आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति

आयुर्वेद के चिकित्सक  आयुर्वेद उत्थान परम्परा के ही वाहक बने

आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति महान है, इसका अतीत सुनहरी है, इसके ग्रन्थों में चिकित्सा के ऐसे परिणामों का उल्लेख है जिसकी वर्तमान युग में कल्पना भी नही की जा सकती, लोगों की रुचि इस ओर बढ़ रही है, पूरे विश्व की आंखें इस तरफ लगी हैं जैसै वाक्य हमे बहुत से लेखों में पढ़ने को  और विभिन्न गोष्ठियों में सुनने को मिलते है । पर इसके बावजूद भी वर्तमान में यह पद्धति विश्व की बात तो दूर अपने देश के लोगों के दिलों में आत्मसात नही हो पायी। जो ज्ञान प्राचीन काल में अपनी गुणवत्ता के लिये प्रसिद्ध था आज अपनी पहचान के लिये संघर्ष कर रहा है।

गुणवत्ता के कारण ही अपनायी जाती है चिकित्सा पद्धति    

    जब देश में मोबाईल का आगमन हुया था तो किसी भी संघ कोे, समुुदाय को देशवासियों को मोबाईल अपनाने के लिये कहना नही पड़ा । वह अपनी उपयोगिता के कारण हर वर्ग के लोगों तक पहुंच गया। योग को विश्व ने उसके  प्रत्यक्ष रूप से दिखायी देने वाले लाभों के कारण आसानी से अपना लिया। अभी भी कुछ क्षेत्रों में, गावों में ऐसे चिकित्सक मिल जांएगें जिन के पास किसी रोग विशेष को ठीक करने की क्षमता होती है और ऐसे लोग अगर जंगल में भी रहते हैं तो लोग उनके घर तक रास्ता बना लेते हैं। उनको अपनी गुणवत्ता स्वयं बतानी नही पड़ती। दूसरें शब्दों में जिस भी टैक्नोलोजी, विद्या, विषय, ज्ञान से किसी को लाभ होता है उसका स्वतः ही जनमानस में स्थान बन जाता है।


आयुर्वेद के निर्मल स्वरूप को परिलक्षित करें

   आयुर्वेद प्राचीन चिकित्सा पद्धति होते हुये भी व्यवहारिक रूप से समाज में उसकी वह उपादेयता परिलक्षित नही हो पा रही जिसकी वह पात्र है।

इससे यह अर्थ निकलता है कि या तो यह पद्धति गुणवत्ता की दृष्टि से हीन है या फिर इसका सही स्वरूप लोगों तक पंहुचा ही नही । स्वच्छ जल जब कीचड़ के रूप में परिवर्तित होता है तो मछलियां भी उसे पसंद नही करती जबकि जल ही उनका जीवन प्राण होता है। पवित्र नदी का जल भी अगर स्वच्छ प्रतीत न हो रहा हो तो लोग उसको पीने से परहेज करतें है। अगर किन्ही कारणों से आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का जीवनदायक स्वरूप दिखायी न दे  तो लोग उसको अपनाने से बचना चाहेगें। ऐसे में इस पद्धति का निर्मल रूप ही उजागर हो ऐसा प्रयास हमारा होना चाहिए। मधुमेह, कैंसर, एडस जैसे रोग जिनका ईलाज नही है वहां झूठे दावों से ठीक करने की डींग नही मारनी चाहिए।

शर्तिया इलाज,

शर्तिया इलाज, ताकत के बादशाह, बस स्टैंड के पास वाले होटल में मिले, फायदा न होने पर पूरे पैसे वापस, विश्व प्रसिद्ध चिकित्सक जैसी शब्दावली आयुर्वेद के नीम हकीम स्वरूप को ही दर्शाती है। अतः उसकी छाया भी अपने चिकित्सालय पर लगे बोर्ड पर भी न पड़ने दे।

मिश्रक चिकित्सा प्रणाली के नाम पर आयुर्वेद के चिकित्सकों का आयुर्वेद प्रैक्टिस से कोसों दूर हो जाने से समाज में यही संकेत जाता है कि आयुर्वेद पद्धति इतनी सक्षम नही है कि इससे रोगों का इलाज किया जा सकता है। समाचार पत्रों में दूसरी चिकित्सा पद्धति के प्रयोग के प्रति अधिकार की याचना के समाचार भी आयुर्वेद पद्धति की दीन हीन अवस्था के प्रतीक को दर्शाती है। 

अंग्रेजी व कम्पयूटर का ज्ञान आवश्यक है।

 बहुत से चिकित्सक ऐसे है जिनका आयुर्वेेद का ज्ञान अच्छा होते हुये भी अंग्रेजी का ज्ञान ठीक नही होता है । अगर अग्रंेजी नही आती तो सीख लेना चाहिए। व्यवहार में देखा गया है कि आयुर्वेद के जिन लोगो ंका अ्रग्रेजी का ज्ञान ठीक है वो  बिना राज आश्रय के अपनी अंतर राष्ट्रीय पहचान बना लेते है जबकि बहुत से आयुर्वेद के विशेषज्ञों का ज्ञान अद्वितीय होते हुये भी अंाग्ल भाषा के ज्ञान के अभाव में एक संकुचित दायरे से बाहर लोगों को लाभान्वित नही कर सका। कम्पयूटर न जानने वाले चिकित्सकों भी समय के साथ चलने के लिये इसका प्रयोग सीख लेना चाहिए।

महाविद्यालयों को केवल व्यापार का केन्द्र न बनाये रखें

              पिछले दो दशकों में आयुर्वेद के कुछ निजी महाविद्यालय एक व्यापार का माध्यम बन गये हैं। बिना उचित साधनों के बहुत सारे तथाकथित शिक्षा मन्दिर विद्यार्थियों को आधे अधूरे चिकित्सक बना कर समाज में भेज रहे हैं। यह बहुत ही चिन्ता का विषय है। यह आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के पतनोन्मुखी होने के संकेत है।

विद्यार्थी जीवन से ही ज्ञान पिपासु बने 

आयुर्वेद के विद्यार्थियों को तो अपने अध्ययन काल से ही यह उदेश्य बना लेना चाहिए कि उन्हे अपनी शिक्षा प्राप्ति के उपरान्त आत्मसम्मान के साथ आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में ही प्रतिष्ठित होना है । उन को अपने अध्ययन को उसी दृष्टि से करना चाहिए कि वो अपने अध्ययन के शैशव काल से ही व्यवहारिक ज्ञान अर्जित करें न कि मात्र उतना ही पढ़े  कि जिससे केवल पास होकर डिग्री मिल जाए। आयुर्वेद की संहिताओं का अध्ययन सूक्ष्मता से करने की आदत डालनी चाहिए। अपनी संहिताओं पर गूढ़ आस्था होना आवश्यक है । गुरु, तीर्थ, मन्त्र व शास्त्र पर जिसकी जितनी आस्था होती है उसको उतना ही लाभ मिलता है।

 आयुर्वेद का मूल ज्ञान संस्कृत में ही निहित है

चिकित्सा की दृष्टि से उपयोगी ज्ञान को प्रथम वर्ष से ही कलम बद्ध करना शुरु कर दें।  आयुर्वेद का मूल ज्ञान संस्कृत में ही निहित है। अतः दूसरे शब्दों में जिसको संस्कृत का ज्ञान नही है उसें आयुर्वेद के ज्ञान में दक्षता प्राप्त करने के लिये उसे कठिन परिश्रम करना पड़ेगा। अतः आयुर्वेद में क्षमता हासिल करने के लिये संस्कृत सीखने के लिये वर्तमान में बहुत सी ऐेसे बिना पैसे के सीखने के माध्यम अन्तर्जाल पर उपलब्ध हैं जहां आाप अपनी सुविधा अनुसार संस्कृत सीख सकते है।

 जडी बूटियों द्रव्यों की पहचान करने में दक्षता प्राप्त करें । बहुत बार हम अपने आस पास में बहुलता से उपलब्ध किसी जड़ी बूटीे के ज्ञान से परिचित न होने से उसका लाभ लेने में अक्षम होते है।

शास्त्रोंक्त योगों का प्रयोग अपनी प्रैक्टिस में अवश्य करें

चिकित्सक के रूप में यथा सम्भव प्रयास करें कि शास्त्रोंक्त योगों का प्रयोग अपनी प्रैक्टिस में अवश्य करें । हो सके तो कुछेक योगों का निर्माण अपने स्तर पर अवश्य करें। मैने बहुत से चिकित्सक ऐसे देखें है जो किसी एक रोग विशेष में योग्यता अर्जित कर लेते हैं और उसी के कारण उस क्षेत्र के बहुत से लोगों को उसका लाभ मिल जाता था।

     अपने अध्यापक पर आस्था रखें। एक अच्छा अध्यापक आपके लिये आपका आदर्श है। एक अच्छे अध्यापक के पास विद्यार्थियों  को प्रभावित करने के लिये उसके प्रवचन से भी अधिक महत्वपूर्ण उसका अपना आचरण ही होता है। अगर वह अपने व्यवहार में आयुर्वेद को अपनाता है तो वह उसके विद्यार्थियों के लिये एक सशक्त मार्गदर्शक होता है। 

अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझें

यह आयुर्वेद पद्धति से जुड़े लोगों की नैतिक जिम्मेदारी बनती हैं समाज में अगर आयुर्वेद का स्वरूप विकृत परिलक्षित हुया है तो उसे ठीक करना चाहिए। याद रखें के दूसरी चिकित्सा पद्धतियों की निन्दा कर व अपनी प्रशंसा कर हम कभी भी आयुर्वेद की उन्नति के रास्ते विकसित नही कर सकते। आयुर्वेद के ज्ञान को सही ढंग से बताने के लिये स्वयं ज्ञान से ओतप्रोत होना आवश्यक है। एक चिकित्सक बन कर उसकी जिम्मेदारी का निर्वाह ईमानदारी से करना चाहिए। हमे आयुर्वेद के उत्थान परम्परा का ही वाहक बनना चाहिए न कि पतन प्रक्रिया का।

                                            प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़

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