डायबिटीज ईलाज

 डायबिटीज ऐसा शब्द है जिससे शायद ही कोई अपरिचित होगा। भारत में इस के रोगियों की संख्या सतत रूप से बढ़ रही है। इस रोग की विशेषता है कि जो इससे ग्रसित हो जाता है वह उसके साथ अपना स्थायी सम्बन्ध स्थापित कर लेता है अर्थात उसे बीच में कहंी नही छोड़ता। यह रोग जीवन पर्यन्त चलता है इसलिये रोगी का चिकित्सक के साथ एक स्थायी नाता जुड़ जाता है। रोगी एक ही डाक्टर के साथ सारी जिंदगी ईलाज करवाये ऐसा कम ही सम्भव हो पाता है। रोगी जिंदगी भर एक ही पद्धति की औषधि सदा प्रयोग में लाता रहे ऐसा भी कम देखने को मिलता है। रोग के आखिरी दम तक बने रहने के कारण रोगी में एक चिकित्सा पद्धति के साथ साथ दूसरी पद्धति को भी आशावान दृष्टि से प्रयोग करने की प्रवृति बनी रहती है। 

डायबिटीज को मधुमेह के रूप में लिया जाता है।

आयुर्वेद के ग्रन्थो में प्रमेह और मधुमेह के नाम से वर्णित रोगों को सन्दर्भ अनुसार डायबिटीज के नाम से ग्रहण किया जाता है। डायबिटीज के अधिकतर लक्षण मधुमेह रोग के साथ मिलते हैं। सुश्रुत संहिता में मधुमेह और प्रमेह दोनो को अलग अलग रोग के रूप में वर्णित किया है। व्यवहार में मधुमेह की चिकित्सा प्रायः प्रमेह की चिकित्सा में वर्णित योगों के साथ की जाती है। चरक ने प्रमेह को अनुषंगी रोगों में अग्र्य कहा है जो डायबिटीज के सन्दर्भ में सटीक है। कुछ विद्वान भगवान गणेश जी को भी उनके आहार विहार के आधार पर उन्हे भी इस रोग से ग्रसित होने को मानते है।

डायबिटीज होने पर रोगी इनका करते हैं प्रयोग

डायबिटीज होने पर, आयुर्वेद को प्रयोग करने वाले रोगी शुरुआत में सदाबहार के पत्ते, जामुन की गुठली का चूर्ण, तेजपत्र, बेल के पत्ते, गुड़मार बूटी, करेला, मेथी, पनीर डोडी आदि का प्रयोग अवश्य करते है। बाजार में उपलब्ध पेटेन्ट आयुर्वेदिक औषधियांे का प्रयोग भी बहुत से लोग करते हैं। वो इस आशा के साथ उनका प्रयोग करते हैं कि अगर रोग की प्रारम्भिक अवस्था में आयुर्वेदिक औषधियों का प्रयोग किया जाए तो रोग जल्दी ठीक हो जाएगा। बाजार में मधुमेह सम्बन्धित बहुत सारे क्वाथ मिलते हैं लेकिन उनका प्रयोग रोग कीे उग्र स्वरूप की अवस्था में उतना लाभकर नही होता। शास्त्रों में उपलब्ध ज्ञान के आधार पर बहुत से चिकित्सक कई कल्पनाओं को तैयार करते हैं जिनमे तिक्त रस प्रधान द्रव्यों का प्रयोग बहुलता से होता है। कज्जली के साथ प्रयोग करने से उनकी गुणवत्ता में वृद्धि तो अवश्य होती है लेकिन रोग को  पूर्णतयः जीता नही जा सकता।

मेरे अनुभव 

मैने जाना कि डायबिटीज के रोगी को रोग सम्बन्धित बहुत सारी जानकारियां रोग के लम्बे समय चलते रहने के कारण उसको स्वतः ही हो जाती है। समय के साथ साथ वह अपने लक्षणों को पहचानना शुरु कर देता है। कब उसकी शर्करा का स्तर बढ़ रहा है और कब कम हो रहा है वह उसके लक्षणों को स्वयं पहचानना शुरु कर देता है। प्रमेहगजकेसरी रस का स्वर्णमाक्षिक भस्म के साथ प्रयोग करने पर कुछ रोगियों में बहुत अच्छा लाभ मिला जबकि कुछमें इसका लाभ बहुत अल्पमात्रा में मिला। बसंतकुसुमाकर रस जैसी औषधियां डायबिटीज में उत्पन्न दुर्बलता में लाभ करती है। प्रमेहगजकेसरी और बसंतकुसुमाकर रस स्वयं द्वारा निर्मित कियेजाने पर लाभ मिला। चंद्रप्रभावटी डायबिटीज में तभी प्रभावी होती हैं अगर उसकी मात्रा तीन ग्राम से अधिक हो।

डायबिटीज में शिलाजीत

इसी तरह शिलाजीत का प्रयोग भी वर्तमान में प्रचलित मात्रा से अधिक मात्रा में प्रयोग करने पर ही लाभकारी होता है। शिलाजीत रक्तशर्करा की मात्रा को कम नही करती अपितु डायबिटीज में होने वाली दुर्बलता में लाभ पहुचाती है। प्रमेह रोग की उत्पत्ति का एक कारण शरीर में मल के संचय होना भी है। अतः शरीर शुद्धि भी इस की चिकित्सा का प्रथम सोपान है। मामेज्जक घन वटी व पलाशमूल अर्क भी कुछ सीमा तक प्रभावी होता है। स्वर्णबंग,कणाकज्जली, शिवागुटिका, चैंसठ प्रहरी पीपल, वंगभस्म,नाग भस्म का विधिपूर्वक प्रयोग प्रंशसनीय है।

आमला व कच्ची हल्दी रोज लेने से डायबिटीज शुरु में बिना किसी अन्य औषध के सहयोग से नियंत्रित हो जाती है। शुरु में ही त्रिफला का सेवन करने वालों के पास भी उपद्रव देरी से पैदा होते हंै। मूंग की दाल व जौ से बनी वस्तुएं डायबिटीज के रोगियों के लिये श्रेष्ठ आहार है। शरीर को चुस्त रखने के लिये रसायन औषधियों का प्रयोग भी अवश्य करना चाहिए।

डायबिटीज की चिकित्सा के दावों का सच

आयुर्वेद से लोगों की अपेक्षायें बहुत अधिक होती हैं इसलिये वे आशावान होकर आयुर्वेदिक औषधियों के प्रयोग से ठीक होने की उम्मीद रखते है। इसी भावना को पहचान कर दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों पर डायबिटीज के चमत्कारिक इलाज के लिये इस प्रकार का ढिंढोरा पीटा जाता रहा। इस प्रकार के विज्ञापन प्रसारित होते रहे कि अमुक औषधि लेने पर डायबिटीज डायबिटीज रोग से मुक्ति मिल जाएगी। इस प्रकार के भी विज्ञापन प्रचलित प्रसारित होते रहे हैं जिसकी प्रमाणिकता सरकार द्वारा सत्यापित बतायी जाती रही है।

डायबिटीज पर कोई संगोष्ठी

इसके अतिरिक्त जब भी कहंी आयुर्वेद में डायबिटीज पर कोई संगोष्ठी होती है तो अगले दिन किसी  विद्वान  के माध्यम से यह समाचार अवश्य प्रकाशित होता है कि आयुर्वेद में मधुमेह का सफल ईलाज है। इस तरह के झूठे दावों से आयुर्वेद की साख में वृद्धि नही होती अपितु उसे और धक्का पहॅंुचता है। चरक संहिता में मधुमेह को असाध्य रोग कहा है। बहुत से लोग इस बात को जानते है कि डायबिटीज न ठीक होने वाला रोग है अतः बहुत सारी फार्मेसी अपने नये उत्पादन को नयी रिसर्च का नाम दे देते हैं और उसके कारण बहुत से लोग झांसे में आ जाते हैं।

डायबिटीज से बचने का सूत्र

डायबिटीज के रोगी का बिना शारीरिक श्रम के कोई समाधान नही है। आयुर्वेद का सबसे सही इलाज चरक संहिता के इस सूत्र में हैं।

भवन्ति चात्र- गृध्नुमभ्यवहार्येषु स्नानचंक्रमणद्विषम्।

प्रमेहः क्षिप्रमभ्येति नीड़द्रुमवाण्डजः।। च.नि.4/50        

अर्थात जो व्यक्ति अधिक खाता है और स्नान व चंक्रमण से परहेज करता है वह प्रमेह रोग के लिये सबसे उपयुक्त नीड़ है। प्रमेह रोग उत्पन्न ही न हो उसके लिये आयुर्वेद के स्तर पर बहुत उपयोगी दिशानिर्देश है लेकिन रोग होने पर उसका समूल नाश किसी भी पद्धति में सम्भव नही है। शारीरिक श्रम वाली और कम भोजन करने वाली जीवन शैली अपनाकर इस रोग की उग्रता को कम अवश्य किया जा सकता है पर पूर्ण रूप से मुक्ति सम्भव नही है।  आजकल सोशल मीडिया में भी डायबिटीज को समूल नाश करने के दावे प्रचलित हो रहे है जिनमें सबके सब परीक्षित नही होते अतः उनके प्रयोग में सावधानी आवश्यक है।

प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़

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