वर्तमान में आयुर्वेद के चिकित्सकों में व आयुर्वेदिक कालेजों में अध्ययनरत विधार्थियों में से कोई भी व्यक्ति ऐसा नही होगा जिसने कभी भी अपने स्कूल में “मेरे जीवन का उद्देश्य” निबंध लिखते समय आयुर्वेद चिकित्सक बनने के इच्छा व्यक्त की होगी। करें भी क्यों जब उसके सपनों में व्यवसाय के रूप में डाक्टर, इंजिनीयर, प्रोफेसर, वकील, बिजनेसमेन, आदि बनने की इच्छा निहित होती है। एमबीबीएस में प्रवेश से केवल एक या दो नंबरों से पिछड़े हुये विधार्थियों को जब परिस्थितिवश आयुर्वेद में प्रवेश लेना पडता है तो वे सुगमता से इसको आत्मसात नही कर पाते। उनकी हालत ऐसी होती है जैसे किसी लकड़ी के एक चाकौर टुकड़े को गोल छिद्र में स्थिर करने का प्रयास किया जा रहा हो। उसके कारण वे हमेशा डांवाडोल रहते हैं और उसे अपने आप में स्थिरता लाने के लिये किसी न किसी का सहारा लेना पड़ता है। अन्य कोई विकल्प उपलब्ध न होने से और अपनी इच्छा के विपरीत इसमें प्रवेश लेने की बाध्यता से वह अपने पेशे से तब तक न्याय नही कर पाता जब तकवह उसको दिल से अपना न ले।
बीएएमएस पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों का एक वर्ग ऐसा भी होता है जो बड़ी मुश्किल से बारहवीं कक्षा में 50 प्रतिशत अंक लाकर महंगे शुल्क वाली प्रवेश प्रक्रिया का आश्रय लेकर किसी भी तरह पेशे में घुस जाते है। इस तरह धक्के से इस पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने वाले विधार्थियों में बहुत से विधार्थी अधकचरे ज्ञान के साथ रेंग रेंग कर चिकित्सक बनते है। वो जिस प्रकार का क्रियाकलाप समाज में प्रदर्शित करते हैं उसे पूरे आयुर्वेद के चिकित्सक समुदाय के प्रतिबिम्ब के रूप में ग्रहण किया जाता है।
बीएएमएस करके अपनी रोटी रोजी की आवश्यकता पूरी करने के लिये विभिन्न संभावनाएं विद्यमान होती है। कुछ चिकित्सक सरकारी नौकरी में चले जाते हैं, कुछ आयुर्वेदिक प्रैक्टिस करते हैं, और कुछ मिश्रित प्रैक्टिस करते हैं। और कुछ इससे हट कर ऐसे भी है जिन्होने इसी विद्या के ज्ञान के बल पर विदेशों में आयुर्वेद का परचम फहराते है। कुछ ऐसे महानुभाव भी हैं जो इस व्यवसाय को त्याग कर किसी देसरे व्यवसाय में लीन हो जाते है। आयुर्वेद प्रैक्टिस करने वालो की संख्या भी वहुत ही कम होती है।
आयुर्वेद अपनाने का सकारात्मक पहलू
जीवन में प्रसन्न रहने के लिये यह आवश्यक है कि जो पसन्द हो उसको हासिल करले अगर नही तो जो मिला है उसको पसन्द करना सीख लें। आयुर्वेद को व्यवसाय के रूप में अपनाने का सकारात्मक पहलू यह है कि हमे अपने ही देश की चिकित्सा पद्धति के माध्यम से लोगों की सेवा करने का अवसर मिलता है। इसमें विकास की प्रबल संभावनाएं विद्यमान हैं ।
आयुर्वेद में दक्षता का अर्थ केवल श्लोक कण्ठस्थ करने तक ही सीमित नही है अपितु उसकी व्यवहारिक उपयोगिता का लाभ जन जन तक पहुंचाने की है।
अपने कर्तव्य के प्रति जागरुकता आवश्यक है
अगर हम अपने कर्तव्य का पालन ठीक ढंग से नही करेंगे तो किसी दूसरे के हाथों मे उसका दुरुपयोग ही होगा। आयुर्वेद के नाम पर बस स्टैंड के पास वाले होटल में मिलें व शर्तिया इलाज करने वाले नीम हकीमो के विज्ञापन इस लिये फलित होते हैं कि हममें से बहुत से लोग आयुर्वेद के प्रयोग से भागते है और नीम हकीम आयुर्वेद चिकित्सको द्वारा समाज में की गयी रिक्तता का लाभ उठाते है।
आधुनिक विज्ञान की निन्दा से आयुर्वेद की उन्नति के रास्ते नही खुलते
हम बिना दूसरों की निंदा किये भी अपनी उन्नति की ओर अग्रसर हो सकते हैें ।
ऐलोपैथी चिकित्सा पद्धति को पूरे विश्व में मान्यता प्राप्त है और हमारे देश में अपनी ही पद्धति में शिक्षित बहुत सारे चिकित्सक भी आयुर्वेद के प्रयोग से दूर भागते है। भारत के बाहर चले जाओ तो आयुर्वेद की कोई पूछ नही है और जब कोई भारत के बाहर का कोई देश इस के बारे में कुछ सकारात्मक विचार कहता है है तो हम लोगों के लिये वह एक क्रांितकारी समाचार बन जाता है और वह आयुर्वेद के वहाटसेप ग्रुप व फेसबुक पर बाढ़ की तरह फैल जाता है। विदेशों में अपनी पहचान होने से हमे उल्लासित होने में गर्व महसूस होता है।


आयुर्वेद चिकित्सा पद्वति है न कि चमत्कारी विद्या
हमारे द्वारा कोई असाध्य प्रतीत होने वाला रोगी ठीक होता है तो हम उसे एक सामान्य चिकित्सा प्रक्रिया के रूप में ग्रहण कर उसको इस ढंग से न प्रस्तुत करते है कि ऐलोपैथिक चिकित्सा निकृष्ट हैं और आयुर्वेद चिकित्सा उससे श्रेष्ठ है। हम अपनी बात को दमदार बनााने के लिये वो रोगी के बारे में यह अवश्य बताएंगे कि उसने एम्स में या किसी अन्य बड़े अस्पताल में ईलाज करवाया वहां उसे कोई लाभ नही मिला। नैतिकता यह मांग करती है कि कि अगर हमारी युक्ति से कोई रोगी ठीक हुया है तो उसके ठीक होने की विधि का उल्लेख करें न कि दूसरों को निकृष्ट सिद्ध करने का प्रयास करें।
आयुर्वेद को आयुर्वेदीय रूप में ही उजागर करें
वर्तमान में आयुर्वेद को लोग अलग अलग ढंगों से प्रचारित कर रहें है जोकि उसके मल स्वरूप से कोसों दूर है। जी हां प्रत्येक अवस्था में मालिश करना, सोना बाथ, हर्बल मेडिसिन का प्रयोग आयुर्वेद नही है। ज्वर में पेरासिटामोल के साथ गोदन्ती भस्म का प्रयोग आयुर्वेद नही है। खांसी में एण्टीबायोटिकस व एण्टी एलर्जी औषधियों के साथ सितोपलादि चूर्ण का प्रयोग आयुर्वेद नही है। एण्टी डायबेटिक औषधियों के साथ शिलाजीत, वंग भस्म, गुड़मार आदि का प्रयोग आयुर्वेद नही है।
अपने ऊपर विश्वास रखें
जी हां आप के पास वह विद्या है जिसके बारें में कहा गया है कि अगर विश्व के सभी चिकित्सा ग्रन्थ जला दिये जाएं तो भी केवल चरक संहिता से चिकित्सा की जा सकती है। समरथ को नही दोष गुसाईं उक्ति के अनुसार जो विद्या तथकथित बलशाली देशों में पनपी उसे ही पूरे विश्व की चिकित्सा पद्धति के रूप में मान्यता मिली। ऐलोपैथी औषधियों के दुश्प्रभावों को गिनाते रहने में ही आत्मतुष्टि का अनुभव।करने वालों से मेरा नम्र निवेदन है कि ऐलोपैथिक चिकित्सक अपनी औषधियों के दुष्प्रभाव से अनभिज्ञ नही होते । वे जानते हैं और उस अनुसार सचेत भी रहते ।
सेमिनारो में इमानदारी रखें
चरक संहिता में एक स्थल पर तिलपीड़क न्याय का उल्लेख हुया है। कोल्हू चलाने वाला बैल पूरा दिन चलते रहने के बावजूद भी वहीं रहता है कोई रास्ता तय नही कार पाता। उसी तरह दो दिन तक सेमिनार चलते रहने से उसमें भागीदार करने वाले कुछ नया सीख नही पाते अर्थात सेमिनार शुरु होने से पहले ज्ञान के मामले में जहां खड़े थे सेमिनार खत्म होने के बाद भी वहीं पर ही मिलेंगे। कट कोपी पेस्ट का लज्जितजनक कार्य कुछ सुप्रतिष्ठित विशेषज्ञों के द्वारा भी सपंादित होते देखे गयें है। उनसे आप विकास की क्या उम्मीद रखोगे।
शास्त्रीय औषधियों का स्वरूप जिंदा रखने में अपना योगदान दे
जी हां जिस गति से शास्त्रीय योगों को प्रयोग करने वाले कम हो रहें हैं उसके अनुसार भविष्य में यह शास्त्रीय योग लुप्तप्रायः होने की सम्भावना प्रबल प्रतीत हो रही है। बहुत सारी फार्मेसी अब पेटंट औषधियों को ही बाजार में लारही है । शास्त्रीय योगों की प्रामणिकता सिद्ध करने की आवश्यकता नही होती। यह स्वत ही सिद्ध होती है। वर्तमान में बहुत से शास्त्रीय योग ऐसे हैं जिनका कभी भी व्यवसायिक दृष्टि से निर्माण ही नही हुया। और जिन योगों का पहले से निर्माण हो रहा था उनमें से भी बहुत से योग फार्मेसी के सूची पत्रों से लुप्तप्रायः हो रहे है।
न केवल आयुर्वेद के विकास की अपतिु उसके स्वरूप को जिंदा रखने की जिम्मेदारी आयुर्वेद के लोगों की ही है अतः इसमें अपना योगदान देना सुनिश्चित करें।
प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़
हरिद्वार 249401

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