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भविष्य पुराण अनुसार सूर्य ने अग्नि को प्रतिपदा, ब्रह्मा को द्वितीय, कुबेर को तृतीय व गणेश को चतुर्थी तिथि प्रदान की है, नागराज को पंचमी, कार्तिकेय को षष्ठी, अपने कोे सप्तमी व रुद्र को अष्टमी तिथि दी है, दुर्गा को नवमी, अपनी संतान यम को दशमी ,विश्वदेव के गणों का एकादशी, विष्णु को द्वादशी, कामदेव को त्रयोदशी शंकर जी को चतुर्दशी व चन्द्रमा को पूर्णमाशी की तिथि दी है। सूर्यदेव के द्वारा पितरों को पवित्र व पुण्य तिथि अमावस्या प्रदान की गयी है।

चरक अनुसार अमावस्या है पितरों का दिवस आयुर्वेद के ग्रन्थों में भी अमावस्या को ही पितरों की तिथि के रूप में ग्रहण किया है। आगन्तुज उन्माद की उत्पत्ति हेतु चरक संहिता में लिखा है कि जैसे दर्पण में छाया प्रवेश कर जाती है या फिर चन्द्रकांत मणि में सूर्य की किरण्ंो प्रवेश कर जाती है उसी तरह माता, पिता, गुरु, वृद्ध, सिद्ध और आचार्य में भक्ति रखने वाले व्यक्तियों मे कोई त्रुटि स्वरूप छिद्र पाकर चैक्षाचार वाले, तपस्या और स्वाध्यायशील, विद्वान व्यक्तियों में देवादिग्रह शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा अथवा त्रयोदशी ,ऋषिग्रह षष्ठी व नवमी , दशमी और अमावस्या को, गन्धर्व ग्रह द्वादशी और चतुर्दशी को ,यक्ष ग्रह शुक्ल एकादशी, ब्रह्मराक्षस शुक्लपक्ष की पंचमी व पूर्णिमा को राक्षस ग्रह और पिशाच ग्रह द्वितीय, तृतीय व अष्टमी तिथि में प्रवेश करते हैं। ऐसा व्यक्ति उन्माद रोग से ग्रसित हो जाता है। ऐसी अवस्था में पूजा, अर्चना मंगल, होम आदि से लाभ मिलता है।

Amavasya
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सुश्रुत संहिता में भी है पितरोंे की पूजा का निर्देश सुश्रुत संहिता अनुसार देवग्रह पूर्णमाशी के दिन, गंधर्व जाति के ग्रह अष्टमी के दिन, यक्ष ग्रह प्रतिपदा के दिन व पितर ग्रह अमावस्या के दिन शरीर में प्रविष्ट होते हैं। सुश्रुत संहिता में लिखा है कि भगवान कार्तिकेय ने अपने ग्रहों से कहा कि जिन कुलों में देवताओं और पितरों के लिये यज्ञ नही होता, जहां ब्राह्मण -साधुु, गुरु और अतिथियों का पूजन सत्कार नही होता, भिक्षादान नही होता, सदाचार का पालन नही होता, जहां फूटे हुये कांसे के बर्तनों में भोजन किया जाता है उन घरों के बालको में वो प्रवेश कर सकते हैं । उनके संरक्षक बालकों को ठीक करने के लिये इन की पूजा करेगें जिससे कि उनकी आजीविका चलेगी।

पितरों की पूजा से मिलते हैं अनेक लाभ अमावस्या पितरों का ही दिवस है। इसे पर्व तिथि कहा जाता है। इसमे दान , पुण्य, जप, तप और व्रत करने से फल मिलता है। इस तिथि को श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होते है। अमावस्या को पितर पूजित होने पर मनुष्य को सभी प्रजावृद्धि, धनरक्षा, आयु व बल शक्ति प्रदान करते हैं। उपवास के बिना भी वे सभी प्रकार के उत्तम फल देते है। मनुष्य के सारे अरिष्टों का नाश हो जाता है व वह व्यक्ति रूपवान, धार्मिक व शत्रुओं का नाश करने वाला हो जाता है।

पितर भी रखते हैं संतुष्टि की अपेक्षा मनु स्मृति में लिखा है कि ऋषि, पितर, देवता, भूत व अतिथि गृहस्थों से अपनी संतुष्टि की अपेक्षा रखते हैं। जो इन को अन्न आदि से संतुष्ट नही करता वह श्वास लेते हुये भी मृत समान होता है। अमावस्या एक ऐसा अवसर है जब व्यक्ति अपने पितरों के प्रति अपनी आस्था व श्रद्धा प्रकट कर सकता है। मनु स्मृति में ही लिखा है कि जिस व्यक्ति के पिता की मृत्यु हो चुकी होती है अगर वह प्रति अमावस्या उनका श्राद्ध नही करता तो उसे प्रायश्चित करना पड़ता है। अमावस्या को तीन काल स्नान करना चाहिए। हमारे धार्मिक ग्रन्थों में श्राद्ध पक्ष के प्रत्येक दिवस श्राद्ध करने के अलग अलग लाभ बताये है लेकिन अमावस्या को श्राद्ध करने से सम्पूर्ण कामनायों की प्राप्ति होती है।अमावस्या पर यह कार्य न करें।

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अमावस्या पितरों का दिवस होने से उनको श्रद्धा पूर्वक सम्मान देने के लिये हमारे शास्त्रों में उस दिन कुछ उन कार्यों का निषेध किया है जिन्हे हम अपने रोजाना जीवन में सामान्य कार्य के रूप में करते है। आयुर्वेद के आचार्य वाग्भट अनुसार अमावस्या को अध्ययन नही करना चाहिए। अमावस्या को दातुन करने का निषेध है। पद्य पुराण के सृष्टि खण्ड में लिखा है कि जो व्यक्ति अमावस्या, सक्रान्ति अथवा पूर्णमाशी को हल जोतता है उसे दस हजार गोहत्या का पाप लगता है। तिल और आंवले के चूर्ण का लेप कर स्नान करना श्रेष्ठ फलदायी होता है लेकिन अमावस्या पर स्नान करते समय इसका लेप नही लगाना चाहिए। अथर्ववेद में लिखा है कि अमावस्या को समूह रूप में कृमि पैदा होते हैं। भविष्य पुराण में लिखा है कि अमावस्या को हविष अर्थात हवन में प्रयुक्त होने वाले घृत का सेवन करना चाहिए।

प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़

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