अतीत में भारत देश पर विभिन्न विदेशी शासकों का प्रभुत्व रहने के कारण उनका आयुर्वेद के प्रति दृष्टिकोण नकारात्मक होते हुये भी आयुर्वेद द्वारा अपनी अस्मिता को बचाए रखना उसमें निहित गुणों का द्योतक है। पर अपने ही देश में आयुर्वेद का विकास परोक्ष कारणों से  बाधित हो रहा है। आयुर्वेद की जड़ों में तेल देने के विभिन्न कारणों से एक कारण समाज में प्रचलित भा्रमक
विज्ञापन भी है। जी हां यह चाहे सुनने में अजीब लगे, पर आयुर्वेद को अयथार्थ एवं लुभावने विज्ञापनों के मायाजाल के द्वारा उनका प्रस्तुतिकरण आयुर्वेद को सत्य से कोसो दूर ले जाता है। बहुत सारे विज्ञापन आयुर्वेद को उसके गुणो ंके आधार पर नही अपितु व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के साधन के रूप में परिलक्षित करते है।

आयुर्वेद से संबधित जिन उपक्रमों/साधनों की आधी अधूरी जानकारी आम जनता तक है उसको तथाकथित व्यापारी लोग उनको तवा बनाकर अपनी रोटिया सेकने में संकोच नही करते। व्यापार करना अनुचित नही है अपतिु विषय को गलत ढंग से व्यक्त करना आयुर्वेद के लिये हितकर नही है।

भ्रामक विज्ञापन

  पंचकर्म चिकित्सा के नाम का दोहन

इसमें कोई दो राय नही है कि  पंचकर्म  चिकित्सा के कारण आयुर्वेद की पहचान विश्व के मानचित्र पर बनी है। पंचकर्म चिकत्सा के नाम पर देश के विभिन्न स्थलो पर बहुत सारे पंचकर्म सेंटर खुले है। बहुत से लोग जो शास्त्रोक्त विद्या से अनभिज्ञ हैं वे पंचकर्म के नाम पर लोगो की शास्त्र से हटकर चिकित्सा कर रहे है। इससे न केवल विद्या की बदनामी होती है अपितु आयुर्वेद की गरिमा का भी ह्रास होता है।

मोटापा कम करने के सैंटर

 मोटापा कई रोगों का आश्रय है और साथ ही शारीरिक सौंन्दर्य का आधार । इसके प्रति लोगों की संवेदनशीलता स्वाभाविक ही है। इस मानसिकता का लाभ उठाकर बहुत से फर्जी चिकित्सक मोटापे को दूर करने के विज्ञापन प्रचारित कर आयुर्वेद को बदनाम करते है। । वाग्भट्ट ने कहा है कि अतिस्थूलता की अपेक्षा अतिकृशता उत्तम होती है क्योंकि स्थूलता की कोई चिकित्सा नही होती। काश्र्यमेव वरं स्थौल्यान्न हि स्थूलस्य भेषजम्। बृंहणं लंघनं वाऽलमतिमेदोग्निवातजित्।अगर स्थूलता की चिकित्सा होती तो संसार में कोई भी व्यक्ति मोटा नही मिलता।

गंजेपन के विज्ञापन

गंजेपन के नाम पर बहुत सारे विज्ञापन देखने को मिल जाते है। सिर पर बाल न होने से अगर एक तेल लगाने से गंजे सिर पर लहलहाते काले बाल आजाए तो दुनिया में कोई भी व्यक्ति गंजा नही होता।

चूंिक अधिकतर समाचार पत्र वाले  व स्वास्थ्य पत्रिकाएं इस प्रकार के भा्रमक विज्ञापनों के प्रकाशन से पोषित होते हैं  अतः वो अतः सामाजिक कुरीती पर अपना मुंह बंद रखने के बजाए उसे उचित समझते है।

दिमाग तेज करने वाली दवाईयों के विज्ञापन

अगर किसी दवाई को खाने से दिमाग तेज होता है तो कोई भी विद्यार्थी फेल नही होता । शब्दकोष में से मूर्ख ,मंद बुद्धि जैसे शब्दों को अस्तित्व ही नही होता। बहुत बार अपनी नैसर्गिक समझदारी के कारण  जब कोई बालक किसी परीक्षा में बाजी मार लेता है अथवा किसी खेल स्पर्धा में विजयी हो जाता है तो समझों भविष्य में उसकी बुद्धि व प्रतिभा का श्रेय कोई आयुर्वेदिक कंपनी खरीद लेगी, क्योंकि वास्तव में कोई ऐसी वस्तु है ही नही जिसके सेवन से बुद्धि इस प्रकार प्रखर हो जाए ।

काले रंग को गोरा करना

अगर कोई आयुर्वेदिक दवाई लगाने से कोई गोरा हो जाता हो तो दुनिया में कोई भी व्यक्ति काले रंग का नही होता । वैवाहिक विज्ञापनों में गोरी कन्या चाहिए जैसी पंक्तियो की आवश्यकता नही रहती। लेकिन इस तथ्य से अवगत होते हुये भी बहुत से लोग न जाने आयुर्वेद के नाम पर लोागें को गुमराह कर रहे है।

डायबिटीज का शर्तिया इलाज

 डायबिटीज अथवा मधुमेह को अभी तक किसी भी चिकित्सा पद्धति द्वारा ठीक नही किया जा सकता। चरक संहिता में इसे असाध्य रोग कहा है और आज के समय में भी यह असाध्य है। फिर भी मधुमेह रोग के शर्तिया इलाज के विज्ञापनों की भरमार देखने को मिलती है। साथ में नीम हकीमों के पास भी इसको ठीक करने के दावे उपलब्ध होते है। इस प्रकार के विज्ञापनों में कछ अवस्थाओं में लाक्षणिक चिकित्सा अवश्य होती है लेकिन रोग के कारण तक पंहुच नही हो पाती ।

अर्श रोग को एक मलहम से ठीक करना

  अगर महर्षि चरक अर्श रोग का विज्ञापन देखें कि एक मलहम और एक कैपसूल से अर्श रोग ठीक हो जाता  तो उनको दुःख होता कि उन्होने  अर्श रोग के कारण, भेद, लक्षण व चिकित्सा बताने के लिये 255 श्लोक व्यर्थ में ही लिखे।

जोंड़ों के दर्द अनेक – उपाय एक

जोंड़ों के दर्द अनेक – उपाय एक का विज्ञापन देखकर चरक निश्चित रूप से परेशान होते कि उन्होने वातज रोग और वात रक्त की चिकित्सा लिखते समय अपनी उर्जा का क्षय किया। जोड़ों के दर्र्दों की बेजोड़ दवा, अनेक दर्दों के एक दवा जैसे विज्ञापन लुभावने तो अवश्य होते हैं। लकिन यह आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह अवश्य लगाती है।

आयुर्वेद केवल हर्बल नही है

आयुर्वेद में हर्बल शब्द को पकड़ कर बहुत से कम्पनी वालों ने इस के व्यापार को चाहे करोडों रुपये तक पंहुचा दिया हो लेकिन आयुर्वेद को कितना नुकसान पंहुचा है इस का अन्दाजा लगाना मुश्किल है।

याद रखें कि प्रकृति ने हमे गुण कुछ निश्चितकाल के लिये दिये है

आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ शांर्गधर संहिता के अनुसार कि आयु व्यक्ति के प्रत्येक दशक में किसी एक जैविक गुण का ह्रास करती है। प्रथम दस वर्ष के अन्त में बाल्यावस्था  अर्थात चंचलता का ह्रास हो जाता है। दूसरे दशक के अन्त तक व्यक्ति की वृद्वि जिस स्तर तक होनी होती है हो जाती है। उसके उपरान्त ़वृद्धि को पूर्णविराम लग जाता है। व्यक्ति की छवि तीसरे दशक तक से उत्तम रहती है उसके बाद उसकी छवि कम होनी शुरु हो जाती है। चालीस वर्ष से धारणा शक्ति का ह्रास होना शुरु हो जाता है। त्वचा की जो सुन्दरता पचास वर्ष तक बनी रहती है वह उत्कृष्टता का परिचायक होती है। स्वस्थ दृष्टि की काल मर्यादा 60 वर्ष तक है। शुक्रोत्पत्ति अथवा संतानोत्पत्ति की सीमा अधिकतम 70वर्ष की है। सौ वर्ष की जिन्दगी के अन्तिम तीन दशक में क्रमश बुद्धि व कर्मेन्द्रियो का ह्रास होता है। हम इस सिद्धान्त के विपरीत नही चल सकते।

 अगर  किसी आयुर्वेदिक औषधि के सेवन से 70 साल का व्यक्ति तेज दौड़ता हुया दिखाया जाता है, तो उसकी सत्यता का एहसास आप स्वंय कर सकते हो। विश्व में वरिष्ठ नागरिको के लिये अलग से कोई सुविधा उपजित इसलिये होती है कि प्रकृति द्वारा उनका बल एक युवा की तुलना में कम कर दिया जाता है।अतः उसकी क्षमताओं की सीमाएं संकुचित हो जाती है। उसपर किसी भी दवा से चमत्कार की आशा रखना मानों अमावस्या में चांद की तलाश के समान है।

 एक आयुर्वेद के ग्रन्थ आम आदमी की पंहुच में नही होते इसलिये विज्ञापन दाता उसको अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु प्रस्तुत करते है।

प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़़

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