मौत को जीतने के लिये सम्पूर्ण विश्व प्रयासशील है, पर जीवन कैसे जीना चाहिए यह ज्ञान आयुर्वेद में ही समाहित है। आयुर्वेद अपने देश की परिस्थितयों के अनुरूप रचित ज्ञान का भण्डार है। प्राचीन भारतीय ज्ञान के स्रोत न केवल शिक्षा पर अपितु उच्च नैतिक मूल्यों एवं उत्तम स्वास्थ्य प्राप्ति के साधनों पर भी आधारित है। आहार विहार सम्बन्धित आचरण स्वस्थवृत्त  व सद्वृत्त के रूप में निर्दिष्ट हैं।

अनैतिक इच्छाएं रोगों का कारण

वर्तमान जीवन में भागदौड़  एवं अधिक से अधिक धन उपार्जन की प्रवृति के कारण मनुष्य की दिनचर्या व आदतें परिवर्तित हो रही हैं। ग्रन्थों में निर्दिष्ट उपदेशों के वह अपनी सुविधा अनुसार अर्थ ग्रहण कर उसे व्यवहार में ला रहा है। अनैतिक इच्छाओं के कारण मनुष्य के शरीर में कई दुर्गुणों के प्रवेश के लिये द्वार खुल गये हैं। आचरणजन्य कार्यों में व्यतिक्रम होने से वह बहुत से रोगों से ग्रसित हो रहा है।

ब्राह्म मुहूर्त में उठना

ब्राह्म मुहूर्त में उठने का निर्देश आयुर्वेद के साथ साथ अन्य ग्रन्थों में भी किया है। इस समय उठ कर धर्म अर्थ व देह का ध्यान करने को कहा है। ब्राह्म मुहूर्त में उठने से व्यक्ति को सुंदरता, लक्ष्मी, बुद्धि,स्वास्थ्य, . आयु आदि की प्राप्ति होती है। ऐसा करने से शरीर कमल की तरह सुंदर हो जाता है। ऋग्वेद में कहा है कि सुबह सूर्य उदय होने से पहले उठने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। इसीलिए बुद्धिमान लोग इस समय को व्यर्थ नहीं गंवाते। सुबह जल्दी उठने वाला व्यक्ति स्वस्थ, सुखी, बलयुक्त और दीर्घायु होता है।

आचरण

काम, क्रोध,लोभ से भी पैदा होते है रोग

चरक संहिता में मनुष्य के लिये  प्राण एषणा, धन एषणा व परलोक एषणा इन तीन एषणाओं का उल्लेख है । वर्तमान में धनप्राप्ति का उद्धेश्य केवल जीवनयापन तक सीमित न होकर अपितु अधिक से अधिक संग्रह करने की इच्छा को दर्शाता है। धन और बल के कारण सभी नैतिक व अनैतिक ढंग से वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छा, बलवती रहती है। गीता में नरक के तीन द्वार के रूप में निर्दिष्ट काम क्रोध लोभ जैसे दुर्गुण बहुत से लोगों के व्यक्तित्व का अंग बनते जा रहे हैं। चरक अनुसार अधिक काम में लिप्त होने पर राजयक्ष्मा, वातज ज्वर, वातज गुल्म ग्रहणी व वातज कास रोग होते हैं।

सुश्रुत अनुसार अति स्त्री संयोग से शूल, कास ,ज्वर, श्वास, दुर्बलता, पाण्डु रोग, क्षय, आक्षेपक आदि रोग पैदा होते हैं। क्रोध से अपस्मार, ज्वर हृदय रोग, वातरक्त .अर्श गुल्म प्रमेह योनिकन्द अजीर्ण रोग पैदा होते हैं। शोक से अपस्मार, अरोचक, अजीर्ण, वातिक व्याधिया व, अतिकृशता रोग पैदा होते हैं। भय से अपस्मार, वातिक व्याधियां अजीर्ण, अरोचक,  तृष्णा , मूढ़गर्भ  रोग पैदा होते हैं। चरक ने उदर रोग, कुष्ठ, क्रिमिज शिरो रोग  व श्वित्र रोग की उत्पत्ति में पाप कर्म भी कारण माना है।

पिछले जन्म के पाप भी देते हैं इस जन्म में रोग

 गौतमशातातप स्मृति ग्रन्थ के अनुसार इस जन्म के पाप अगले जन्म में भी रोग उत्पन्न करते हैं। यथा देव द्रव्य चुराने वाला ज्वर, पीठ पीछे निन्दा करने वाला श्वास रोग,दूसरों को दुःख देने वाला शूल, रजस्वला की दृष्टिदोष से दूषित भोजन का सेवन श्लीपद , नाना प्रकार के द्रव्य चुराने वाले संग्रहणी रोग से ग्रसित होता है।

इनसे बचें

स्त्री के गर्भ को गिराने वाले को यृकत रोग, वन में आग लगाने वाला रक्तातिसार से पीडिंत होता है। तेल, घी व चिकनी वस्तुओं को चुराने से  क्षय रोग ,गुरु की ताड़ना करने पर उस को मारने वाला अपस्मार ,दुराचार करने से  खल्वाट,  अनियमित व स्वच्छन्द यौनाचार  मधुमेह अपने ही गोत्र की स्त्री से गमन करने पर श्लीपद देवमन्दिर में या पुण्य जल में मूत्र विष्ठा त्यागने पर भगन्दर रोग से ग्रसित होता है।

गर्भपात का पाप ब्रह्महत्या से दुगना

वर्तमान में मनचाही संतान प्राप्ति करने की इच्छा के फलस्वरूप अवाछिंत सतान को समाप्त करने हेतु मनुष्य की प्रवृति गर्भपात की ओर भी पनपी । मनुस्मृति में कहा है कि गर्भपात का पाप ब्रह्महत्या से दुगना होता है। गर्भपात देखने वाले की दृष्टि जिस भोजन पर पड़ जाए वह भोजन नहीं करना चाहिए।

दाम्पत्य जीवन में ईमानदारी

 शास्त्र कहते हैं कि पुरुष केवल अपनी पत्नी में प्रीति रखे और पत्नी पति को देव तुल्य सम्मान दे। मनु स्मृति में कहा है कि जिस कुल में स्त्री से पुरुष व पुरुष से स्त्री प्रसन्न रहते हैं उसी कुल में आनंद लक्ष्मी व कीर्ति निवास करती है।

आचरण

अनुचित ढंग से कमायी अहितकर

अर्थववेद में कहा है कि पुण्य से कमाया हुया धन ही सुख देता है। पाप की कमायी को छोडने के लिये कहा है। पसीने की कमायी से व्यक्ति सुखी बनता है। दान देने के लिए कमायो संग्रह के लिए नही। धन हानिमें राजा, चोर, उत्तराधिकारी, अन्यान्य प्राणी व क्षय कारण होते है। धन के उपार्जन में दुःख, रक्षा में दुःख, नाश में दुःख, व्यय में भी दुःख है।बिना किसी का दिल दुखाए, दुष्ट पुरुषों के पास जाए, बिना धर्मज्ञ सज्जनों द्वारा अपनाये गये सन्मार्ग का उल्लंघन किये जीवन में जो अल्प मिल जाए उससे संतोष करना चाहिए।

प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़

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