कृपू सामर्थ्य सामर्थ्यार्थक कृपू धातु से यक् +अन्+ आप् प्रत्यय् करने से कल्पना शब्द निष्पन्न होता है। इसका अर्थ है – -शास्त्र के अर्थ को स्पष्ट करने में समर्थ विधि। अभीष्ट अर्थ करने के लिये तन्त्रकर्ता एक विशिष्ट शैली का प्रयोग करता है। इस हेतु तऩ्त्रकर्ता आवश्यक विधियों का सविभाग भी वर्णन करता है और प्रकरणानुसार शैली में आवश्यकतानुसार परिवर्तित भी करता है। कही आप्तोपदेश के आधार पर, कभी अल्प अर्थ के आधार पर पूरे विषय को समझने का प्रयास करता है।

   किस ग्रन्थ में है मूल विवेचन?

    -आयुर्वेदिक ग्रंथों में कल्पना का वर्णन नहीं है।

    -अष्टांगहृदय के टीकाकार अरुणदत्त ने अपने भाष्य सर्वांगसुंदरा में सात प्रकार की कल्पनाओं का वर्णन किया है।

    -इसके अतिरिक्त कल्पना का एक विस्तृत विवरण शंकर शर्मा द्वारा लिखित एक पाठ तन्त्रयुक्ति  में उपलब्ध है

    अरुणदत्त और शंकर शर्मा दोनों ने कल्पना के सात प्रकारों का वर्णन किया है।

     इन दोनों विद्वानों के विचारों में कल्पना की संख्या के बारे में समानता है। इन कल्पनाओं का नामकरण अलग,अलग है।

      आचार्य अरुणदत्त द्वारा वर्णित सात कल्पनाओं का उल्लेख इस प्रकार है।

     प्रधानेन कल्पना

    समानधर्मी द्रव्यों के अथवा मुख्य द्रव्यों के विकारों के रूप में वर्णन करना। यथा    चरक द्वारा षडविरेचनशताश्रितीयाध्याय में जीवनीय, लेखनीय आदि वर्गों का उल्लेख।   मधुर अम्ल लवण कटु तिक्त कषाय रस प्रधान द्रव्यों के पृथक् पृथक् स्कन्धों का उल्लेख।            भद्रदारुकुष्ठादि द्रव्यों को  वातशमन, चन्दनोशीरमंजिष्ठादि द्रव्यों को  पित्तसंशमन, कालेयकागुरु तिलपर्णी हरिद्रादि द्रव्य को कफशमन के रूप में वर्णित करना।    क्षीर वर्ग के अन्तर्गत क्षीर, दघि, तक्र, घृत, किलाट, पीयूष व कूर्चिका का उल्लेख।

प्रधानस्य कल्पना

समान गुण.कर्म को करने वाले द्रव्यों में भी गौण -मुख्यन्याय के बल से एक प्रधान द्रव्य का नामोल्लेख करना। यथा

    सर्पिस्तैलं वसा मज्जा सर्वस्नेहो त्तमा मताः।     एषु चैवो त्तमं सर्पिः संस्कारस्यानुवर्तनात्।।

    जीवनीय द्रव्यों में . क्षीर ,सन्धानीय द्रव्यों में  मधु,  कुष्ठघ्न.  द्रव्यों में खदिर, प्रमेहघ्न द्रव्यों में हरिद्रा, रक्तजार्श हर द्रव्यों में कुटज।

    सर्वरोगों में अग्रज ज्वर , रोगसमूह बहुलता वाले रोगों में राजयक्ष्मा, अनुषंगी रोगों में ,प्रमेह रोग, दीर्घ काल तक चलने वाला रोगों में कुष्ठ ।

गुण कल्पना

कार्यसिद्धि सुनिश्चित करने के लिये जिन धर्मों से युक्त होने पर होती है  उसे आधार मानकर जो कल्पना की जाती है उसे गुण  कल्पना कहा जाता है।

    भिषग्द्रव्याण्युपस्थाता रोगी पाद चतुष्टयम्।

    गुणवत् कारणं ज्ञेयं विकारव्युपशान्तये।। च सू 9/3

इसमें वर्णित प्रत्येक के चार चार गुण आयुर्वेदोक्त 41 गुणों  अन्तर्गत वर्णित नही है ।

 इसी तरह परीक्षक के जो नौ गुण बताये हैं वे गुण न होते हुये भी गुण  कहलाते है।। 

    इनकी कार्मुकता इन के गुणों पर ही निर्भर करती है।

लेश कल्पना

शास्त्रों में जिस विषय का स्पष्ट उल्लेख न हुया हो किन्तु उसमें उपलब्ध विवरण के आधार पर उसका अर्थ ज्ञान करना लेश कल्पना कहलाता है। यथा अष्टांगहृदय में काल मृत्यु का स्वतन्त्र रूप से वर्णन नही है लेकिन उसमें उपलब्ध वर्णन के आधर  पर उसका ज्ञान किया जाता है। नियत आयु, अनियत आयु, अरिष्ट, रसायन आदि के उल्लेख से इसका ज्ञान किया जाता है।

विद्या कल्पना

    एकं शास्त्रमधीयानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम्।

      तस्माद् बहुश्रुतः शास्त्रं विज्ञानीयच्चिकित्सकः।। सु सू 4/7

    केवल एक शास्त्र का अध्ययन शास्त्र के गूढ़ार्थ का विनिश्चायक नही हो सकता है , इसलिये अन्य शास्त्रों के विषयों को अपने शास्त्र में यथास्थान उल्लिखित करना तन्त्रकर्ता के लिये अपेक्षित होता है। यथा  चरक ने  गो, ब्राह्मण एवं गुरुओं की पूजा करने के साथ साथ दान देने से व्रत  एवं नियम का पालन करने को आगन्तुज उन्माद की चिकित्सा बतायी है। यह धर्म शास्त्र का विषय है। तिथि नक्षत्र का उल्लेख ज्योतिष शास्त्र का विषय है।

भक्ष्य कल्पना

    एत त्तदमृतं साक्षात्।

    जे विषय पेय, लेह्य,भोज्य व भक्ष्य .इन चार प्रकार के आहार का नही होता है, को भक्ष्यादि स्वरूप में वर्णित करना भक्ष्य कल्पना कहलाता है। यथ आयुर्वेद के उपदेशों को अमृत कहना भक्ष्य कल्पना का उदाहरण है। इसी तरह गीता को अमृत कहा गया है। इस प्रकार का प्रयोग ग्रन्थों का अति वैशिष्ट्य दर्शाने के लिये किया जाता है।

आज्ञा कल्पना

जिस अनुष्ठान, उपदेश अथवा कर्म को सहेतुक प्रतिपादित नही किया जा सके और केवल आप्तोपदेश मानकर तद्नुसार आचरण किया जाए तो वहां  आज्ञाकल्पना होती है। यथा. सत्य के मार्ग पर चलो, किसी के धन पर न ललचाओ, तिनको को मत तोड़ो व भमि को मत कुरेदो।

    अनूप कुमार गक्खड़

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