पूर्वजन्म में किया हुया भाग्य नामक अनुबन्धिक अर्थात आत्मा के साथ परलोक में भी निश्चित रूप से बंधा हुया है।
            

माता के आचरण व खानपान में कोई त्रुटि न होते हुये भी कुछ बच्चे बीमार ही पैदा होते है । यहां पर ये दोष गर्भावस्था में माता की जीवनशैली के कारण नही अपितु पूर्वजन्म के कर्म होते है। इसी तरह बहुत बार जो रोग आसानी से ठीक हो सकते हैं उचित चिकित्सा करने पर भी उन्हे वांछित लाभ प्राप्त नही होता । आयुर्वेद अनुसार इन सबका कारण पूर्वजन्म के कर्म ही हैं। व्यवहार में कहा जाता है कि हम कर्म अपनी इच्छा अनुसार कर सकते हैं लेकिन उनके फल निश्चित रूप से हमारे कर्मों के अनुसार ही होते है। कर्म कर्मों को पुरुषकार कहा है।
स्मृतः पुरुषकारस्तु क्रियते यदिहापरम्।। च.विमान 3/30
बहुत बार बुद्धिमान चिकित्सक के द्वारा भी साध्य रोगी के रोग की चिकित्सा में लाभ नही होता तो उसमें दैव की विपरीतता कारण होती है।
बीस प्रकार के यानि रोगों में मिथ्या आहार विहार, आर्तव और शुक्र दुष्टि के साथ साथ दैव को भी कारण कहा है।
मिथ्याचरेण ताः स्त्रीणा प्रदुष्टेनार्तवेन च। जायन्ते बीजदोषाच्च दैवाश्च श्रणु ताः पृथक्।। च.चिकित्सा 30/8
चरक अनुसार विप्र, गुरु का तिरस्कार करना व अन्य पापकर्म का आचरण करने वाले व्यक्ति कुष्ठ रोग से ग्रसित होते हैं। ब्राह्मण, स्त्री, सज्जन व्यक्तियों की हत्या करने से तथा परद्रव्यहरण के फल भोगने का स्वरूप कुष्ठ रोग की उत्पत्ति के रूप में परिलक्षित होता है। कुष्ठ रोग को कर्मज व्याधि कहा है और अगर कोई व्यक्ति कुष्ठ रोग से मृत्यु को प्राप्त होता है तो वह अगले जन्म में भी वह कुष्ठ रोग से ग्रसित होता है।
ब्रह्मस्त्रीसज्जनवधपरस्वहरणादिभिः ।
कर्मभिः पापरोगस्य प्राहुः कुष्ठस्य सम्भवम्।। सुश्रुत संहिता निदान 5/30
म्रियते यदि कुष्ठेन पुनर्जातेऽपि गच्छति ।
नातः कष्टतरो रोगो यथा कुष्ठं प्रकीर्तितम् सुश्रुत, निदान 5/31
पूर्वदेह से किये गये अनुचित कर्म भी इस जन्म में आगन्तुक उन्माद के कारण होते हैं।
देवर्षिगन्धर्वपिशाचयक्षरक्षः पितृणामभिधर्षणानि।
आगन्तुहेतुर्नियमव्रतादि मिथ्याकृतं कर्म च पूर्वदेहे ।। चरक चिकित्सा 9/16
पूर्वजन्म में किये गये कर्मो के आधार पर ही गर्भ में पैदा होने पर उसका भवितव्य होता है और दैवयोग से मन में उसी प्रकार के दौहृदय की आकांक्षा उत्पन्न होती हैं।
कर्मणा चोदितं जन्तोर्भवितव्यं पुनर्भवेत् ।
यथा तथा दैवयोगाद्दौर्हृदं जनयेद्धृदि ।।
सु शारीर 3/27
अर्श रोग की उत्पत्ति में दैव अर्थात पूर्वजन्म कृत कर्म भी कारण है।
दैवाच्च, ताभ्यां कोपो हि सन्निापतस्य तान्यतः।
असाध्यन्येवमाख्याताः सर्वे रोगाः कुलोदभवाः।। अ. ह, निदान 7/7
शिशु के कर्ण वेधन करने के लिये सुश्रुत द्वारा उसका दैवकृत छिद्र में वेधन करने का निर्देश है।
प्रलोभ्याभिसान्त्वयन् भिषग्वामहस्तेनाकृष्य कर्णं दैवकृते छिद्र आदित्यकरावभासिते शनैः शनैर्दक्षिणहस्तेनर्जु विध्येत्, प्रतनुकं सूच्या, बहलमारया, पूर्वं दक्षिणं कुमारस्य, वामं कुमार्याः; ततः पिचुवर्तिं प्रवेशयेत् ।।सु. सूत्र 16/3
नवजात शिशु में रोना, स्तनपान, हास, त्रास, आदि का बिना मस्तिष्क के विकसित हुये होना पिछले जन्मों के कारण ही होता है। एक ही माता पिता के दो पुत्रों में रंग, स्वर, आकृति चेहरा, मन, ज्ञान और भाग्य प्रारब्ष्ध भिन्न होना, श्रेष्ठ और नीच कुल में जन्म लेना, दासता अथवा भोगविलास में जिंदगी काटना सब शरीर पर राज्य चिन्ह अथवा दरिद्रता के लक्षणें का होना, पूर्वजन्म के वृतान्त का स्मरण होना ये सब पूर्वजन्म के कर्मों के कारण होता है।
अपना किया हुया कर्म नही छोड़ा जा सकता , उसका विनाश नही हो सकता। पूर्वजन्म में किया हुया भाग्य नामक अनुबन्धिक अर्थात आत्मा के साथ परलोक में भी निश्चित रूप से बंधा हुया है। उसी का फल यह है कि बालक ,माता पिता से भिन्न प्रकृति के उत्पन्न होते है। हमारे यहां किये कर्म से दूसरा जन्म होगा । जिस तरह बीज से फल का अनुमान होता ह उसी तरह और कर्म से पुनर्जन्म से और पुनर्जन्म से किये गये कर्म का अनुमान होता है।
अत एवानुमीयते- यत्- स्वकृतमपरिहार्यमविनाशि पौर्वदेहिकं दैवसञ्ज्ञकमानुबन्धिकं कर्म, तस्यैतत् फलम्यइतश्चान्यद्भविष्यतीतिय फलद्बीजमनुमीयते, फलं च बीजात् ।। चरक सूत्र 11/31
इसके आगे चरक ने स्पष्ट किया है कि पृथ्वी, अप्, तेज, वायु, आकाश और चेतना-इन छः धातुओ के समुदाय के मिलने से गर्भ उत्पन्न होता है। तथा कत्र्ता और करण के मिलने से क्रिया उत्पन्न होती है।कर्ता, आत्मा, करण स्त्रीपुरुष उनके संयोग से गर्भाशयरूप क्षेत्र में जन्म होता है । किये हुये कर्म का फल होता है न किये कर्म का फल नही होता। जिस प्रकार बिना बीज कि अंकुर नही होता वैसे कर्म के अनुसार ही समान फल मिलता है क्यांेकि एक जाति के बीज से दूसरी जाति का फल नही उत्पन्न होता। षड्धातुसमुदयाद्गर्भजन्म, कर्तृकरणसंयोगात् क्रियाय कृतस्य कर्मणः फलं नाकृतस्य, नाङ्कुरोत्पत्तिरबीजात्यकर्मसदृशं फलं, नान्यस्माद्बीजादन्यस्योत्पत्तिःय इति युक्तिः ।। चरक सूत्र 11/32्र
शुक्र्र व शोणित के निर्दुष्ट रहने पर एवं भूतों के संसर्ग से जीव के गर्भ में आने से स्त्री गर्भ धारण कर लेती है। जीव का गर्भाशय में आने का कारण पूर्वजन्म कृत अच्छे कर्मों के योग से होता है।
प्राकृते बीजे इति सहजगुणसम्पन्ने शुक्रशोणितबीजे अदुष्टे सति; एवम्भूतसंसर्गे जीवोपक्रमणे सत्येव गर्भं योषितः विन्दन्ति; जीवोपक्रमणं पूर्वकर्मप्रेरितात्योगाद्भवति।। चरक चिकित्सा 30 पर चक्र्रपाणि
प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़

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