेवन अधिक करना, अधिक भूखे रहना, हार्मोनल परिवर्तन, आदि कारणों से यह रोग पैदा होता है। आयुर्वेदिक ग्रन्थों में इस रोग का वर्णन अर्धावभेदक के नाम से किया है। ओस, शीतल हवा के साथ साथ रूखा भोजन करना, अधिक भोजन करना, समय पर भोजन न करना, श्ीातल द्रव्यों का प्रयोग करना, पहला भोजन पचा न होने पर पुनः भोजन करना श्ीातल भोजन करना ,मल मूत्र की प्रवृति होने पर उसे जबरदस्ती रोकना, अधिक व्यायाम करना, अधिक चलना अर्धावभेदक अर्थात माईग्रेन के पैदा होने के कारण है।
कब होता है माईग्रेन
यह रोग प्रायः किसी भर उम्र में हो सकता है पर 35 से 45 वर्ष के लोगेां में यह अधिक मिलता है। बच्चे भी इस रोग के शिकार हो जाते है। पर किशोर अवस्था में इस के रोगियों की संख्या बढ़ जाती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार विश्व में मिलने वाले सिर दर्द के रोगयों में से दस प्रतिशत रोगी माईग्रेन के ही होते है।
किसको होता है यह रोग
शारीरिक परिश्रम करने वालों को मजदूरो को यह रोग नही होता जबकि लिखा पढ़ी करने वालों र्को अाित मानसिक कार्य करने वालों का इस रोग के होने की सम्भावना अधिक बनी रहती है।
आयुर्वेद के ग्रन्थों अनुसार अपने कारणों से प्रकुपित हुयी वायु जब कफ के साथ मिल कर शरीर के आधे भाग को जकड़ लेती है तो शंख प्रदेश, कान, आंख व माथे में इस तरह की दर्द पैदा करता है कि जैसे इसको किसी शस्त्र से काटा जा रहा हो।
लक्षणों से ही होता है माईग्रन का निदान ,किसी लैब टैस्ट से नही
माईग्रेन का सुनिश्चित निदान किसी भी खून या मूत्र की जांच से नही होता सिरदर्द किसी और कारण से हो तो उसका पता खून अथवा मूत्र की जांच से पता चलता है। यह रोग जब अधिक देर तक बना रहता है तो सुनने की व देखने की क्षमता का ह्रास होजाता है।
चिकित्सा
इस के रोगी को कब्ज की शिकायत नही रहने चाहिए। त्रिफला चूर्ण का प्रयोग गरम जल के साथ करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पेट साफ रखने वाली दवाई को कभी भी शीतल जल के साथ नही करना चाहिए। जिस दिन पेट साफ करने वाली दवाई ले उस दिन मूंग की दाल की खिचड़ी घी के साथ ले। सुबह सुबह दूध के साथ जलेबी लेने से सारा दिन सिरदर्द नही होता । सुबह खाली पेट नही रहना चाहिए। दूध, मलायी,खोया, रबड़ी, मालपुया, फेणी , घेवर , हलवा आदि का प्रयोग करने से इस रोग की शिकायत नही होती। सुबी सुबह दूध दूध में घी डाल कर पीने से लाभ मिलता है। भोजन के बाद घी पीने से इस रोग में लाभ मिलता है। गाय का दूध या घृत नाक में दो दो बूंदे डालने से लाभ मिलता है। नौसादर और चूना का मिश्रण सूंघने से इस रोग में लाभ मिलता है। हरड़ बहेड़ा ,आंवला, चिरायता हल्दी व नीम का क्वाथ लेने से लाभ मिलता है।
क्या खाएं
पुराना घी ,साठी चावल, मूंग की दाल, जौं, परवल, सहजन, बथुआ ,करेला, बैंगन, की सब्जी व फलो में से आम, अंगूर, नारियल व अनार का प्रयोग लाभकर है। हरड बहेड़ा, चन्दन व घृतकुमारी का प्रयोग भी माईग्रेन में लाभ पंहुचाता है। नदी में स्नान करना ,सिर पर सेक करना, दालचीनी के चूर्ण का लेप करना माईग्रेन में हितकर है।
माइग्रेन के रोगियों का ख्याल रखना चाहिए कि भूखे पेट रहने से , धूप में घूमने से ज्यादा देर तक टी वी देखने से यह रोग बढ़ता है अतः इस प्रकार की स्थिति से बचना चाहिए। रोग की चिकित्स इस बात में निहित है कि रोग को पैदा ही न होने दिया जाए । इस के कारणों से बचे। एलोपैथी में माइग्रेन के लिये जो औषधिया बतायी है उनका प्रयोग तभी लाभ पंहुचाता हैं जब उनका सेवन रोग के वेग के शुरु में ही कर लिया जाए।

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