चिकित्सक की सार्थकता


काश्यप संहिता अनुसार शरीर तथा आयु की अव्याहतरूप में वद्धि तथा विकारों की शान्ति के लिये चिकित्सा कही गयी है। भावप्रकाश में चिकित्सा का कार्य कष्ट से मुक्ति है न कि मृत्यु पर विजय का कथन मिलता है। पंचमहाभूत व शरीरी का समवाय सम्बन्ध से संजात संयोग पुरुष कहलाता है और यही कर्म पुरुष चिकित्सा में उपयोगी है। लोक व्यवहार में चिकित्सक से ऐसी अपेक्षा रहती है कि जब भी कोई व्यक्ति रोगी हो तो उसे चिकित्सक के द्वारा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त हो। हमारे शास्त्रों में चिकित्सा के महत्व को लगभग इसी रूप में दर्शाया गया है।

वाग्भट ने कहा है कि चिकित्सा शास्त्र अकाल में फैलाये हुए सुदृढ़ मृत्युपाशों को काट देने वाला एक शस्त्र है।रोगों के भय से डरे लोगों के लिये यह सूत्र रहित रक्षा सूत्र है। इसके प्रयोजन को स्पष्ट करते हुये सुश्रुत ने कहा है कि स्वस्थ व्यक्ति के जो लक्षण बताएं हैं उनका रक्षण करना ही चिकित्सा का प्रयोजन है।

चिकित्सक की सार्थकता

बहुत बार जब चिकित्सा करने से कोई लाभ नही मिलता तो चिकित्सा की गुणवत्ता पर संदेह उत्पन्न न हो इसलिये अष्टांगहृदयकार ने दृष्टान्त देकर स्पष्ट किया कि यव के सेवन से मल की वृद्धि का होना व मूत्र की मात्रा में कमी होना, दूध के प्रयोग से धातुओ की वृद्धि होना, माष और आत्मगुप्ता के प्रयोग से शुक्र की वृद्धि होना, गवेध्ुाक के प्रयोग से कृशता होना, मन्त्र तन्त्र के प्रयोग से विष का शान्त होना- ये सब चिकित्सा की सफलता के प्रमाण हैं। लेकिन चिकित्सा करना और चिकित्सा न करना, ये दोनो समान नही कही जा सकती क्योंकि सोलह पाद वाली चिकित्सा से कभी स्वास्थ्य लाभ होता है और कभी नही होता। हां चिकित्सा न सफल होने के विभिन्न कारण है ,यथा

चिकित्सा की भी है सीमित मर्यादा

यह सत्य है कि चिकित्सा वस्तुतः रोगरूपी कीचड़ में फंसे मनुष्य के लिये हाथ के सहारे के समान है लेकिन मारक असाध्य रोगों में औषध कर्म सफल नही होता। जहां रोग की असाध्यता की अवस्था पहले से ही निश्चित हो वहां सोलह पादों भी चिकित्सा करने में असमर्थ होते हैं।

चिकित्सा करने वाला अयोग्य हो

शास्त्रों मे कहा है कि आयुर्वेद वह अमृत है जिसकी प्राप्ति के लिये प्रयत्न नही करना पड़ता लेकिन अयोग्य पात्र में जाने से यह हलाहल विष के समान मारक हो जाता है। चिकित्सा की निष्फलता में यह भी एक कारण है कि व्यवहार में चिकित्साएक कुपात्र द्वारा की जा रही है।

चिकित्सक शास्त्र के अर्थ को समझने में अज्ञ हो

शास्त्रों में चिकित्सा गूढ़ अर्थ के रूप में सूत्रों में कही गयी है। कुशल चिकित्सक द्वारा वह अनेक अर्थों के रूप में अंकुरित होता है। तर्क और ग्रन्थ के असली ज्ञान से रहित स्वल्प बुद्धि वाला अल्पज्ञ मनुष्य शास्त्र के सही अर्थ को करने में असमर्थ होता है। उससे सफल चिकित्सा सम्भव नही होती।

असाध्य रोग को साध्य समझ कर चिकित्सा की अपेक्षा रखी जाती हो

जो रोग चिकित्सा साध्य हैं उन्ही में चिकित्सा करने से लाभ होता है। समय पर चिकित्सा न करने से साध्य रोग भी असाध्य हो जाते है, फिर रोगी की मृत्य हो जाती है। जो चतुष्पाद चिकित्सा के रहते हुये मर जाते है वे असाध्य रोग होते है। क्योंकि साध्य रोग ही उचित चिकित्सा करने पर शान्त होते हैं, वे असाध्य रोग होते हैं क्योंकि साध्य रोगोंको  ही उचित चिकित्सा करने पर दूर  किया जा सकता है।

दैव की विपिरीतता होना

बहुत बार बुद्धिमान चिकित्सक के द्वारा भी साध्य रोगी के रोग की चिकित्सा में लाभ नही होता तो उसमें दैव की विपरीतता कारण होती है फिर भी चिकित्सा को निष्फल नही कहा जाता।

साध्य रोग इन को हो तो भी असाध्य हो जाते है।

सुश्रुत अनुसार साध्य रोग भी अगर श्रोत्रिय, नृप, स्त्री, बालक, वृद्ध, भीरू, राजसेवक, दुर्बल, दरिद्र, कृपण, क्रोधी, अनात्मवान,  अनाथ आदि को हो जाए तो भी दुश्चिकित्सय  रोगियों की सेवाय हो जाते हैं।

चिकित्सा करने वाला भिषक्पाश हो

वाग्भट अनुसार जिन चिकित्सों ने आयुर्वेदीय ग्रन्थों का स्वयं अध्ययन किया है अर्थात गुरुमुख से पढ़कर उनके सद्भावों को नही समझा है, प्रयोगात्मक ज्ञान नही है, उन चिकित्सको को शास्त्र में भिषक्पाश कहा है। वे यमराज के पाशधारी साक्षात यमदूत ही होते है। अगर इस प्रकार का चिकित्सक चिकित्सा में प्रवृत होता है तो चिकित्सा सफल नही होती।

अरिष्ट लक्षण उत्पन्न होने पर चिकित्सा की जाए

जो गतायु हो अर्थात जिसकी आयु शेष न हो, अरिष्ट लक्षण उत्पन्न हो गये हो यथा जो मेघशून्य आकाश में बिजलियों से युक्त घने काले बादलों को देखे और जो आकाश में वायु को मूर्तिमान के समान देखे, जिसके स्वाभाविक शरीर में व स्वाभाव में परिवर्तन दिखायी पड़े, जिसको शीतल वस्तु उष्ण की भान्ति व उष्ण वस्तु शाीतल की भान्ति प्रतीत हो जिसको मारने पर चोट न प्रतीत होती हो, जिसको सुगन्ध भी दुर्गन्ध प्रतीत  होती हो , जिसको सूर्य रात्रि में चमकता हुया प्रतीत होता हो व दिन में सूर्य को चन्द्रमां के समान शीतल प्रतीत होता हो  उनकी चिकित्सा करने का कोई लाभ नही होता। गतायु व्यक्तियों के पास अनेक प्रकार के भूत, प्रेत पिशाच और राक्षस प्राणियों के पास पंहुचकर औषधियों के प्रभाव को नष्ट कर देते है।

फिर भी चिकित्सा अवश्य करें

 हमारे शास्त्र कहते हैं कि कोई देश ऐसा नही है जहां मनुष्यों का निवास न हो और उन्हे कोई रोग न होता हो अतएव चिकित्सक के जीवन निर्वाह की व्यवस्था सब जगह सुलभ है। चिकित्सा से कुछ धर्म , कुछ मित्र , कुछ पैसा, कुछ यश मिलता है चिकित्सा कभी निष्फल नहीं होती , अगर ये सब न भी मिले तो चिकित्सक का अभ्यास तो हो ही जाता है।समस्त आतुरों को अपने पुत्रों की भान्ति मानते हुये अपने मानव धर्म की पालन करने की इच्छा रखने वाले चिकित्सकों को उन्हे रोग मुक्त करने का पूरा प्रयास करना चाहिए।

प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़

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