आयुर्वेद

आयुर्वेद का अध्ययन संहिता परक है। अतः बिना संहिताओं के ज्ञान के आयुर्वेद का अध्ययन सम्भव नही है। सभी प्रमुख संहिताएं संस्कृत में है। बिना मूल ग्रन्थों के अध्ययन के विषयों को ठीक से समझा नही जा सकता। अतः आयुर्वेद के विषयों में दक्ष होने के लिये संस्कृत का ज्ञान होना आवश्यक है। न केवल पढ़ने, अपितु लिखने व उच्चारण करने का सही ज्ञान आयुर्वेद के विद्यार्थियों को होना आवश्यक है। महाविद्यालयों में ही  विद्यार्थी संहिताओं के संहिताओं के स्वरूप से परिचित होते है।

अध्ययन व अध्यापन परम्परा में आयुर्वेद की मौलिकता को न केवल बनाए रखने उपलब्ध ज्ञान को पोषितव संवर्धन करना  अति आवश्यक है। ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया अधीत, बोध, आचरण व प्रचार से सम्पन्न होती है। इसमें दक्षता व सम्पूर्णता बनी रहे इस के लिये आवश्यक है कि विद्यार्थी स्वाध्याय द्वारा अपितु तदविद सम्भाषा परिषद के माध्यम से अपने ज्ञान को प्रखर करे। विद्यार्थी आयुर्वेद के मूल ग्रन्थों को समझ सके इसलिये इस विद्या को पढ़कर परीक्षा में लिखकर कर्तव्य की इतिश्री नही होती है अपितु प्रश्न उत्तर केरूप में उच्चारण करना, आपस में उस पर विचार विमर्श करना, फिर परस्पर विचार विमर्श कर उसका उत्तर खोजना, ये सब बुद्धि की प्रखरता के साधन है।

आयुर्वेद
healthyminute.in

सिद्धान्त रहित शास्त्र और चिकित्सा दोनो ही प्रयोजन की सिद्धि में सफल नही होते। आयुर्वेद का शाश्त्वत्व उसकी सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि के कारण ही है। आयुर्वेद चिकित्सा की सफलता प्रतिपद सिद्धान्त समन्वित होने से ही है। सृष्टि के आदि सिद्धान्त ही आयुर्वेद के सिद्धान्त है। अष्टांग आयुर्वेद में यद्यपि मौलिक सिद्धान्त अलग से कोई विषय नही हैफिर भी इसके सिद्धान्त सम्पूर्ण अष्टांग में व्याप्त नही है।  इस विभाग की व्यापकता इस स्तर की है कोई भी विभाग इसके प्रभाव से अछूता नही है। सृष्टि के आदि सिद्धान्त ही आयुर्वैदके सिद्धान्त है। बिना समुचित शास्त्र ज्ञान के इन सिद्धान्तो का सही ज्ञान सम्भव नही है। अध्ययन, अध्यापन व तद्विद सम्भाषा के द्वारा ही शास्त्र ज्ञान में दृ़़ढ़ता आती है। संहिता ज्ञान में अच्छी पकड़ होने पर ही चिकित्सक  समाज में आयुर्वेद के सवरूप को सही ढंग से बतला सकता है।

विदेशियों ने आयुर्वेद को जितनी हानि पंहुचायी उससे भी अधिक हानि करने वाला आत्मघाती कदम वर्तमान में आर्ष ग्रन्थों के अध्ययन की परम्परा को बाधित करने में है। शत्रुओं की भावना निर्मल नही होती पर आयुर्वेद  के ही लोग आयुर्वेद का नाश करने पर आजाए तो यह कष्ट का विषय है। कहा जाता है कि जिस ज्ञान को दूसरो को बताया जाता है , यह आवश्यक नही कि वह उसे याद रख सके, जिसमें उसको कुछ करके दिखाया जाता है वह उसको कुछ समझ सकता है और जिसमें सीखने वाले से ही कुछ करवाया जाता है वह उसको कभी भूलता नही। जी हां संहिताओ का अध्ययन बिना विधार्थियों को साथ लिये नही होता । उनकी भागीदारी उसमें सुनिश्चित होती है। मात्र अध्यापक के प्रवचन से ज्ञान प्राप्ति का यह  दायित्व पूरा नही होता।

जिस तरह विकास के नाम तीर्थ यात्रा को पर्यटन के रूप में परिवर्तन करने पर वांछित लाभ प्राप्त न होकर मूल विषय से भटक जाते हैं उसी तरह आयुर्वेद ज्ञान की मौलिक  परम्परा की विधा के साथ साथ छेड़ छाड़ न केवल आयुर्वेद के विकास को बाधित करेगीविपरीत फल देगी। जी हां भवन बनाते समय नींव पर अगर एक ईंट भी टेढी लग जाए तो पूरा भवन टेढा हो जाता है। और यहां पर तो पाठयक्रम जैस्ेा महत्वपूर्ण विषय का स्वरूप बदल दिये जाने की कगार पर है। वर्तमान में आयुर्वेद के वृक्ष की मूल काटकर शाखाओं से पोषित करने का प्रयास वर्तमान में जहां इसके विकास को बाधित करेगा अपितु चिकित्सा के क्षेत्र को रेगिस्तान में परिवर्तित कर देगा। इस प्रकार की प्रक्रिया को व्यवाहरिक आयाम देने से आयुर्वेद भविष्य में इतिहास के एक अध्याय के रूप में पढ़ा जाएगा। धुंधला चश्मा पहन कर अपने रास्ते बनाने वाले पथिक पथ भ्रमित ही रहते हैं। तथाकथित विकास के नाम पर मूल ग्रन्थोंसे सम्बन्धित विषयों का स्वरूप संकुचित करने के प्रयास आयुर्वेद के स्वरूपके साथ खिलवाड़ है।

आयुर्वेद
healthyminute.in

इस तरहके ज्ञान से पोषित विद्यार्थी चिकित्सक बनने के बाद समाज को क्या दे पाएंगे। जिसके अपने तन पर वस्त्र नही होगे वह दूसरों को हवा पानी से कैसे बचाएगा। आयुर्वेद का ज्ञान संहिताओं में ही निहित है। संहिताएं ही इसकी आत्मा है बिना इसके आयुर्वेद की संास चलती रहे ऐसी अपेक्षा रखना निराधार है। सम्पूर्ण आयुर्वेद मात्र एक इतिहास बनकर न रह जाए इसलिये संहिता परक ज्ञान को मुख्य धारा में लाना आवश्यक है। नही तो हमे आयुर्वेद के तवे पर  छदमचर वैद्य ही रोटी सेकते नजर आएगे। अभी लोग आयुर्वेद को सोना बाथ हर्बल बाथ के रूप में जानते हैं,वो जानते है कि गुप्त रोगंो की चिकित्सा बस अडडों पास के होटलों में ही होती है, खानदानी चिकित्सको के पास ही आयुर्वेद का इलाज है। अगर इस प्रकार का व्यतिक्रम सफल हो गया तो  भविष्य में चिकित्सक भी आयुर्वेद को वही समझेगें जो आजकल के सामान्य लोग समझते है।

प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *