विषयः अष्टांगहृदय एवं मौलिक सिद्धान्त

   

कल्पना की भान्ति  अर्थाश्रय ग्रन्थ को समझने का ही एक साधन है। किसी विषय के अर्थ को वर्गीकृत करके प्रस्तुत करने की विधि को कल्पना कहा जाता है और किसी पद अथवा वाक्य के पूर्ण अर्थ करने वाले के प्रतिपादक भाव को अर्थाश्रय कहा जाता है। ग्रन्थों में आये हुये क्रमहीन प्रंसगहीन व गूढ़ार्थों का परिज्ञान अर्थाश्रयों से ही सम्भव होता है।

आचार्य अरुणदत्त ने अर्थाश्रय की संख्या बीस कही है और तन्त्रयुक्तिकार ने उपधालोप को एक अतिरिक्त अर्थाश्रय मानकर कुल संख्या 21 कही है। पदार्थ विज्ञान में अर्थाश्रय 21 बताये हैं।

 अर्थाश्रय निम्न लिखित हैं।

1 आदिपद लोप

प्रथम पद के लुप्त निर्देश की स्थिति को आदिलोप कहा जाता है।

यथा “बृंहणः प्रीणनो वृष्यश्चक्षुषो व्रणहा रसः“, में रस शब्द से पहले मांस शब्द लुप्त है । इसका सही अर्थ तभी समझा जा सकता है जब रस के स्थान पर मांसरस शब्द का प्रयोग किया जाये। मधुयष्टि के लिये “यष्टि“ शब्द का प्रयोग भी आदिलोप आश्रय का उदाहरण है।

2 मध्यमपद लोप

तीन या तीन से अधिक शब्द समुदाय में मध्यम पद का लुप्त रहना मध्यम पद लोप कहलाता है। उसका अर्थ तभी निकलता है जब उसमें मध्यम पद को जोड़ा जाये। यथा अष्टांग हृदय सूत्र स्थान के छठे अध्याय का नाम “द्रवद्रव्यविज्ञानीय “ है जबकि इसके अर्थ को सही ढंग से समझने के लिये इसमें द्रवद्रव्य के बाद व विज्ञानीय के मध्य में “स्वरूप“ शब्द लगाने से अर्थ स्पष्ट होता है।

3 अन्तपद लोप

वाक्य में अन्तिम पद को लुप्त निर्देश प्राप्त होने पर उसे अन्तपद लोप कहा जाता है। अन्तिम पद क्रिया] कर्ता व कर्म में से कोई भी हो सकता है। यथा चरक में ज्वर चिकित्सा के लिये कहा है कि “वातपित्तात्मकः शीतमुष्णं वातकफात्मकः“ ।

उक्त वाक्य के सही अर्थ का ज्ञान होने के लिये वातपित्तात्मकः शीतम् के पश्चात इच्छति शब्द का प्रयोग होना चाहिये। इसी तरह वातकफात्मकः उष्णम् के उपरान्त इच्छति शब्द का प्रयोग होना चाहिये। यहां क्रियापद शब्द के संयोग से “वातपित्तात्मक ज्वर में शीत की इच्छा व वातकफात्मक ज्वर में उष्ण द्रव्यों की इच्छा होती है“ अर्थ स्पष्ट होता है।

4 उभयपद लोप

यह तीन प्रकार का हो सकता है यथा, आदिमध्य, मध्यान्त व आद्यन्त लोप।

“सत्त्वं लघु प्रकाशकमिष्टकम्“ इस सत्त्व गुण के वर्णन से रजस् एवं तमस् लोप से मध्यमलोप “उपष्टम्भकं चलं च रजः“ इस तमो गुण के वर्णन से आदिमध्य रजस् एवं तमस् लोप को निर्दिष्ट करता है। आवस्थिक दृष्टि से होने वाले तीन विपाकों यथा मधुर, अम्ल व लवण में से केवल मधुर विपाक का श्रवण होने पर मध्यान्त को लुप्त समझना चाहिये।

5 उपधा लोप

 स्वर एवं व्यंजन में से जो भी अन्तिम वर्ण होगा, उसके पूर्व वर्ण की उपधा संज्ञा होती है। पाणिनि व्याकरण में इसका सूत्र सहित वर्णन मिलता है। आयुर्वेद संहिताओं में इस प्रकार के लोप के उदाहरण नही होते हैं।

6 आदिमध्यान्त लोप    

शास्त्रों कहीं कहीं ऐसे निर्देश प्राप्त होते हैं जहां वाक्य के आदि, मध्य व अन्त का लोप हुया हो। यथा ज्वर प्रकरण में तृषा लगने पर जल सेवन का निषेध नही किया गया] लेकिन यह निषेध ज्वर की किस अवस्था में नही है यह स्पष्ट नही है । इसे आमावस्था, पच्यमान अवस्था व निरामावस्था को लुप्त मानकर अर्थ ग्रहण किया जाता है। यह आदिमध्यान्त लोप का उदाहरण है।

7 वर्णोपजनन  जहां ग्रन्थ में आचार्य द्वारा साक्षात वर्ण समुदाय का प्रयोग नही किया किन्तु व्याख्या काल में उसका आधार लिया जाए तो वह वर्णोपजनन अर्थाश्रय कहलाता है। यथा विकारो धातुवैषम्यम् ——-। में साम्यं प्रकृतिरुच्यते“ का प्रयोग करने से अर्थ स्पष्ट होता है।

8 ऋषिक्लिष्ट

किसी ऋषि अथवा ऋषिपुत्र के द्वारा प्रमाद वश या आवश्यक शक्ति के अभाव में शास्त्र में अशास्त्रीय शब्दों का उच्चारण किया जाये और उसका प्रयोग व्यवहार में होने लगे तो उसे ऋषिक्लिष्ट अर्थाश्रय कहा जाता है। यथा रोम, लोम आदि पद ऋषि प्रयुक्त है लेकिन व्याकरण की दृष्टि से उसका कोई अर्थ नही निकलता।

अर्थाश्रय- अनूप कुमार गक्खड़

9 तन्त्रशील

प्रत्येक आचार्य की एक प्रवृत्ति होती है कि वह अपने शिष्यों को शास्त्र का यथावत बोध करवाये। इस हेतु वह एक विशिष्ट शैली का आश्रय लेता है। गुरु की इच्छा होती है कि दिये जाने वाला ज्ञान सब प्रकार के शिष्यों को सही प्रकार से समझ आ जाए उसके लिये वह अपने अलग ढंग से प्रयास करता है जिसको तन्त्र शैली के नाम से जाना जाता है। यथा शारीर स्थान में पहले अस्थियों की संख्या 360 बताकर बाद में अंगुली, हस्त, पाद आदि का विभाग पूर्वक वर्णन कर विस्तार से वर्णन न करना । शील का अर्थ स्वभाव से लिया जाता है।

10 तन्त्रसंज्ञा

 किसी विषय की व्याख्या करते समय आचार्य द्वारा अपने ही तन्त्र का कोई प्रसिद्ध उदाहरण देना तन्त्रसंज्ञा कहलाता है। यथा नवज्वर में चरक ने कषाय सेवन का निषेध है। बाद में उसके आगे चरक ने कहा है कि केवल कषाय रस वाले क्वाथ ही नव ज्वर में मना है। तन्त्रकर्ता स्वकीय तन्त्र के निर्माण में तत्कालीन अन्य तन्त्रों से पृथक् रखने की प्रवृत्ति के कारण व अपनी विशिष्टता सिद्ध करने के लिये कुछ अलग संज्ञा विशेष का उल्लेख करते हैं। दोष] धातु आदि संज्ञाए केवल आयुर्वेद में ही उपलब्ध हैं।

11प्राकृताख्य

प्रकरण अनुसार किसी शब्द का अर्थ करना प्राकृताख्य कहा जाता है। द्रव्यगुण विज्ञान में अर्जुन शब्द से औषध को व शालाक्य तन्त्र में अर्जुन शब्द से एक नेत्र रोग को ग्रहण किया जाता है। ऋतु प्रकरण में मधुमाधव शब्द में से मधु का अर्थ चैत्रमास ग्रहण करना चाहिये न कि माक्षिक । इसी तरह भोजन करते समय सैन्धव शब्द से लवण को ग्रहण करना चाहिये न कि अश्व को।

12 समानतन्त्र प्रत्यय

 किसी साघ्य विशेष का स्वकीय तन्त्र में समाधान अनुपलब्ध रहने की स्थिति में तत्कालीन अन्य समानतन्त्रों में वर्णित विषय को सुस्ष्ट अर्थ समझने के लिये प्रमाण स्वरूप उपस्थित करना समानतन्त्र प्रत्यय कहलाता है। अष्टांग हृदय में कहा है कि लोम] नख] श्मश्रु का कर्तन करते रहना चाहिये। कितनी देर बाद कर्तन करना चाहिये उसकी जानकारी हमे क्षारपाणि के वचनों से मिलती है कि प्रति दस दिनो के बाद केश कर्तन करना चाहिये।

यह समान तन्त्रप्रत्यय है।

13परतन्त्र प्रत्यय

जिस विषय की प्रसिद्धि का कारण न तो अपने तन्त्र में हो और न ही स्वसमान वैद्यकतन्त्र में हो तो अन्य ग्रन्थों से उसका ज्ञान किया जाता है। आयुर्वेद में ज्योतिष, धर्मशास्त्र व दर्शन से सम्बन्धित विषयों का उल्लेख इसका उदाहरण है।http://healthyminute.in/%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9b%e0%a5%80%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%82%e0%a4%aa-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a4%95%e0%a5%8d/

14 हेतुहेतुक धर्म

जब किसी निश्चित हेतु से उत्पन्न कार्य का हेतु अन्य कार्य का भी हेतु बने तो वहां हेतुहेतुक अर्थाश्रय होता है। यथा पैत्तिक अतिसार का रोगी अगर पित्तवर्धक आहार विहार करे तो उससे रक्त अतिसार की उत्पत्ति होगी। यहां पित्तातिसार का पित्त रक्तातिसार का हेतु है। इसी तरह अतिसार की निवृत्ति के उपरान्त मन्दाग्निजन्य आहार ग्रहणी की उत्पत्ति करता है।

15 कार्यकारण धर्म

जहां कार्य से कारण का अथवा कारण से कार्य का ज्ञान हो वहां कार्यकारण धर्म के रूप में अर्थाश्रय होता है।

कुष्ठरोग में कपाल आदि कुष्ठ में वातादि दोषों का ज्ञान व वातादि प्रकोप से कपालादि कुष्ठों का ज्ञान कार्यकारण भाव अर्थाश्रय को दर्शाता है।

16 आद्यान्तविपर्यय अर्थाश्रय।

प्रतिज्ञात विषय को विपर्यय करके प्रस्तुत करना अर्थात जिस विषय का नाम पूर्व में लिया है ,उसका वर्णन पश्चात करना और जिसका नाम क्रम में बाद में रखा है उसका वर्णन पहले करना आद्यान्तविपर्यय अर्थाश्रय कहलाता है। यथा अन्नपान विधिक्रम में पहले अन्न का फिर पान का उललेख होना चाहिये। लेकिन अष्टांग हृदय सूत्र स्थान में पहले द्रवद्रव्यविज्ञानीय नामक अध्याय और बाद में अन्नस्वरूपविज्ञानीय अध्याय का वर्णन किया गया है। यह आद्यान्तविपर्यय अर्थाश्रय कहलाता है।

17 शब्दान्यत्व 

अन्य शब्दों से भी प्रकृत अर्थ को बताना अर्थात् पयार्यवाची शब्दों से एक ही विषय को प्रस्तुत करना शब्दान्यत्व कहलाता है। यथा ज्वर शब्द विकार का पर्यायवाची भी है और उससे संताप का भी बोध होता है।

18 प्रत्ययाख्यधर्म –

जो वास्तव में हेतु नही है, पुनरपि हेतु के सदृश उपस्थित होने के कारण जिन्हे हेतु के रूप में उपस्थित किया जाता है] उन्हे प्रत्ययाख्य धर्म कहा जाता है। यथा उन्माद के कारण अन्य रोगों की तरह वात] पित्त व कफ ही होते हैं लेकिन देव] दानव] गन्धर्व व पिशाचादि को उन्माद का कारण कहा है। राजयक्ष्मा के अयथाबलारम्भ, वेगसंधारण, क्षय और विषमाशन – ये चार कारण कहे है जबकि यह रोग त्रिदोष प्रकोप से ही उत्पन्न होता है।

19 उपनय

जहां सूत्र में प्रस्तावित विषय के समर्थन में अन्य प्रकरण के विषय का भी वर्णन कर दिया जाये तो उसे उपनय अर्थाश्रय कहा जाता है। यथा मात्राशितीय अध्याय में आहार मात्रा के लक्षणों के साथ साथ अतिमात्रा से उत्पन्न विसूचिका रोग का वर्णन कर दिया है। अर्थेदशमहामूलीय अध्याय में हृदय प्रसंग वर्णन के साथ साथ अन्य आयुर्वेदीय विषयों का वर्णन किया गया है।

20 सम्भव

किसी सूत्र अथवा प्रकरण के अतिव्यापक होने के कारण सम्पूर्ण शास्त्र जिसका व्याख्यान करता है, उसे सम्भव कहा जाता है। यथा आयुर्वेद के अष्टांग का वर्णन व त्रिसूत्र का वर्णन सम्पूण शास्त्र का विषय है।

21 विभव

पूर्व में आया हुया विषय जब अर्थ का आश्रय बने उसे विभव कहा जाता हैं यथा चरक संहिता में ज्वर चिकित्सा में कुटी स्वेद का उल्लेख होने पर यह कहा जाए कि जैसा वर्णन सूत्र स्थान के अध्याय 14 में किया गया है।  

https://www.youtube.com/watch?v=4E79tfDXHp4

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