प्रमेह, डायबिटीज

प्रमेह रोग को वर्तमान में प्रचलित रोगों के लक्षणों के आधार इसे डायबिटीज के नाम से जाना जाता है । इसी के वातिक भेद को मधुमेह के नाम से जाना जाता है। कुछ विद्वान डायबिटीज को प्रमेह या मधुमेह मानने पर संकोच करते हैं। व्यवहार में मधुमेह और प्रमेह के लिये निर्दिष्ट योगों के आधार पर ही डायबिटीज की चिकित्सा की जरती है। यह रोग जिस को ग्रसित करने वाला होता है उस व्यक्ति को कोे चलने की जगह खड़े होना, खड़े होने के स्थान पर बैठना, बैठने के जगह लेटना पसन्द होता है। जो व्यक्ति स्नान एवं चंक्रमण से परहेज करता है व अधिक भोजन करता है उसका शरीर प्रमेह के लिये सर्वश्रेष्ठ नीड ़(घोंसला) का काम करता है। यह ऐक ऐसा रोग है जब किसी को परिवार में हो जाती है तो आने वाली पीढ़ी को इस रोग की होने की सम्भावना अधिक हो जाती है।

डायबिटीज के रोगी इन से बचे

डायबिटीज केे रोगी को जहां मधुर वस्तुओ का निषेध है वहीें चरक ने अम्ल और लवण रस के अति सेवन को मधुमेह का कारण बताया है। प्रमेह के रोगी को अधिक जल पीने का निषेध है। अधिक भोेजन करने का निषेध है। मधुमेह के रोगी को स्वेदन का निषेध है और साथ में इस बात का भी निर्देश है कि मधुमेह के रागी को रक्तस्राव होने पर तुरन्त उसके रक्तस्राव को बन्द करना चाहिए।

सुश्रुत संहिता के निर्देश

कुएं खोदने व गाय पालने की दिनचर्या को अपनाने का निर्देश सुश्रुत ने मधुमेह के रोगियों के लिये दिया है। जहां तक कि मधुमेह के रोगियों के लिये भिक्षुओं की तरह रूखा सूखा भोजन करने की प्रवृति को अपनाने का निर्देश है। मुनि के समान इन्द्रियों को वश में कर सौ योजन या उससे अधिक चलना चाहिए। कृश रोगी का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। रोगी को हींग व सैन्धव लवण युक्त यूष का प्रयोग करना चाहिए। सरसों युक्त राग के साथ भोजन करना चाहिए।

डायबिटीज के लिये कुछ महत्वपूर्ण योग

जो नित्य आमला व मूंग की दाल का प्रयोग करता है उसको प्रमेह नही होता। चक्रदत में आमलास्वरस का मधु एवं हरिद्रा चूर्ण के प्रयोग से सभी प्रकार के प्रमेह का नाश बताया है। आमला, हरीतकी, बहेड़ा, देवदारु व नागरमोथा के क्वाथ में मधु मिलाकर पीने से भी सभी प्रकार के प्रमेह का नाश होता है। गुड़ूची स्वरस का मधु के साथ के प्रयोग भी प्रमेह में लाभ पहुचाता है। त्रिफला चूर्ण का मधु के साथ प्रयोग सभी प्रकार के प्रमेह को नष्ट करता है। गुड़ूची सत्व का मधु के साथ प्रयोग प्रमेह के लियो निर्दिष्ट है। शतावरी रस का अच्छी तरह उबले हुये दूध के साथ प्रयोग सभी 20 प्रकार के प्रमेह नष्ट करता है। गाय का तुरन्त दुहा हुया दूध समभाग जल के साथ लेने से प्रमेह रोग में लाभ मिलता है। अग्निमन्थ का क्वाथ मधु के साथ लेने से वसामेह का नाश हो जाता है।

प्रमेह की चिकित्सा में कुछ महत्वपूर्ण औषधियां

एक पानी वाले नारियल में शुद्ध स्फटिका चूर्ण डाल का रात भर रखें तदोपरान्त अगले दिन उसको साफ कर उसका जल प्रमेह के रोगी को नियमित रूप से पिलाने से चिरकालीन मेह नष्ट हो जाता है। फलत्रिकाकद क्वाथ को मधु के साथ पिलाने से सभी तरह के प्रमेह नष्ट हो जाते है। नागर मोथा, आमला , हरड़, बहेड़ा, हल्दी, मूर्वामूल, इन्द्रायण मूल और लोध्र त्वक – इन सबका क्वाथ बनाकर प्रयोग करने प्रमेह रोग और मूत्रकृच्छ्र में लाभ मिलता है। इसी तरह विजयसार, वायविडंग, सर्ज, अर्जुन, कटफल, कदम्ब, लोध्र, के क्वाथ के सेवन से कफज प्रमेह में लाभ होता है।

कुछ अन्य महत्वपूर्ण काष्ठ औषधियां

नागर मोथा, हरड़, कटफल और लोध्र त्वक के क्वाथ के सेवन से उदक में का नाश होता है। पाठा, विडंग, अर्जुन और धन्वन का क्वाथ इक्षुमेह में विशेष रूप से लाभकर है। हल्दी, दारुहल्दी, तगरमूल और मधु मिला कर लेने से सान्द्रमेह नष्ट हो जाता है। सुश्रुत अनुसार उदकमेह के रोगी को पारिजात का क्वाथ, इक्षुमेह के रोगी को वैजयन्ती का क्वाथ, सुरामेह में निम्ब का क्वाथ, सिकतामेह के रोगी को चित्रक का क्वाथ, शनैमेह के रोगी को खदिर का क्वाथ, लवणमेह के रोगी को पाठा, अगर व हरिद्रा का क्वाथ, पिष्टमेह के रोगी को हरिद्रा व दारुहरिद्रा का क्वाथ, सान्द्रमेह के रोगी को सप्तपर्णी का क्वाथ,शुक्रमेही के रोगी को दूर्वा, हठ,करंज व कसेरुक का कषाय, फेनमेही को त्रिफला,व आरग्वध का क्वाथ,देना चाहिए। मंजिष्ठामेही को मजीठ और चंदन का क्वाथ देना चाहिए।

प्रमेह में वर्णित रस औषधियां

महादेव द्वारा भाषित योगेश्वर रस के सेवन से सभी प्रकार के प्रमेह के साथ साथ बहुमूत्र, अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र जैसे रोग भी नष्ट हो जाते है। वसन्त तिलक रस के अनुपान अनुसार सेवन करने से वातिक, पैत्तिक व कफज और सन्निपातिक प्रमेह के नाश के साथ साथ वायु विकार भी नष्ट होते है। वसन्त कुसुमाकर रस के सेवन से बीस प्रकार के प्रमेह, एकादश प्रकार के क्षय व सोम रोग नष्ट होता है। हरिशंकर रस को मधु के साथ प्रयोग करने से सभी प्रकार के प्रमेह नष्ट होते है। गुंजामूल चूर्ण एवं मधु के साथ आनन्दभैरव रस कर प्रयोग करने से सभी प्रकार के प्रमेह रोग नष्ट होते है।
विद्यावंगेश्वर रसे को हरिद्रा चूर्ण व मधु के साथ प्रयोग करने से लालामेह नामक प्रमेह नष्ट होता है। त्रिफलाचूर्ण एवं मधु के साथ प्रमेहसेतु रस कर प्रयोग करने से सभी प्रकार के प्रमेह रोग नष्ट होते है।

मेहकुंजरकेशरी रसे के मधु के साथ एक मास के प्रयोग से 18 प्रकार के प्रमेह नष्ट हो जाते है। प्रमेहचिन्तामणि रस के सेवन से बीस प्रकार के प्रमेह एवे बहुमूत्र रोग, सोम रोग, अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र एवं दारुण मूत्राघात रोग नष्ट होता है। बृहत् सोमनाथ रस का प्रयोग सोम नामक बहुमूत्र रो ग के साथ साथ मधुमेह, हस्तिमेह, इक्षुमेह वलालामेह सहित सभी प्रकार के प्रमेह रोगेां का नाश करता है। विडंगादि लौह के प्रयोग से प्रमेह सहित सभी प्रकार के मूत्र विकार नष्ट होते है।

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डायबिटीज की चिकित्सा में घृत

शाल्मली घृत के प्रयोग से सभी प्रकार के प्रमेह के साथ साथ शुक्रमेह में विशेष रूप से लाभ होता है। इसी तरह धान्वन्तर घृत के सेवन से कुष्ठ गुल्म सहित प्रमेह रोग का नाश होता है। देवभिषग् अश्विनी कुमारें द्वारा निर्मित दाडिमाद्य घृत सिंह की भान्ति प्रमेह रूपी गज का नाश करता है। सुश्रुत ने मधुमेह के लिये तुवरक तेल व शिलाजीत का प्रयोग करने को कहा है। प्रमेह मिहिर तेल सभी प्रकार के प्रमेह के साथ साथ हाथ पांव व शिर में दाह के साथ साथ दुर्बलता में लाभ पंहुचाता है। शांर्गधर संहिता में वर्णित देवदाव्र्यदिरिष्ट व चरक संहिता में वर्णित मध्वासव प्रमेह का नाश करते है। सुश्रुत ने लोहारिष्ट को प्रमेह रोग के लिये महागुण शाली औषध बताया है।

पथ्य व अपथ्य

यव अर्थात जौं का सेवन डायबिटीज के रोगी के लिये एक श्रेष्ठ आहार है। पुराना शालि चावल, साठी चावल ,चना, अरहर, कुलथ, मूंग, सरसों का तेल, कषाय गण के शाक का सेवन पथ्य होता है। दही, पिसा हुया अन्न, सुरा, आसव, जल, दूध, घी, औदक जीवों के मांस का सेवन नही करना चाहिए।https://www.youtube.com/watch?v=6Xt7V4t9k6M&t=34s
प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़
हरिद्वार 249401

1 Comment

  1. वैज्ञानिक धरातल पर प्रस्तुति हेतु हृदय से साधुवाद सर

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