पदार्थ विज्ञान

                                

पदार्थ विज्ञान को हम क्यों पढ़े ? यह प्रश्न विधार्थियों को विचित्र लगता होगा। हमारा स्वभाव है कि हम उस पर ही विश्वास करते हैं जिसको हम स्वयं अपनी आंखों से देख लेतें हैं। लेकिन उससे भी हटकर एक अलग दुनिया है। भूकम्प आना, आंधी तूफान का आना, सुनामी आना, महामारी फैलना आदि ऐसे विषय हैं जिनकी पुष्टि केवल प्रत्यक्ष वस्तुओं के आधार पर नही हो सकती। उनके लिये हमे कुछ परोक्ष विषयों पर आश्रित होना पड़ता है।

पदार्थ विज्ञान में ही है इसका स्पष्टीकरण

प्राणियों का जन्म कैसे होता हैं? यह बात विज्ञान अच्छे से समझा सकता है। लेकिन वो जन्म क्यों लेता है इसका उत्तर विज्ञान के पास नही है। एक किसी मनुष्य के रूप में लेता है और दूसरा एक पशु के रूप में । एक बालक गरीब के घर में पैदा होता है और एक किसी अमीर घर में। एक जीवित रहने के लिये मूलभूत आवश्यकताओं को पाने के प्रयास में पूरा जीवन संघर्ष करता है और दूसरे के पास सुख सुविधाओं की कमी नही होती। इस प्रकार की प्रतीत होने वाली विसंगतियों का उत्तर  दर्शन शास्त्र में है।

 
पदार्थ विज्ञान के पास ही है इन शंकाओं का समाधान

एक व्यक्ति को जन्म के समय से ही कोई न कोई असाध्य रोग होता है और कोई पूरा जीवन स्वस्थ रहता है। हां हम देखते हैं कि कोई पैदा ही डायबिटीज के साथ होता है और कुछ लोग पूरे जीवन ही इससे मुक्त रहते है। इस तरह की शंकाओं का समाधान दर्शन शास्त्र के पास है। जिसकी जानकारी पदार्थ विज्ञान के माध्यम से प्राप्त होती है।

पदार्थ विज्ञान में ही है दर्शन का समावेश

एक ही रोग से ग्रसित दो व्यक्तियों में से एक का रोग सुगमता से ठीक होजाता है और दूसरे का नहीं। इसके लिये दर्शन शास्त्र का अध्ययन आवश्यक है जिसका समावेश पदार्थ विज्ञान में है।

         पदार्थ विज्ञान में ही है इसका उत्तर

  एक व्यक्ति कुरूप पैदा होता है और दूसरा सुन्दर होता है। यह व्यक्ति के अपने हाथ में नही होता। ऐसा क्यों इसका उत्तर दर्शन के पास है। एक बालक विकलंाग पैदा होता है और दूसरा संपूर्ण और सुदृढ़ अंगों के साथ। ऐसा क्यों।

इस जानकारी के लिये आवश्यक है पदार्थ विज्ञान का पढ़ना

एक बालक की जिंदगी अल्प होती है दूसरा दीर्घायु का उपभोग करता है। इन सब का वर्णन कर्म सिद्धान्त के रूप में दर्शनों में मिलता है जिसको के अन्तगर्त समझने के लिये हमे पदार्थ विज्ञान पढ़ना ही होगा।

असमय मृत्यु का कारण

एक व्यक्ति स्वस्थवृत और सदवृत के नियमों का पालन करते हुये किसी दुर्घटना के कारण अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है जबकि कुछ दुर्घटना के बाद भी बचकर वापस आ जाते है।

 स्वभावोपरम वाद का सिद्धान्त 

 जब उत्पन्न हुयी वस्तु का नाश स्वभाव से होना ही है तब रोगों को नष्ट करने के लिये चिकित्सा की आवश्यकता क्यों। इसका स्पष्टीकरण पदार्थ विज्ञान में ही है।

प्रमाण है चिकित्सा का आधार

हम अपनी बात को सिद्ध करना चाहते हैं उसके प्रमाणीकरण की जानकारी का आधार पदार्थ विज्ञान में ही निहित है।  प्रमाणों की सुस्पष्ट उपयोगिता केवल प्रत्यक्ष के द्वारा नही अपितु आप्तोपदेश और अनुमान सहित अन्य प्रमाणों के द्वारा परिलक्षित होती है। इन प्रमाणों के प्रयोग के बिना चिकित्सा संभव ही नही है।

पदार्थ विज्ञान और सृष्टि का अस्तित्व

सृष्टि अपने अस्तित्व में कैसे हुयी, पिछले जन्म के पापकर्म इस जन्म में भी रोग पैदा कर सकते हैं? इन रोगों की शान्ति औषधि प्रयोग के साथ साथ देवाचर्ना, जप उपवास, मंगल कर्म आदि से भी होती है। इसका ज्ञान पदार्थ विज्ञान में भी निहित है।

पदार्थ विज्ञान के सिद्धान्तो के बिना चिकित्सा सम्भव नही

क्या सामान्य विशेष के सिद्धान्त के बिना चिकित्सा फलित हो सकती है? कदापि नही । रोग उत्पन्न होने पर उसमे बढ़े हुये गुणों को शान्त करने के लिये उसके विपरीत गुणों की आवश्यकता होती है। गुणों का प्रयोग करने के लिये किसी द्रव्य की आवश्कता होती है। गुण द्रव्य पर ही आश्रित होते हैं। पदार्थ विज्ञान से इस प्रकार के ज्ञान की प्राप्ति होती है।

पदार्थ विज्ञान मे निहित सिद्धान्त है चिकित्सा में उपयोगी

किसी भी कार्य को उत्पन्न होने से पहले उसकी सत्ता का सूक्ष्म रूप मे अर्थात ंबीज रूप में कारण में विद्यमान होना एक आवश्यकता है या नही इसके लिये पदार्थविज्ञान पढ़ना आवश्यक है।

इसलिये पढ़ें पदार्थ विज्ञान

चिकित्सा जगत के क्रियात्मक पक्ष की नींव पदार्थ विज्ञान में  ही  निहित है। चिकित्सा सम्बन्धित बहुत सारे अनसुलझे प्रश्नो का उत्तर पदार्थ विज्ञान में है। आवश्यकता है उसे यथाविधि आत्मसात करने की।

प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़

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