आयुर्वेद चिकित्सक होना गर्व की बात
आयुर्वेद चिकित्सक होना गर्व की बात

वैद्य जिस कैरीयर को मैने अपनी इच्छा के विरुद्ध अपनाया, ग्रन्थों में उसकी महिमा गायी गयी है। कहा गया है कि जो किसी को अन्न देता है, पानी पिलाता है या फिर किसी का ईलाज करता है उसे स्वर्ग में जाने के लिये किसी अन्य सीढ़ी की आवश्यकता नही। सुबह-सुबह किसी वैद्य के दर्शन करना शुभ होता है। देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों की पूजा तो भगवान इन्द्र स्वयं करते थे। उनको भगवान इन्द्र के साथ सोमरस पीने का अधिकार था। वेद मंत्रों में इन्द्र, अग्नि और अश्विनी कुमारों की जितनी प्रशंसा की गयी है, उतनी किसी अन्य देवता की नही। जब देवता लोग अश्विनी कुमारों की पूजा कर सकते हैं तो आम आदमी को अपनी शक्ति से अधिक उनकी पूजा करनी चाहिये, ऐसा कहा गया है। वैद्य के पास वह शक्ति होती है कि वह यमराज के साथ मुकाबला कर यमपुरी जाते प्राणियों के प्राण वापस ला सकता है। जीवन दान से बड़ा कोई दान नहीं है।

जो वैद्य केवल प्राणियों में दया रखकर अपना कार्य करता है वह सांसारिक विषयो को त्याग कर ब्रह्म में लीन हो जाता है। जिस वैद्य के पास सभी साधन उपलब्ध होते हैं वह रोगी के शरीर को रोगों से मुक्त करके उस को स्वस्थ करता है। शरीर को सुखायु के दान से वह धर्म, अर्थ, काम तथा इस लोक का व परलोक का दाता हो जाता है। चिकित्सा करने के लिये आवश्यक वैद्य, औषधि, रोगी के साथ रहने वाला सहायक और रोगी-इन चारों में से वैद्य श्रेष्ठ होता है। चरक ने कहा है कि वैद्य बनने के बाद उसका नया जन्म होता है। वह पहले से अधिक बुद्धिमान हो जाता है।उसमें ब्रह्म और आर्ष सत्त्व का प्रवेश हो जाता है। उत्तम ज्ञान प्राप्त करने के कारण उसे द्विज कहा जाता है अर्थात चिकित्सक बनने के बाद उसकी दूसरी जाति हो जाती है।

वैद्य का निवास

भगवान शंकर को तो वेद ने सम्पूर्ण भेषज ही मान लिया। भगवान शंकर के पास मृतसंजीवनी नामक विद्या थी जिससे मरे हुये प्राणियों को जीवित किया जा सकता था। उन्होने इस ज्ञान को शुक्रचार्य को दिया। वेदवेताओं का कहना है कि गोविन्द, दामोदर अैार माधव ये नाम मनुष्यों के समस्त रोगों के समूल उन्मूलन करने वाले भेषज है। संसार के तीन प्रकार के शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक दुखों को दूर करने वाले बीजमंत्र है। भगवान इन्द्र ने भी इस विद्या का ज्ञान प्राप्त किया था। देवताओं ने भी जिस ज्ञान का प्रयोग किया उस विद्या को अपनाना गर्व की बात है। प्राचीन काल में राजा के निवास स्थान के पास वैद्य का निवास होता था। राजा को जो भोजन करना होता था उसका निरीक्षण पहले वैद्य करता था। युद्ध के मैदान में राजा के साथ कर्मचारियों के अतिरिक्त समस्त उपकरणों से सम्पन्न वैद्य भी होता था। रामायण में भी सुषेण वैद्य का उल्लेख मिलता है। जैन आगम ग्रन्थों में आरोग्य शालाओं का उल्लेख मिलता है, जिसमे अनेक वैद्य, वैद्य पुत्र, रोगियों और दुर्बलों की चिकित्सा विविध प्रकार की औषधियों से करते थे।https://www.youtube.com/watch?v=4E79tfDXHp4

वैद्य की जीविका के बारे में कहा गया है कि कोई देश ऐसा नहीं है जहाँ मनुष्यों का निवास नहीं है और उन्हे कोई रोग न होता हो। अतः वैद्य के जीवन निर्वाह की व्यवस्था सब जगह सुलभ है। वैद्य को आयुर्वेद के ज्ञान का प्रयोग अपनी आजीविका के लिये नहीं करने को कहा है। अगर कोई रोगी ठीक हो जाने के बाद, वैद्य की धन से सेवा नहीं करता अथवा असमर्थ होने पर वैद्य की श्रमदान से सेवा नहीं करता तो रोगी के सारे पुण्य का लाभ वैद्य को मिल जाता है। सम्भवतः बहुत से लोग फ्री की दवायी खाने से इस लिये परहेज करते हैं कि उनके पुण्य का लाभ किसी और को न मिल जाए। चिकित्सा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती, चिकित्सा करने से कहीं पर धर्म, कहीं दोस्ती होती है, कहीं धन मिलता है, कहीं पर यश और कहीं पर चिकित्सा करने से अभ्यास प्राप्त होता है। वह व्यक्ति जो शुरु में अपने रोग के प्रति लापरवाही बरतता है बाद में रोग बढ़ने पर वैद्य से चिकित्सा कराने के लिये अपना सब कुछ लुटानें के लिये तैयार रहता है। यह बात आयुर्वेद के चिकित्सक के महत्त्व को दर्शाती है।

चिकित्सा व्यवसाय उत्कृष्ट कोटि का है। इसलिये इस व्यवसाय को अपनाना बहुत से लोगों का सपना होता है। हर व्यक्ति वैद्य नहीं बन सकता इसलिये कुछ छल फरेब करने वाले, वैद्य न होेते हुये भी नकली वैद्य बनकर लोगों की चिकित्सा करने का ढोंग रचाकर उन्हे ठगते है। इन्हे नीम हकीम के नाम से भी जाना जाता है। आयुर्वेद में इनकी निंदा की गयी है। जिस तरह घुण का कीड़ा लकड़ी पर चलते हुये वर्णमाला के किसी शब्द की शक्ल बना देता है तो यह एक मात्र संयोग ही है। उसी तरह अगर किसी नीम हकीम से कोई रोगी ठीक हो जाता है तो यह भी एकमात्र संयोग ही है। नीम हकीमों को कोसते हुये कहा गया है कि नीम हकीम से चिकित्सा करवाने की अपेक्षा तांबे का विष पी लेना अच्छा है। इन्द्र का वज्र अगर किसी रोगी पर गिर जाए तो व्यक्ति के बचने की सम्भावना हो सकती है, लेकिन नीम हकीम से चिकित्सा करवाने से कोई बच नहीं सकता। जिस तरह विष, शस्त्र, अग्नि एवं अशनि मारक होते हैं उसी तरह ऐसी औषध जिसके बारे में कोई ज्ञान नहीं है उसका प्रयोग भी मारक होता है। जिस वैद्य को द्रव्यों के नाम, रूप और गुणों का ज्ञान नहीं है तथा जिसे इन तीनों का ज्ञान है और औषध कैसे प्रयोग करनी है का ज्ञान नहीं है वे रोगी की चिकित्सा नहीं कर सकते। वे उनकी हानि करते है। अपने शरीर को अग्नि में हवन कर देना अच्छा है किन्तु अज्ञानी वैद्य से चिकित्सा कराना अच्छा नही। जिस तरह अंधा व्यक्ति हाथ टटोल कर रास्ता ढूंढता है उसी तरह नीम हकीम चिकित्सा करते हैं। ज्योतिष, व्यवहार, प्रायश्चित और चिकित्सा इनको जो बिना पढ़े करता है वह ब्रह्मघातक होता है।

वैद्य की चार वृत्तियाँ

चिकित्सक को गुणों से सम्पन्न करने के लिये दिशा निर्देश है। रोग को पूर्ण रूप से समझना, रोगी के कष्ट को दूर करना यही वैद्य के कत्र्तव्य है। वैद्य आयु का स्वामी नहीं है। रोग के ठीक होने पर पुनः थोड़े कारणो से उत्पन्न हो जाता है, क्योंकि दोष से देह में बढ़ने का मार्ग बना रहने से जिस प्रकार थोडी-सी अग्नि बढ़ जाती है उसी तरह रोग भी। अगर शास्त्रों के अनुसार जिसकी चिकित्सा की गयी है और वह रोग शान्त नहीं होता तो उसे कर्मज रोग अर्थात कर्मो का फल समझना चाहिये। पूर्वजन्म के पापरोग इस जन्म में रोग बनकर कष्ट देते है। उनकी शान्ति दान, जप, होम और देवता के अराधना पूजन से होती है। वैद्य की चार वृत्तियाँ बताते हुये कहा है कि अच्छे वैद्य में प्राणियों के प्रति मित्रता का भाव, रोगियों के प्रति दया का भाव, ठीक होने वाले रोगियों के प्रति प्रेम व न ठीक होने वाले रोग के प्रति उपेक्षा का भाव होना चाहिए। औषधियों के सेवन से ठीक लाभ प्राप्त हो इसके लिये व्यक्ति को मंगलाचार सम्पन्न व कल्याण की भावना से युक्त होकर पवित्र व श्वेत वस्त्र धारण कर देवता, गो, ब्राह्मण की पूजा कर उपवास धारण कर व पूर्वमुख व उत्तरमुख होकर औषधियाँ संग्रहित करनी चाहिये।http://healthyminute.in/%e0%a4%86%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b0/

राजवैद्य

महर्षि चरक, सुश्रुत एवं वाग्भट्ट के अनुसार आयुर्वेद के मूल प्रवर्तक साक्षात भगवान है। उनके द्वारा इन्द्र आदि को आयुर्वेद की प्राप्ति हुयी। इस विद्या को अपने जीवन में अंगीकार करना सौभाग्य की बात है। जो चिकित्सक रोगों के कारण, लक्षण और उनकी चिकित्सा के साथ-साथ इस बात का भी ध्यान रखे कि रोग फिर से न पैदा हो उसे राजवैद्य कहा गया है। जिस वैद्य में विद्या, वितर्क, विज्ञान, स्मृति, तत्परता एवं क्रिया यह छः गुण हो वह साध्य रोगों की चिकित्सा में असफल नहीं होता। विद्या मति, कर्म दृष्टि कर्माभ्यास, इन गुणों से युक्त चिकित्सक कभी असफल नहीं होता। वैद्य अपने गुणों से युक्त हो तो वह औषधि, परिचारक व रोगी के गुणों की कमी होनेपर भी अपनी युक्ति से चिकित्सा कर सकता हैं। अगर शेष तीनो अपने गुणों से युक्त हो और वैद्य गुणहीन हो तो भी चिकित्सा कार्य सफलता पूर्वक सम्पन्न नहीं हो सकता।

प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़

हरिद्वार चलवाणी 9410982602

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